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विधाता का विधान

 

["चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता विरचित हे राम शीर्षक पुस्तक से "]

 

विधाता हमें कर्म में लगाकर सृष्टि में निरंतरता लाने का प्रयास करते रहते हैं और एक क्रम से हमें भी उन्नति के मार्ग पर बने रहने के लिए प्रेरित करते हैं।  प्रकृति के गुणों के अधीन ही जीव कर्म के लिए प्रवृत्त होते हैं और विधायक कर्म में लिप्त होते रहते हैं। [i]  वस्तुतः एक क्षण के लिए भी व्यक्ति पूर्ण निष्क्रियता से नहीं रह सकता; यदि सिर्फ बैठे हों तब भी कुछ न कुछ तरंगों से मन अशांत हुआ रहता होगा; गहन निद्रा में भी हम स्वप्नलोक में सक्रिय रहते होंगे।  निद्रा में भी श्वास और संवहन की क्रिया के साथ साथ स्वयःक्रिय स्नायु की क्रिया भी चला करेगी। अतः यह भी कहा जा सकेगा कि पूर्ण समाधि जैसी स्थिति में भी हम सक्रिय रहते होंगे और विश्व चराचर के इस पार्थिव जगत में चेतना सहित वापस आने के लिए प्रयत्न कर लिया करेंगे ; अगर सफलता मिली तो सक्रिय हुए और विफलता मिली तो शरीर छूटा! बीच के अंर्तवर्ती पर्याय में ही चेतना का आवागमन होता रहेगा।  

श्रेष्ठ वही कहलायेंगे जो ज्ञानेन्द्रिय को वश में करके कर्मेन्द्रियों को आसक्ति रहित होकर  विधायक कर्म में लगा सकेंगे। [ii]  प्रजा पालन और प्रजा रक्षण के बारे में कहा जाता है: ब्रह्मा प्रजापालक हैं और प्रजा के कल्याण के लिए भी तत्पर रहते हैं। [iii] पूर्ण कर्मयोगी तो सभी कर्म यज्ञ  के रूप में ही किया करेंगे; [iv] भोजन करते समय भी जठराग्नि रुपी कुंड में भोजन रुपी द्रव्य कि आहूति देंगे। संग्रह वृत्ति से बचते हुए कर्मयोगी को विधायक कर्म में लगाना चाहिए। [v]

 



[i]  न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: ।। श्रीमद्भागवद्गीता  अध्याय ३ श्लोक ५ ।।

 न – नहीं ; नमस्ते - अवश्य ; कश्चित् – कोई भी ; क्षणम् – एक क्षण ; अपि – सम ; जातु – सदैव ; तिष्ठति – रह सकता है ; अकर्म-कृत - कर्म के बिना ; कार्यते – किये जाते हैं ; नमस्ते - अवश्य ; अवशः – असहाय ; कर्म - कार्य ; सर्वः – सभी ; प्रकृति-जैः – भौतिक प्रकृति से उत्पन्न ; गुणैः – गुणों से

 

[ii] यस् त्विन्द्रियानि मनसा नियम्यारभते 'अर्जुन

कर्मेन्द्रियैः कर्म-योगम् असक्तः स विशिष्यते।। श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय ३ श्लोक ७।।

यः – कौन ; तू - परंतु ; इन्द्रियाणि – इन्द्रियाँ ; मनसा – मन से ; नियम्य – नियंत्रण ; अरभते - प्रारंभ होता है ; अर्जुन – अर्जुन ; कर्म-इन्द्रियैः – कर्मेन्द्रियों द्वारा ; कर्म-योगम् - कर्मयोग ; असक्तः – आसक्ति रहित ; सः – वे ; विशिष्यते - श्रेष्ठ हैं;

[iii] सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्वष्टकामधुक् ।।

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।  परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।।

……………… श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय ३ श्लोक १०, ११ ।।

 

“प्रजापति ब्रह्माजी ने सृष्टि के आदिकाल में कर्तव्य-कर्मों के विधान सहित प्रजा की रचना करके उनसे कहा कि तुम लोग इस कर्तव्य के द्वारा सब की वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुम लोगों को कर्तव्य पालन की आवश्यकता सामग्री प्रदान करने वाला हो। अपने कर्तव्य कर्म के द्वारा तुम लोग देवताओं को उन्नत करो और वे देवता लोग अपने कर्तव्य के द्वारा तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे।“

[iv] गृहेश्व अविशतम् चापि पुंसाम कुशल-कर्मणाम् मद-वर्त-यत-यमानं न बंधाय गृह मतः (भागवत ४-३०-१९  (६)

“पूर्ण कर्मयोगी , अपने नित्य क्रिया और कर्तव्यों को पूरा करते हुए भी, ईष्ट को सभी गतिविधियों का भोक्ता जानकर, ईष्ट के  लिए अपने सभी कार्य यज्ञ के रूप में करते हैं।

[v] स विश्वजितं अजहरे यज्ञं सर्वस्व दक्षिणम् अदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचम इव (रघुवंश ४ - ८६ )[ श्लोक ५]

"रघु ने विश्वजीत यज्ञ इस सोच के साथ किया था कि जैसे बादल पृथ्वी से पानी इकट्ठा करते हैं, अपने आनंद के लिए नहीं, बल्कि उसे वापस पृथ्वी पर बरसाने के लिए, उसी तरह, एक राजा के रूप में उनके पास जो कुछ भी था, वह जनता से कर के रूप में एकत्र किया गया था, अपनी ख़ुशी के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर की ख़ुशी के लिए। अतः उन सभी संग्रहों को प्रजा हितार्थ खर्च करके फिर से भिक्षा पात्र लेकर योगक्षेम का इंतजाम करने के लिए निकल पड़े ।“

फकीरी

 


कभी अपने ही देश के राष्ट्रपति महोदय को कुछ ऐसी पीड़ा होने लगी कि वो ठीक से सो भी नहीं पा रहे थे; अगर सो भी जाते हों तो नींद ही नहीं आ रही थी।  वहाँ से कुछ दूरी पर बसे एक नगर में रहनेवाले एक फ़कीर बाबा के बारे में उन्हें पता चला ।  कभी कभी पढ़े लिखे लोग भी फकीरी पर भरोसा करने लग जाते हैं; और ख़ास करके तब जब अन्य सभी औषधि काम ही न आते हों।  औषधि के भी अपने कुछ नियम, कुछ सीमाएं और कुछ कमियाँ रह ही जाती होगी।  यह एक नैसर्गिक विषय ही समझें जो हर सृजन में कुछ न कुछ कमी छोड़ दिया करते हैं ; और उस कमी से चल पड़ने के लिए हम मजबूर भी हो जाते हैं।

आखिर महोदय को लेकर उनका ख़ास काफिला फ़कीर बाबा के शहर में आ पहुंचा ; उनके पास पहले सन्देश वाहक भेजा गया।  कोई आम व्यक्ति का आना जाना रहता तो अलग बात थी; पर उनके जाने के लिए व्यवस्था कुछ ख़ास ही बन जाती होगी ! आला अधिकारी के साथ कुछ एक हुए सिपाही वर्ग का काफिला पहले जा पहुंचा और फ़कीर बाबा को ही आदेश देने लग गए, "बाबा चलो, तुमसे हमारे राष्ट्रपति महोदय मिलाना चाहते हैं। "  

फ़कीर बाबा थोड़ी देर चुप्पी साधे रहे, और कुछ गड़बड़ी में भी थे , उन्हें मरीजों को देखने के लिए निकलना भी था; बाबा वहां जरूर जाते थे जो उनके पास नहीं आ पाता था ; सिपाही और अधिकारी के हरकतों को देखकर उन्हें ऐसा नहीं लगा कि उनके मालिक चलने फिरने की ताकत खो दिए हैं , वो बोले, "उनके दरबार में एक फ़कीर का क्या काम ! उन्हें जाकर कह दो मैं नहीं आऊंगा। "

संवाद पाकर राष्ट्रपति महोदय समझ गए कि जरूर अधिकारी लोगों ने फ़कीर बाबा के साथ अखर कर बात किया होगा।  अधिकारी हो जाने के बाद लोगों को अंग्रेजियत की हवा लग ही जाती है, और फिर उसी प्रकार सी उड़ान भरने लग जाते हैं; कभी कभी यह भी भूल  जाते हैं कि अपने यहाँ धरती नाम की कोई वस्तु है; और जहां हमें भी अपना शरीर छोड़कर जाना होगा।

मुसीबत का पैमाना कभी कभी लोगों को घुटनों पर लाकर छोड़ देता है; देश की जिम्मेदारी उठानेवाले महाशय के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।  फिर उन सन्देश वाहकों को भेजा गया; उन्हें घर पर ही रहने के लिए कहा जाय, राष्ट्रपति महोदय ही उनसे मिलने के लिए आएंगे।  जब तक सन्देश वाहक पहुँच पाते तबतक बाबा निकल चुके थे; दो तीन लोगों को वहीँ रहने के लिए कहा गया।  देर रात बाबा को सन्देश  मिला, पर दूसरा दिन क्या होगा वो दूसरे दिन सबेरे ही तय कर लेंगे।

दूसरे दिन भी बाबा देर से ही वापस आये; आकर देखते हैं कि पूरा काफिला ही उनके मचान के पास डेरा डाल चूका है; पड़ोस के घर से कुर्सियाँ  और मेज लाकर महोदय को बैठने भी दिया गया।  बाबा को देखकर और कोई खड़ा हो या न हो, राष्ट्रपति महोदय जगह छोड़कर खड़े हो गए; और उनको देखकर अन्य सभी लोग भी ताल में ताल मिलाने लगे; कुछ लोगों को मजबूरन ही खड़ा होना पड़ा।  जिस आदमी का रहने खाने, नहाने आदि का कोई ठिकाना ही न रहा होगा, उसके लिए राष्ट्रपति जी जगह छोड़कर खड़ा हो जाएंगे !

इस घटना के लिए कोई भी मानसिक रूप से प्रस्तुत नहीं थे, कुछ देर तक सन्नाटा रहा।  फ़कीर बाबा अपने चबूतरे पर आसीन हो गए और जिन मरीजों दूर बिठाकर रखा गया था, उन्हें एक के बाद एक बुलाने लग गए।  राष्ट्रपति जी को लगा उनका नंबर ही शायद पहले आ जाएगा, ताकि वो जल्दी से जल्दी  जगह छोड़कर अपने डेरे पर जा सकें; पर यह तो बाबा का दरबार था ! फिर उन्हें सबकी पीड़ा समझना है। 

जिनकी तकलीफें ज्यादा थी उन्हें पहले बुलाया जा रहा था।  आखिर महोदय  का नंबर आया, " कहिये, क्या तकलीफ है?"

"तहलीफ!"

"यहाँ हर कोई तकलीफें लेकर ही आता है !"

"हाँ, वैसे मुझे भी तकलीफ तो है।  रात को नींद नहीं आती; काफी दवा बदल बदल के लिया, पर कोई असर नहीं हो रहा है। "

"इंसान को नींद आती है, सुलतान को नहीं।  समझ में आया; या फिर और कुछ बताना होगा ?"

"कोई ताबीज , कोई दवा!"

"पढ़े लिखों को ताबीज आदि देना ही बेवकूफी है ! तुमने इंसान और सुलतान को मिलाकर रख दिया ; तो नींद कैसे आएगी ! रात को जब बिस्तर पर जाते हो तो यह भूल जाया  करो कि तुम इस देश के सुलतान हो, तो फिर नींद आ ही जायेगी। "

हप्ते भर में राष्ट्रपति जी को फ़कीर बाबा के बताये नियम से चलने का फल मिल गया; नींद भी आ गई, सफलता भी मिलने लगी।  दिमाग पर से मानो किसी ने एक परदे को ही खींचकर अलग कर  दिया ।  फकीरी पर पहले से ही उन्हें कुछ विश्वास था, वो और बढ़ता चला गया।  उस शहर में आते ही महोदय बाबा के दरबार में जाते थे।

ब्राहण की गाय

ब्राह्मण देवता को एक गाय दान में मिली; उस गाय को लेकर महाशय घर तो आ गए, पर रखें कहाँ? एक छोटी सी कुटिया में अपना सस्त्रीक डेरा लगता है, और उसी के बगल में मनसा देवी का एक उपासना स्थल भी बनाया गया था; फिर गौ माता के लिए मुश्किल से चार गज जमीन बन पाती होगी।  उसके ऊपर से फिर आनेजानेवालों   की कतार लगाती थी।  फिर भी किसी तरह गैया को बाँधी गई; नियमित चारे की व्यवस्था भी की गई। यह तो हमेशा के लिए परेशानी ही बन गई; ऊपर से ब्राह्मणी के कठोर वचन की बौछार चलती थी।  ब्राह्मण देवता तो गाय लेकर फिर पटकथा भूल ही गए, पर मोहिनी  के लिए यह किसी फंदे से कम नहीं; भरपूर खानेवाली गाय एक चटाक भी दूध नहीं देती।  ऐसा दिन भी आ गया जब पगहा छुड़ाकर गैया हरियाली की और भागने लगी।  तंग आकर महिनी ने उसे फिर बांधना ही छोड़ दिया, "जाओ, पड़ोस में कई खेतिहरों का बसेरा हैं, मांगकर काम चला लो। "

गौ माता को मान भाषा की समझ आई हो, चलते हुए दो चार बार मुड़ मुड़कर पीछे देखने लगी; अपना हिस्सा पाने के लिए दोपहर को घर आ जाती, हिस्सा पा लेने के बाद फिर चल देती। आनेजाने का यह सिलसिला चलता रहा।  हर बात की स्थिरता आ गई होगी ऐसा भी नहीं।  उसपात कईओं की नजर भी थी।  वे खिला पिलाकर गौ माता का विश्वास हासिल करने का प्रयास करते रहे।  फिर अकेली गैया ज्यादे दिन अकेले रहेगी क्या! उसे अपने जैसों की तलाश ही थी, जो जन्मेजय साहूकार के गौशाला में मिल ही गया।  उस पड़ाव तक गैया का कदमताल बना रहा, उसके बाद मुड़कर वापस आने की बात और दोपहर के भोजन में से हिस्सा मांगने की बात मानो भूल ही गई। 

पूजापाठ से वापस आने के बाद रोज ब्राह्मण देवता भगवती के बारे में पूछते और मन मोटाव को बनाते हुए किसी तरह भोजन कर लेते। महीने भर   से सामने का परिसर खाली देखकर उन्हें लगा कुछ इंतजाम करना चाहिए; पता नहीं कड़ी धुप में गौ माता कहाँ डेरा डालती होगी?   कुछ खाने के लिए मिलता भी होगा या नहीं! कई बात सोचकर उन्हें पीड़ा भी होती थी।  अपने देश की कथा है ही निराली; यहाँ गौ माता को पूजनेवाले और काटकर खा लेनेवाले साथ साथ रहते भी हैं और जीविका के लिए अनुसंधान भी करते हैं।  कहीं विपरीत   प्रकार से बने प्रयोगशाला में गौ माता को ले जाय गया हो तब तो पाप ही लग जाएगा।  यह सोचकर ब्राह्मण देवता अपने काम काज छोड़कर तलाशी अभियान चलाने लगे। 

बलभद्र ब्राह्मण देवता का बचपन का मित्र, उसे किसी साहूकार के गौशाला में ब्राह्मण देवता की गाय नजर आई।  खबर फ़ैल गई; पंचायत बैठी; निर्णय यह हुआ कि कुछ खर्चा पानी देकर साहूकार के पास से ब्राह्मण देवता भगवती को वापस ले जाएंगे।  इसबार भगवती बगावत पर आ गई , और अपने साथी सहपाठी को छोड़कर ब्राह्मण देवता के घर आने से इनकार कर दिया।  जिस साईकिल के पीछे बांधकर उसे लाया जा रहा था वो साईकिल भी चकनाचूर हो गया; ऊपर से कई घाव भी बने ! आखिर सौदागर की बुद्धि भी सौदों के इर्द-गिर्द ही चलती है; जाहिर सी बात थी कि एक सस्ते का सौदा हुआ और गौमाता को हमेशा के लिए साहूकार के गौशाल में जगह मिल गई। 

घर आने के लिए ही ब्राह्मण देवता चले थे, बीच पड़ाव में उन्हें फिर से बलभद्र से मुलाकात हो गई; लम्बी चर्चा भी चली।  उन्हें इसबात का भी पता चला कि भगवती को उनके घर पर ही उपेक्षा मिली, यही कारण रहा होगा कि उसने साहूकार के घर से वापस आने के लिए राजी नहीं हो रही थी।  जब भी कुछ कारनामें को अनजाम दिया जाता है तब उसके पीछे किसी न किसी किरदार की भूमिका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आँकी जाती होगी।  इस दृष्टि से भगवती का बेघर हो जाने के पीछे भी ब्राह्मणी का ही हाथ माना गया।   एक मानवी होने के कारण उसमें श्रद्धा , भक्ति, ईश्वर अनुराग सहज रूप से ही रहता होगा; पर दृश्य जगत में कुछ कारनामों के जरिये उसने इसका प्रदर्शन ठीक से शायद नहीं किया होगा।  ब्राह्मणी को भी उसके किये का पछतावा था; साथ ही साथ मजबूरी भी थी।  गरीबी की मार झेलनेवाले परिवार से हम शायद ही यह उम्मीद रख सकें कि अपना पेट काटकर भगवती का पेट भरें; उसपर से तब जब ऐसा करने से कोई नगद नारायण अत ही न हो!

ब्राह्मणी को लगा कि भगवती आ ही रही होगी, इसबार उसने अपनी चूड़ियां बेचकर चारा लाकर रखने का इंतजाम किया; कमसे कम महीने भर की चिंता से मुक्त होने का मौका मिले! अब उसे बाहर नहीं छोड़ा जाएगा।  पर ईश्वर को यह योजना मंजूर न थी, नतीजा हुआ कि ब्राह्मण देवता मलहम पट्टी और दवाई के साथ थपेड़ों को झेलते हुए घर वापस आये; साथ में खंडित हुआ पगहा भी था।  कुछ कह पाने की स्थिति में भी न थे।  आकर बिस्तर पर   लेटे और कम्पित स्वर में एक लोटा पानी माँगा; वह पीने के लिए या फिर हाथ धोने के लिए, यह भी स्पष्ट नहीं हो रहा था।  

शंखनाद

आज हमें यह सोचने में भी शायद कुछ अलग ही लगता होगा जब हम एक जानकारी पाते हैं कि युद्ध शुरू होने से पहले शंखनाद से कुरुक्षेत्र की धरती को पवित्र किया गया था; पितामह, गुरुदेव, सभी भ्राता, प्रमुख  योद्धा और स्वयं जगदीश्वर भी अपने अपने शंख साथ में लाये थे; उन सभी शंखनाद से सुर, असुर, राजा, सेनानायक, राठी, महारथी और स्वयं जगदीश भी युद्ध क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का भान कराते रहे। 

शंखनाद से ही सभी कर्मकांड शुरू करने की बात और उसी शंखनाद से कर्मकांड समाप्प्त करने की बात हमारी जानकारी में आयी जरूर; पर रण क्षेत्र   में  अगर वैसी परिस्थिति का निर्माण हो तब हमें फिर से उस कर्म काण्ड के बारे में विचार करना होगा जिसमे युद्ध को भी शंखनाद से शुरू करने के बारे में और सूर्यास्त के बाद इस रण को फिर से शंखनाद के जरिये समाप्त कर देने की बात कही जाती हो। आधुनिक युग का युद्ध है ही निराला; कहीं कहीं पर अंधकार का सहारा लेकर , छिपकर , शत्रु को कोई मौका न देते हुए आक्रमण कर दिए  जाते होंगे; तो कहीं सूचना जाल का सहारा लेकर मशीनें खराब कर दिए जाते होंगे; और फिर कहीं पूरी दुनिया को चार पांचबार विनष्ट कर देने की योजना बन रही होगी; योजना बनाने वालों को शायद ही इस बात की जानकारी रही होगी कि  संसार विनष्ट होने के बाद फिर किसी भी मनुष्य के लिए धरती पर स्थान नहीं बन पायेगा; संसार के रचना तंत्र के साथ खेलने का अर्थ हुआ विनाश लीला शुरू करने के लिए जगदीश्वर श्री हरि को शंखनाद करने के लिए मजबूर कर देना।

हमें जगदीश्वर के शंखनाद के विपरीत चलने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए; वैसी पात्रता भी किसी मनुष्य को नहीं मिली; सूर्य से ऊर्जा लेकर उसी के सहारे भोजन बनाकर अन्य सभी जीव का पोषण करने की जिम्मेदारी; प्रकृति में संतुलन बनाये रखने की जिम्मेदारी जिस भाँती जिस जीव को मिली होगी उसे वैसा ही करते रहना होगा; शंखनाद करके शिकारी कभी भी शिकार पर झपट्टा नहीं मार पायेगा; या फिर किसी अपराधी को पकड़ते समय किसी दरोगा को शायद ही हम शंखनाद करते हुए देख पाए!

कुरुक्षेत्र में शंखाबाद के जरिये मानसिक और बौद्धिक संघर्ष की सूचना हो जाने के बाद दोनों पक्षों  की सेना में व्यूह रचना की ओर नजर डालने का मौका मिला; आधुनिक युग में शंखनाद के जरिये युद्ध शुरू करने की बात को  बेमानी मान लेने को हम जल्दबाजी ही मानेंगे; शंखनाद के पैमाने और तरीके भले ही बदल गए होंगे पर अभी भी युद्ध के पहले   अखबार के जरिये, प्रचार नाध्याम के जरिये, पत्राचार, सभाएं और सेना स्थानान्तरित करने के जरिये युद्ध का शंखनाद ही होता है।  सेनानायकों के आपसी मेल मिलाप को भी हम शंखनाद ही मानेंगे।  इतिहास साक्षी है कि अपने देश में संघर्ष और नरसंहार रोकने के लिए शंखनाद किये गए थे; भले ही उस शंखनाद के बाद हमें शंखनाद करनेवाले सैनिक के जीवन पर संकट का बादल धूमायित होते हुए देखना पड़ा; और फिर उन्हें हमसे दूर कर देने का प्रयास भी किया गया; सभ्य जनजाति को सभ्यता की शिक्षा देने के क्रम में भी शंखनाद करनेवाले सेनानायकों की जानें संकट में आयी; उनके ऊपर हथियार का प्रयोग करनेवालों को शायद इस बात का अनुमान भी न रहा होगा कि शरीर छुड़ा लेने से किसी जननायक को जनता जनार्दन के ह्रदय से दूर नहीं किया जायेगा; ऐसा कर पाने के बारे में सोचनेवाले भी बुद्धि से कमजोर ही माने जाएंगे।

युद्ध को कभी हमने शुरू होते हुए जरूर देखा होगा; पर इसकी समाप्ति की ओर संसार को एकरूप होते हुए आज तक नहीं देख पाए।  युद्ध संस्कृति का जो भयानक परिणाम रहता होगा उसे देखकर इतिहास से सीख लेनेवालों की संख्या भी कई होंगे; पर वैसा लड्डू किस काम का जो हमेशा हमेशा के लिए एक डब्बे में ही रख  दिया जाय? हमें ऐसे अग्रज की तलाश हमेशा से रही जो जनता जनार्दन के ह्रदय सम्राट बन पाएंगे; अपने यहां भी ऐसे महात्मा आये जिन्हें ह्रदय सम्राट बनते हुए भी हमने देखा; और फिर उन्हें हम  सही प्रकार से समझ ही नहीं पाए।  शास्त्र में भी कुछ ऐसी ही मान्यता बन रही है कि जगदीश्वर श्री हरि के सही स्वरुप को हम शायद ही ठीक से समझ पाएं! आखिर सागर की गहराई के बारे में जानकारी पाने के उद्देश्य से निकलनेवाले नमक के पुतले को कभी न कभी पिघलना तो पड़ेगा; उसके बाद यह फिर कोई माने नहीं रखता कि जगदीश्वर के शंखनाद से सृजन का निर्देश मिला या विनाश की लीला रची गई!

हम उस अवसर की बंभीरता के बारे में सिर्फ कल्पना कर पाएंगे जब सभी रथी महारथी योद्धा के शंखनाद से कुरुक्षेत्र की भूमि को प्रकम्पित किया गया होगा; उसके बाद फिर श्रीहरि के पांचजन्य की भी बारी आयी होगी; पर श्रीहरि के शंखनाद के जरिये प्रसारित की जानेवाली विनाशलीला को शायद ही कोई पक्ष के महारथी ठीक से समझ पाए होंगे; अगर समझ पाते तो फिर श्रीमद्भागवद्गीता में एक ही अध्याय रहता और सव्यसाची के आसपास अन्य सेनानायकों की कतार लग जाती; क्यूंकि उस परिस्थिति में उन सभी को श्रीहरि के पास रचनाधर्मिता का और आध्यात्मिक चेतना का गुप्त मन्त्र जो लेना था ! पर ऐसी परिस्थिति बनते हुए हम नहीं देख पाए। परिणाम हम सबके सामने है; युद्ध शुरू हो जाने के बाद एक योद्धा के मन में युद्ध के भीषण परिणाम के बारे में सोच विचार पनपे, और फिर उसे अगर ऐसा लगने लगे कि युद्ध न करते हुए अरण्य जीवन स्वीकार कर लेना श्रेय होगा  तो फिर हमें खुश होना चाहिए! पर इस बात को जानकार श्रीहरि काफी नाराज हो गए और उस भावना को एक योद्धा के ह्रदय में पनपनेवाली कायरता, कमजोरी, अज्ञान और हीन भावना कह दिया।   वस्तुतः रण भूमि का बीच का क्षेत्र किसी भी योद्धा के लिए शांति, अहिंसा और संतोष की बात करने के लिए स्थान, काल  या फिर पात्रता  के मापदंड से उपयुक्त स्थल नहीं मान  पाएंगे ; जगदीश्वर भी ऐसा नहीं मान पाए; इस प्रयास को उन्होंने स्वधर्म के निमित्त से भी गलता बताया ।  इसी लिए श्री हरि उस योद्धा को युद्ध करने के लिए बताते रहे।

…… (विषाद योग शीर्षक पुस्तक से ; प्रस्तुति: चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता)

 

अगला पड़ाव

 


काफी अवधि के बाद फिर से उस पवित्र भूमि पर बैठकर पवित्र जीवन के बारे में संतों से सुनने का मौका मिला।  वह माहौल ही अनोखा  था जब मैं आचार्य विनोबा को उन संतों के बीच प्रत्यक्ष रूप से मूर्त होता हुआ देख रहा था और यह भी महसूस कर रहा था कि मुझे भी कुछ ठोस कदम उठाते हुए ज्ञान गंगा के पवित्र सरोवर में संतरण करने के कार्यक्रम को नित्य नैमित्यिक अनुक्रिया बना लेना चाहिए।  तत्व को आधार मानकर उसकी गहराई में उतर जाने के लिए कई दिव्य जनों को प्रयत्न करते हुए देखकर भी मन , बुद्धि और चित्त को एक समाधान मिलता है और हम शाश्वत मार्ग ार चल पड़ने के लिए कुछ साहस जूता पाते हैं। इसे एक प्रात्यक्षिक भी समझा जाना चाहिए जिसके जरिये हमें अपने सामुदायिक जीवन के अगले  पड़ाव के बारे में अपनी समझ बनाने की जरुरत महसूस हो रही है। 

यह तो स्वाभाविक ही है कि कुछ लोग पैसों के लिए काम करेंगे और अन्य कुछ लोग प्रतिष्ठा के लिए; उन दोनों समूहों से अलग हटकर कुछ ऐसे भी दिव्य जन  होंगे जन्हें न तो पैसों का प्यास रहेगा और न ही प्रतिष्ठा कि भूख।  उन्हें सार्विक समाधान के अनुसंधान के निमित्त से दिव्य पथ पर चलना होगा ; इसी में वो अपने जीवन का समाधान मानेंगे और तीसरी शक्ति का हिस्सा बन जाना पसंद करेंगे।  उस तीसरी शक्ति की बिरादरी भी बड़ी होनेवाली है। 

इस सफर को स्वार्थ से परमार्थ की ओर किया जानेवाला सफर समझा जाना चाहिए; इसे कुछ और स्पष्टता से समझने के लिए हम यह भी प्रत्यक्ष कर पाएंगे कि हमारा जीवन निसर्ग के अधीन है; उसकी कुछ सीमाएं भी निर्धारित कर दिए गए हैं, उस सीमा में ही हमें बने रहना होगा; उस सीमा से हटकर हम ग्रहों और नक्षत्रों तक का सफर नहीं कर पाएंगे; उसी प्रकार धरती कीसीमा सूर्य के परिमंडल तक; सूर्य की सीमा ब्रम्हांड के परिमंडल तक; ब्रम्हांड की सीमा ऊर्जा और अदारथ के बेच के समन्वय तक; ऊर्जा और पदार्थ के समन्वय सृष्टि और विनाश के चक्र तक सीमित कर दिया गया।  सिर्फ परम सत्ता को ही असीम रखा गया।  उस परम सत्ता को समझ पाने का लिए हमें अपने सीमित पगडंडी से बाहर तो आना होगा ही।  

क्या उस दिव्य जीवन की ओर दिव्य कर्म के जरिये चलने की तमन्ना सभी आम जनों को भी रखना चाहिए, या फिर इसे किसी ख़ास वर्ग तक ही सीमित समझा जाय? यह तो वैसा ही हुआ जैसे छोटी मछलियां सरोवर में ही रहे और सिर्फ बड़ी मछलियों को समुद्र में उतरकर गोते खाने का सपना देखना चाहिए; पर हकिअक्त में विस्तीर्ण जलराशि का साम्राज्य सबके लिए सामान रूप से सुगम बना दिया गया।  यह नैसर्गिक होने के साथ साथ शाश्वत मार्ग का द्योतक भी समझा जाएगा।  

त्रिवेणी

आ मदालसा बुआ और पूज्य भाया के मिमित्त से मेरा वर्धा प्रवास और साथी संस्थाओं से संपर्क सं १९९५ से जारी है।  उत्तर बुनियादी के अभ्यास , शिक्षा शोध और जल, जंगल जमीन विषयक अध्ययन के निमित्त से भी संस्थाओं और कुछ सरकारी संघों के साथ रिश्ते बने।  वर्धा प्रवास उन सभी संबंधों का केंद्रीय पक्ष है। 

पूज्य भाया और मदालसा बुआ के साथ जुड़े रहने का एक बड़ा सन्दर्भ उस त्रिवेणी से है जो पूज्य जमनालालजी, पूज्य बापू और आचार्य विनोबा के कारण बना।  श्री जमनालालजी पर यह जिम्मेदारी दी गई थी की क्रांतिकारी परिवारों को मदद पहुंचाएं और उनके बहु बेटियों को संरक्षण दें; जो कि उनहोंने बखूबी निभाया।  उसी निमित्त से वो कई बंगाली परिवार में भी आते रहे और प्रत्यक्ष रूप से मदद भी पहुंचाया।  बचपन से हमें यही सिखाया गया कि पूज्य भाया और मदालसा बुआ अपने हैं; उनसे हमारा गहरा रिश्ता है। गिने चुने साथी संस्था को तकनीकी मदद पहुंचाने के क्रम में अन्य कई संस्था से भी सम्बन्ध जुड़ गया।  वह सिलसिला आज भी जारी है।  मेरी और से किसी भी संस्था से समर्थन या सहयोग पहुंचाने का क्रम बंद नहीं किया गया।  जहां दिशा और पैमाने बदल जाते हैं वहाँ कुछ हद तक दूरियां बन जातीं हैं।  

सहज रूप से मैं आचार्य विनोबा को आधुनिक संत मानता हूँ और यह भी महसूस करता हूँ कि उनके बताये लोक नीति और लोक व्यवस्था के अद्घार पर किसी भी संस्था संघ को सक्षम बनाया जा सकता; वह फिर अपना देश भारत या फिर विश्व जगत ही क्यों न हो।  अगर सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि जनता जनार्दन का सबसे बड़ा हिस्सा ऐसा ही जी जय श्री राम या जय रावण खुलकर नहीं बोलता; वो सिर्फ जय ही, जय हो बोलते हैं और जिस तरफ पल्ला झुका उस तरफ झुक जाते हैं।  कभी सिकंदर विश्व जय करने निकले थे और भारत में जब उनका अभियान चल रहा था तब कुछ ऐसे संत मिले जो अपने लिए दिध गज की जमीन नाप रहे थे।  उनसे इसका कारण पूछ गया तो उनहोंने कहा कि सिर्फ उसी जमीन से उनका वास्ता होनेवाला है; वो भी कुछ पल के लिए , उसके बाद वो भी मिट जाएगा।  उनमे से एक संत ने सिकंदर को कहा, "राज्य जय करके तुम्हारा सिंहासन पर बैठना संभव ही नहीं ही पायेगा, उसके पहले तुम्हने तुम्हारा शरीर त्यागना होगा और तुम्हारा भी उस डेढ़ गज जमीन से ही वास्ता होनेवाला है। "

सिकंदर ने फिर अपने साथियों से कहा, "इस प्रकार के संतों क न तो प्रतिष्ठा कि लालसा है और न ही धन और भूमि का प्रयोजन, उन्हें सिर्फ लोक हितार्थ काम करते रहना है।  अगर कोई इन महात्माओं का विश्वास जीत लिया तो वह भारत भूमि पर राज करेगा। "

भारत के इतिहास में शायद ही ऐसा कोई पल आया हो जब्ब उसके शाशकों ने किसी पर हमले किये हों, या फिर किसी देश को लूटा हो ; ार अत्याचार सहने और मुसीबतें झेलने की परमार सी चली आ रही है।  गुलामी के क्रम में एक बड़ा मोड़ तब आ गया जब बम्बई के एक अंग्रेज अफसर एल्फिंस्टन ने अपने सम्राट से पत्राचार करते हुए भारत को हमेशा के लिए गुलाम बनाने का मसौदा लिख डाला, "संस्कृति किसी भी सम्प्रदाय की रीढ़ की हड्डी होती है।  अगर हम उस सम्प्रदाय को गुलाम बनाना चाहते हों टी हमें उस हड्डी में विकार लाना हगा।  अंग्रेजी सीखा देने से भारत के सम्प्रदाय में विकार आ जाएगा और ये गुलामी करने के आदि हो जाएंगे।  इसके लिए उन्हें मयबोध से अलग हटाकर सिर्फ भाषा, गणित और कुछ वयवहार सिखाना होगा।  वो अपनी संस्कृति से काट जाएंगे और अंग्रेजी संस्कृति से जुड़ जाएंगे।  फिर यह माने नहीं रखता कि हम भारत में हैं या नहीं; भारत के लॉग सदियों के लिए अंग्रेजियत कि गुलामी करते रहेंगे । "

 इस बात का संकेत भारत के मनीषियों को मिल चूका था।  इसे रोकने के लिए सबसे ठोस कदम उस त्रिवेणी ने उठाया जिसका जिक्र पहले किया जा चूका है।  नै तालीम को अमली जामा पहनाने का काम और रचना कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर लग जाने कार्यक्रम उसी दिशा में किया जानेवाला पहल था।  स्वतंत्र भारत में फिर संस्था संघ के पैमाने और दिशा बदलते गए और उस त्रिवेणी से निकले स्वराज और स्वावलम्बन कि धरा को कहीं खो जाते हुए देखा गया।  लोक सेवक और उन सेवकों के संघ कि बात तो अछूती रही; कुछ और ही सेवक संघ बनाते रहे और जनता जनार्दन के अरमाँण को बारी बारी से कुचला जाने लगा।

आचार्य विनोबा यह भी समझ चुके थे कि जान, जार और जमीन क लेकर संघर्ष की स्थिति बन सकती है।  इसलिए उनहोंने सभी कार्यकर्ताओं को भूदान यजन में लगाया और खुद भी कूद पड़े।  आज भी हमें इतना तो विश्वास है ही कि किसी भी प्रकार की उन्मत्तता से जनता जनार्दन क मुक्त करने का काम उस त्रिवेणी के kund से ही किया जा सकेगा।  इतना जरूर है कि सूचना तंत्र के युग में उस तत्व कि गहराई में उतरकर हमें संघबद्ध होकर काम करना होगा।  संघबद्ध होने का पहला सिद्धांत यही है कि हम सभी भेद बुद्ध से ऊपर उठकर लामबंद ह सकें और समस्याओं से उभरने का प्रयास करें।

कई बार ऐसा लगता था कि मदालसा बुआ और भाया के गुजर जाने के साथ साथ मेरा शायद वर्धा प्रवास छूटेगा; पर प्रेम सम्बन्ध इतना गहरा  था कि उस प्रेम सम्बन्ध को शायद इस jeevan में खंडित नहीं किया जा सकेगा।  विश्वास और विश्वसनीयता के यही पैमाने हैं जिसके आधार पर हम संघबद्ध होने का प्रयास करते हैं; फिर भौतिक दूरी बेमानी हो जाती है।  बाबा विनोबा में एक हुनर तो था कि वो हर व्यक्ति से काम ले लेते थे; उनहोंने डाकुओं से भी हथियार डलवाया और उन्हें समाज कि मुख्य धरा में मिवाया; श्री जमनालालजी उस सरस्वती धरा कि भाँति बिना  थके कार्य करते रहे। 

क्रान्ति वीरों के परिवार के साथ एक और परेशानी ऐसी थी कि उनके बच्चों को स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाटा था।  उन बच्चों को उठाकर आना, बुनियादी शिक्षा से शिक्षित करना होनहार बनाना, यह भी उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी रही।  इन यादों को ताजा होते हुए तब महसूस करता हूँ जब ब्रह्म विद्या मंदिर में दाखिल हो जाता हूँ और वाहन बेस वरिष्ठ जनों से बातचीत करने लग जाता हूँ।  मेरे लिए यह गर्व का ही विषय है कि उस तत्व सममान के वातावरण में मैं पला बढ़ा और वही संस्कृति मुझे विरासत में मिल गई। देश में उन्मत्तता और माहौल का बिगड़ाव देखने से पीड़ा होती है और अपने शोधार्थी स्वभाव के कारण विविध प्रकार से समाधान सूत्र निकालने के लिए मन बेचैन हो उठता है।  कुछ संस्था संघ से मुझे कुछ उम्मीदें तो हैं; पर उनकी मर्यादा और सीमा को समझते हुए मैं इसे जाहिर नहीं कर सकता।  कहते हैं अर्थ ही अनर्थ का मूल है , इस बात को सत्यापित करते हुए संस्था संघों में भी भटकाव देखा जा रहा है; उनके कई इकाइयों के पैमाने और दिशा बदल भी रही है।  इन सबको जोड़ने का विज्ञान भी तत्व कि गहराई में ही निहित है।  गीता में भी श्री कृष्ण आखिर में अर्जुन से कहते हैं, "यजन, दान और तप त्यागने योग्य नहीं हैं; इसका अनुपालन तो सबको करना चाहिए ।"

मानव का जीवन मात्र ही किसी न किसी उद्देश्य को पूरा करने के निमित्त हुए हम महसूस कर सकेंगे; किसी भी रोजगार (या जिसे हम जीविका उपपार्जन के लिए किया जानेवाला वृत्ति कहते होंगे) व्यक्ति का लगे रहना एक नैसर्गिक विधान ही मन लेना होगा।

"मैं कर्म नहीं करता, मैं ज्ञान मार्ग का उपासक हूँ, मैं व्यक्ति जीवन से संन्यास ले चूका; मेरे लिए कोई कर्म शेष ही नहीं रहता; मैं कर्म के बंधन से मुक्त होकर दिव्य जीवन का पथिक बन चूका हूँ; आदि कहनेवाले किसी भ्रम में रहकर कर्म विमुखता का प्रदर्शन करते होंगे।  महर्षि वेदव्यास स्थान स्थान पर कई बार श्री भगवान के जरिये इसी बात का स्पष्टीकरण करते हुए बार बार  कर्मी, ज्ञानी और भक्त को जीवन पर्यन्त कर्म में जुड़े रहने की शिक्षा देते आये।  उस तत्व पर लम्बी लम्बी व्याख्यान लिहनेवाले संत महात्मा भी "उस यज्ञार्थ कर्म"; "ज्ञानाग्नि दग्ध कर्म"; विधायक कर्म; नित्य कर्म ; आदि विषयों पर अपने अभिमत देते हुए; और ऐसा भी कहते आये कि साधक, भक्त, ज्ञानी, प्रजा पालक आदि सभी जीव के लिए नित्य और विधायक कर्म में लगे रहना ही होगा।

इस विषय को अधिक स्पष्ट करते हुए हम दैनिक जीवन से कुछ उदाहरण जरूर ले सकेंगे।

गुजरात के किसी गांव में जाकर एक युवा सन्यासी दिनभर व्याख्यान देते रहे; उनके पास शंकाएं और व्यक्तिगत समस्या लेकर आनेवालों की कतार लगी रही।  ऐसा करते करते दिन बीता।  संध्या के समय जहां उनके लिए रात्रि वास की व्यवस्थ की गई वहाँ भी कुछ श्रीमंत लोग आते रहे, चर्चाएं चलती रही; ज्ञान की गंगा भी बही।  अंततः देखा गया एक महाशय चुप्पी साधे कमरे के एक कोने में काफी देर बैठे रहे।   

महाराज जी को लगा उस आगंतुक को भी कोई समस्या रही होगी; सबके सामने शायद नहीं कह पा रहे हैं ; फिर पूछे, "सब तो चले गए! तुम्हें कोई तकलीफ है तो कह सकोगे। "

"तकलीफ?"

"यहां तो सभी आगंतुक तकलीफें और शंकाएं लेकर ही आते रहे!"

"हाँ, वैसे मुझे भी एक तकलीफ तो है। सब तो गए, अब आपके भोजन की क्या व्यवस्था होगी? मैं तो ठहरा हरिजन, आपको पका हुआ भोजन लाकर दे भी नहीं सकता; और आपको इस तरह भूखा छोड़कर जा भी नहीं सकत। "

युवा सन्यासी इस भूमिका में किसी अनपढ़ ग्रामीण को देख पाने के लिए मानसिक रूप से तैयार न थे; इसलिए उन्हें कुछ अजीब ही लगा।  वो शास्त्र के जानकार थे, संन्यास के मार्ग पर नए थे; गीता का ज्ञान उन्हें भी था; पर भूमियकायें बांधकर खुद को श्रेष्ठ मानने लगे थे।  अतः किसी ग्रामीण, और ऊपर से हरिजन में, इस प्रकार की परिपक्वता उनके अहंकार के तिनकों को हटा दिया; आँखे आंसू से भरा; यह सोचने लगे इस हरिजन ने उनके पिता का काम कर दिया ; सभी ज्ञानी, तत्व वेत्ता पंडितों को लज्जित भी कर दिया।

"हरिजन हुए तो क्या हुआ तुम ही पकाकर ला दो !"

"लोग क्या कहेंगे! मेरे हाथ से खाने से आपको भी लोग कोसेंगे; आपकी जात भी चली जायेगी; ऊपर से ठहरे महंत ! "

"अब तो तुम्हारे हाथ से ही भोजन लेना होगा; नहीं तो एक्डिन में क्या होगा, भूखा ही सो जाऊंगा। "

अंततः उस हरिजन के जरिये ही भोजन की व्यवस्था की गई , वही खाकर युवा सन्यासी सो गए। यहाँ आगंतुक हरिजन अपने वैयक्तिक गुणधर्म के आधार पर युवा सन्यासी के लिए भोजन का इंतजाम किया किसी स्वार्थ की भावना से ग्रसित न होकर यज्ञार्थ कर्म के नियमों के अधीन ही युवा सन्यासी की सेवा में बैठा रहा, अपनी भूमिका आने तक धीरज के साथ बैठा रहा।

गीता  à त्यागी

कभी एक देवस्थान में पुजारीजी के दरबार में कुछ साधक, महात्मा, तत्ववेत्ता धर्म दर्शन विषय पर चर्चा करने बैठे; चर्चा भी लम्बी चली; सब अपने अपने अध्ययन  और हुनर के बारे में लम्बी व्याख्यान देने लगे।  आखिर पुजारी जी की बारी आयी।  उनसे पुछा गया कि गीता पढ़ना क्या सबके लिए जरूरी है?  उनहोंने (पुजारीजी ने) उस प्रश्न पूछने वाले माशय से कहा, "जरा जल्दी जल्दी गीता, गीता……….  कहकर बताओ!"

जिज्ञासु महाशय जल्दी जल्दी कहने लगे, "गीता, गीता, गीतागीतागी ……. त्यागी, त्यागी…………. "

"अब तो तुम त्यागी, त्यागी, त्याग………..  ऐसा कहने लगे! बस, अगर तुम त्यागी का सही मतलब समझ गए तब तो गीता पढ़ना जरूरी नहीं ! "

पुजारी जी का यह भी कहना था, "जब शरीर ही हमारा नहीं तब घमंड कैसा, और मेरा मेरा; मैं करूँ , मैं करूँ इस बात को लेकर झगड़े क्यों?"

गीता और अन्य सभी शास्त्रों में इसी बात को बारी बारी से, कथा और कहानी के जरिये भी वही एक बात को ही बार बार कहा गया ; जो समझ जाते होंगे, उनके लिए ज्यादा पढ़ना फिर जरूरी नहीं रह जाता। भक्त का विश्वास, ज्ञानी का ज्ञान और साधक कि साधना  ; ये सब ईश्वर द्वारा निर्देशित कर्म को करने के लिए ही होना होगा।  असली सुख तो खुद के खो जाने में ही है। ज्ञान कि अपनी एक सीमा भले ही होता हो, पर असल में तो वह असीम ही है, जिसे पूरी तरह कभी आत्मसात नहीं किया जा सकेगा; जो ऐसा मानते होंगे उनके प्रति हम सबके मन में करुणा ही रहेगी।

नमक का पुतला

कभी बड़े  बड़े  विद्वान्  मंदिर के महंत जी का हुनर विषयक जानकारी लेने के निमित्त से मंदिर परिसर में आ गए।  उन सबकी एक ही शिकायत थी कि पुजारी जी विधिपूर्वक पूजा का अनुष्ठान नहीं करते; यहां तक कि भगवान को जूठा भी खिला दिया करते हैं।  सबको भगवान का दर्शन कराने की बात भी करते  होंगे।  अतः शास्त्र, वेद, कर्मकाण्ड विषयक उनके हुनर की परीक्षा लेना जरूरी समझा जाय।  अनुमति भी मिली, परीक्षा, सवाल-जबाब का दिन भी तय हुआ और सबके सब महानुभाव उस कक्ष की और चल दिए जहां पुजारी जी रहते थे।  उनके साथ कुछ और भक्तों का रहना-खाना चलता था; सबके सब घबराये, सिर्फ पुजारीजी के चेहरों पर चिंता की एक भी लकीर न थी; पहले की भाँती बिलकुल "साद प्रसन्न"। 

परीक्षक वर्ग अपना- अपना परिचय देते रहे; उसी में काफी समय बीता; प्रश्न पूछने का सिलसिला कहलाने ही वाला था, इतने में पुजारीजी सबको रोककर अपनी एक छोटी सी बात कहने लगे, "देखो भाइयों, एकबार नमक का एक पुतला सागर नापने निकला , उसकी घर वापसी न हो सकी ! अब मुझे कुछ और न कहना; आप सब सवाल पूछ सकेंगे। "

आनेवालों में कानाफूसी होने लगी,"यह वेदांत सार है! इसका अर्थ यही लगाया जा सकेगा, किपुजारीजी को भागवत, पुराण, वेद, उपनिषद्, गीता का सम्यक ज्ञान रह भी सकता है ; शायद वो ईश्वर के साथ एकरूप हो गए होंगे, इसी लिए उनके लिए कर्मकांड आदि बेमानी लगते होंगे। "

काफी देर तक चुप्पी लगी रही; सबको अपने अपने आधे अधूरे ज्ञान के बारे में चिंता होने लगी; पोल खुल जाने कि पीड़ा भी सताने लगी; प्रश्न पूछने के लिए “पहले आप, पहले आप…..” का सिलसिला चल पड़ा।  आगे आये भी तो कौन! कोई छोटा पुतला तो कोई कुछ बड़ा; समुद्र नापने के निमित्त से पीड़ा सबको ही होनेवाली; सबको बिखरना भी होगा, मिटाना भी होगा और एकरूप भी होना होगा।  अंततः मजबूरी में ही समझें, प्रश्न पूछने का सिलसिला शुरू ही नहीं हो पाया; यहां तक कि उनमें से कुछ साधक भक्त बनकर पिघल जाने कि पीड़ा से छुटकारा लेने का प्रयास करते हुए अपनी राह चल दिए।

भोजन छोड़ देना; अग्नि को न चूना; सिर्फ व्याख्यान करते रहना; आदि संन्यास की उत्तम दशा  नहीं हो सकती; ईश्वर से एकरूपता की स्थिति में सभी मोह माया आदि अपने आप ही मिट जाय करेंगे; अगर मेरा " मैं पन "  नष्ट न हो पाते हों तो कभी कभी "मैं सेवक, तुम सेवक का भान " लेकर ईश्वर के साथ एकरूप होने का सिलसिए चल सकेगा।  फिर धीरे धीरे मेरा "मैं" उस चिरंतन सनातन सत्ता के साथ एकरूप हो पायेगा; आखिर पिघलना ही जीवन की नियति हो सकेगी; कोई पहले ही पिघले, और फिर कोई कुछ दिनों के बाद!

कर्म विषयक शंकाओं का निरसन करते समय भगवान कहते हैं:

न तो कोई केवल कर्म से विमुख रहकर कमर्फल से मुक्ति पा सकने की पात्रता रख सकता और न ही केवल शारीरिक संन्यास लेकर ज्ञान का अन्वेषण करते करते सिद्धावस्था पाने की पात्रता रख सकता। यह भी मान्यता बानी कि क्षण भर के लिए भी कोई कर्म का अनुष्ठान किये बिना नहीं रह सकता; कर्म का अनुष्ठान तो प्रकृति के गुणों के अधीन अपने आप ही होते रहेंगे । सावधानता इस बात की भी रहे कि इन्द्रिय संयम के साथ साथ अंतर मन पर भी नियंत्रण  बने।  सिर्फ बाहरी इन्द्रिय संकुल का नियंत्रण रहे और अंतर मन में उद्वेग, भोग - लालसा आदि बनी रहे तो उन्हें हम पाखंडी  ही कहेंगे, न कि तत्व वेत्ता साधक या कर्मयोगी।  (गीता III - ४- ६)

श्रेष्ठ वही माने जाएंगे जो इन्द्रिय संयम रखने के साथ साथ किसी आशा अभिलाषा के बिना ही नियत कर्म में लगे रहते हैं।  कर्म विमुखता से शरीर का भरण पोषण भी संभव नहीं हो पायेगा; इसलिए नियत कर्म में लगे रहना कहीं श्रेष्ठ मानें। भगवान के सुख के लिए और फल की आसक्ति के बिना अपने नियत कर्म में हमें लगे रहना होगा; इसे यज्ञ के निमित्त से किया जानेवाला कर्म ही समझें; जठर की अग्नि में भोजन की आहुति; ज्ञान रुपी अग्नि में कर्म की आहुति; अहम् रुपी प्रखर तेज में मन के संकल्पों का हवन; दान रुपी यज्ञ में समपदाओं का हवन ; और इसी प्रकार से और कई रूप में यज्ञ संस्कृति का परिचायक कर्म का अनुष्ठान साधक का कर्तव्य ही समझें।  उसी संस्कृति का बखान करने के लिए योगेश्वर समय समय पर, स्थान स्थान पर यज्ञार्थ कर्म की बात करते आये। ईश्वर के प्रति सर्पण के भाव से किया जानेवाला कर्म (यज्ञार्थ कर्म) सदैव मंगलदायक ही होगा; इसके अनुष्ठान से दिवाता और मानव के बीच समन्वय की भी स्थापना हो पाएगी; साधक खुद का सन्निधि में भी ईश्वर के अधिष्ठान रूई शाश्वत सत्य का उदघाटन कर सकेंगे। (गीता III – ७-१२  )[1] 

 

दूसरे क्या करें क्या न करें यह देखना भी अनुचित हगा, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे मन  में जो तत्व और विचार अनपटाए हों उसके विरोध में कोई कार्य करके हम कमसे काम अपने से चल न करें। इस वक्त इतना तो जरूर कहा जा सकेगा कि उस त्रिवेणी के कुंड में मैं बसेरा बना चूका हूँ; आगे क्या पड़ाव आनेवाला है इसका भी मुझे ज्ञान नहीं।  अपनी अनुसन्धित्सा बनी रहे यही अभिलाषा है।



[1] दान को यज्ञ रूप से करने की संस्कृति अपने समुदाय में कोई नया विषय नहीं है; इसे हम काफी प्राचीन समय से; वैदिक संस्कृति के काल से ही सुनते आये हैं।

"सच्चे कर्मयोगी अपनी गृहस्थी के कार्यों को पूरा करते हुए अपने सभी कार्यों को ईश्वर के प्रति सरन के भाव से  यज्ञ के रूप में करते हैं और केवल इष्ट को ही  सभी कर्मों का भोक्ता मानते हैं।" ….. श्रीमद्भागवतम्-4.30.19

कर्म संन्यास

 

ज्ञान और भक्ति का सही सम्मलेन ही वह पड़ाव है जहाँ से कर्म को एक सही दिशा मिल जाया करेगी और व्यक्ति अपने लिए एक निर्णायक मार्ग कि तलाशी कर सकेगा ; उसे अंतरात्मा के साथ जुड़े हुए परमात्मा का सान्निध्य भी अनुभव होता रहेगा।

कभी कभी हम इस भ्रम में आ जाते हैं जब मन में यह विचार पनपने लगता है कि धर्मात्मा और महात्मा बनने के लिए शायद सबकुछ छोड़कर सभी विधायक कर्मों का त्याग करके तपस्या करते रहना पड़ेगा ; शायद दिन और रात के बारे में भी जानकारी न मिल पाएगी; शायद सभी रिश्ते नातों का त्याग कर देना होगा; ऐसा भी हो सकता कि किसी एकांत में जाकर समाज से हटकर उपायाचक के नाते जीवन जीने के लिए प्रस्तुत होना पड़े।  ऐसे संत महात्मा जरूर हुए जिन्होंने भोग्य वस्तु का त्याग करके ज्ञान मार्ग पर चलकर भक्त वत्सल के लिए मिसाल कायम कर गए। पर ऐसा शायद ही हुआ होगा जिसमें किसी तपस्वी साधक ने भोजन, श्वास वायु और शौच संतोष का त्याग किया हो ; जीवन जीने के प्रयत्न के अंतर्गत हर जीव को भोजन, श्वास वायु, शौच , संतोष आदि का सहारा तो लेना ही होगा।  यहीं से जीव मात्र के लिए यह अनिवार्य बन जाता है कि उन्हें प्रकृति के अधीन रहना पड़े और प्रकृति के कुछ नियमों का पालन करे।  साधना कितनी भी गहन हो बीच में नींद आने लगे तो फिर तपस्या को विराम देना ही होगा।

 तपस्या, ध्यान, प्राण वायु का नियंत्रण, कर्म कि शुद्धता आदि विषयों के बारे में हम कुछ भी अतिशयोक्ति करते समय इतना तो ध्यान अवश्य रखें कि हमें उस सर्व शक्तिमान के अनुकम्पा के अधीन ही जीवन जीना होगा; उसी विधायक कर्म को भी अपनाना होगा जिसके बल पर हमारे जीवन का रथ गतिशील हो सके; उन्हीं लोगों के बीच रहना होगा जिनके बीच हमारे मन को संतोष मिले; उन्हीं लोगों के लिए काम करना होगा जिनसे हमें कुछ उम्मीदें रही हो; उसी तत्व का संरक्षण और सम्प्रचार करना होगा जिसके जरिये हम सार्विक समाधान और समन्वय का सपना देखा करते हों; उन्ही तत्वों को प्रतिफलित होते हुए देखना होगा जिनके बीच दिव्य जीवन कि स्वच्छंद गति सुनिश्चित हो सके। 

तीन प्रकार के लोग अपने चारों और तपस्या और इष्ट चिंतन करते हुआ पाए जा सकेंगे: कुछ ऐसे लोग रहेंगे जिन्हें धन - सम्पदा और पैसा चाहिए, कुछ ऐसे भी लोग रहेंगे जिन्हें पैसों से ज्यादा चिंता प्रतिष्ठा पाने कि रहेगी; तीसरे कुछ ऐसे प्रकार रहेंगे जिन्हें न तो पैसा चाहिए और न ही प्रतिष्ठा, उन्हें सिर्फ उस दिव्य ज्ञान का अनुसंधान करने कि अभिलाषा रहेगी जिसके आधार पर व्यक्ति के लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सके।  वह एक ऐसे मार्ग का पथिक होना चाहेगा जिसपर चलकर जन्म-मृत्यु के द्वन्द से खुद को मुक्त किया जा सके। 

आध्यात्मिक परिपक्वता

पहले  पहल  तो एक ऐसी परिस्थिति बनती है जब हम खुद को किसी भी कृति का कर्ता मान लेते हैं और उसी भ्रम जीवन बिता देते हैं कि हमने कुछ किया; कुछ ऐसी कृति जिसका श्रेय हम चाहते हैं कि हमें मिले।  फिर एक ऐसा पड़ाव आता जब हमारी समझ बनती है कि सृष्टि और विनाश तो प्रकृति के नियमों के अधीन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है और इसमें पदार्थ और ऊर्जा का आपसी मेल बंधन का विज्ञान क्रियाशील निकाय बना; यह भी एक भवितव्य ही है है कि हर जीव के जीवन में मृत्यु का अनुशाशन कभी भी आ सकता।  एक पड़ाव ऐसा भी आता है जब व्यक्ति जीवन को काफी मूल्यवान मानते हुए सभी अल्पावधि के सुखों को छोड़कर उस आनंदमय जीवन का पथिक बन जाना पसंद करेगा जिसपर चलकर आत्मा और अरमात्मा के रिश्तों को उनके सही स्वरुप में उपलब्धि किया जा सके और जीव के लिए सम्यक ज्ञान के आधार पर कर्म बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशांत किया जा सके। 

शास्त्र, पुराण, आगम , निगम आदि सभी दिव्य ग्रंथों और संत वाणी का एक ही मकसद रहा कि भक्त को कर्म के बंधन से और माया के संसार से मुक्त किया जा सके; उस मुक्ति के मार्ग पर सबका सम्यक अभिषेक हो सके; यह कुछ ऐसा ही हुआ कि किसी बगीचे में जाकर एक फल खाने के बाद संत सभी भक्तों को बताने लगे और यही आग्रह करते रहे कि बाकी के भक्त वत्सल भी उस बगीचे में दाखिल होकर उस फल का आस्वाद लें और जीवन को धन्य कर लें; यह कुछ ऐसा ही अनुभव मन जाएगा जैसे एक परिंदा ऊंची उड़ान भरते हुए नीले आसमान में गोते लगाता हो; जैसे एक भक्त प्रेम पूर्वक अपने भगवान को भोजन कराता हो और बाकी भक्तों से निवेदन करता हो कि वो भी ऐसा ही करें। इस प्रकार दिव्य जीवन का अनुसंधान करनेवाल साधक कभी भी अकेले मुक्त हो जाने के लिए तपस्या शायद ही करता हो।  उसे समग्र समाज को मुक्त करने कि चिंता सताया करेगी; उसे ऐसा भी लगेगा कि किसी भी भक्त के जीवन में संकट ही न रहे; भक्त वत्सल को ईश्वर अनुकम्पा मिले। यह कुछ ऐसी ही परिस्थिति बन जाया  करेगी जिसके अंतर्गत भक्त प्रह्लाद अपने प्रपंचक पिता के लिए इष्ट के पास क्षमा याचना करते रहे; नचिकेता विधाता से यह निवेदन करते रहे कि उनके पिता को यश और प्रतिष्ठा मिले ; शत्रु भाव नष्ट हो जाने के और भी कई प्रमाण गिनाये जा सकेंगे जिसके बल पर इतना तो अवश्य कहा जा सकेगा कि दिव्य जीवन कि अनुसन्धित्सा रखनेवालों के मन से शत्रुभाव नष्ट हो जाता होगा।  इसके अभ्यासी ही और सटीक तरीके से बता सकेंगे कि उनके मन, चित्त और बुद्धि पर क्या बीत रही होगी जब उन्हें यह तय कर लेना होता है कि ध्रुव सत्य के अनुसंधान में ही जीवन बिताना होगा।  भगवद्गीता में भी कर्म संन्यास और कर्मयोग के बीच हर प्रकार के समानता के बारे में बताई जाती है और यह भी माना गया कि सभी प्रकार के द्वन्द से मुक्त होते होते व्यक्ति माया के बंधनों से मुक्त हो जाया करेगा। केवल अल्पज्ञानी जन इस भ्रम में जकड़े रह जाते हैं कि कर्मयोग और कर्म संन्यास शायद कुछ अलग  अलग विधाएँ हैं।   ( V. १-४ ) 

वास्तव में कर्मयोग और कर्म संन्यास को एक सामान ही देखा जाना चाहिए।  भक्ति के साथ कर्म किये बिना उस परिपक्वता को पाना भी संभव ही नहीं।  सभी इन्द्रियों को भली भाँती वश में रखते हुए बुद्धि का प्रयोग करते हुए कर्म करनेवालों को सहजता से ही कर्म बंधन से मुक्ति मिल जाय करेगी; दृढ निश्चय रखनेवाले खुद को कर्ता न मानते हुए कर्म करते रहेंगे;  कर्मफल इष्ट को अर्पित करदेनेवालों को पाप कभी भी ग्रसित नहीं कर सकता; योगीजन के लिए कर्म का प्रयोजन सिर्फ आत्म शुद्धि पाने से है; आसक्ति रहित होकर कर्म करते रहने के कारण भी योगी जन कर्म बंधन से खुद को मुक्त रखने में समर्थ हो जाया करेंगे; निरासक्त व्यक्ति शरीर में रहते हुए भी सभी रकार के कर्मबन्धन से मुक्त रहेंगे (भगवद्गीता V.  ५-१२) ।  कर्म फलों के बोध का पनपना प्रकृति के अधीन है; सर्वव्यापी परमात्मा भी पाप-पुण्य के कर्मों से निर्लिप्त ही रहेंगे ; मोहान्ध भक्तों की बुद्धि भी अज्ञान से आच्छादित रहेगी ; ज्ञान तो उस सूर्यप्रभा के सामान ही है जिसकी किरणों से संसार प्रकाशमान और व्यक्त हो उठता है; वह ज्ञान का प्रकाश ही है जिसके प्रभाव से सभी प्रकार के पा कर्मों का नाश हो जाया करेगा, इष्ट के प्रति श्रद्धा  और विशवास बढ़ेगा, विधायक कर्मों में लिप्त रहते हुए मुक्ति पाने के मार्ग पर बढ़ाते रहेंगे  (भगवद्गीता V.  १३ -१६) ।

बुद्धि, समझ, श्रद्धा, विशवास और संतोष को किसी भी साधक के जीवन में तभी स्थिर होता हुआ देखा जा सकेगा जब उनके जीवन में  हम दिव्य ज्ञान का उत्सर्जन होता हुआ परिलल्क्षित कर सकें। यह एक ऐसी परिस्थित है जहाँ व्यक्ति सभी नाशवान तत्वों से खुद को मुक्त करते हुए दिव्यज्ञान का साधक बने और ध्रुव सत्य का अनुसंधान करता रहे।  

कभी कभी यह भी दावे किये जाते रहे हैं कि दिव्य जीवन और ध्रुव सत्य का अनुसंधान करनेवालों कि गतिविधि से कर्म विमुखता ही पनपेगी और व्यक्ति कर्तव्य कर्म से भाग खड़े होने के लिए मार्ग निकालने लगेंगे; ऐसे कई साधक बनेंगे जो यह कहकर कर्म विमुख हो जाया करेंगे कि उन्हें समय नहीं मिलता; कुछ ऐसे साधक रहेंगे जिन्हें भक्त वत्सल लोगों के पास से सिर्फ दान पाने कि अभिलाषा रहेगी; कई साधक ऐसे भी हो जाया करेंगे जिन्हें धर्म कि एक नयी  पगडण्डी बनाने कि अभिलाषा रहेगी।  वैसे अनेकांतवादी यह भी विचार रख देते हैं कि "जितने मत हैं उतने ही पथ हैं"।  ऐसा होना भी चाहिए; तभी तो जलधारा को पहाड़ी से उतर आने के लिए विविध मार्ग का अनुसंधान करते हुए अग्रसर रहना होगा; यह भी मान्यता बन सकेगी: सभी धाराएं गंगाजी कि पवित्र धरा रहे और उतना ही मंगलकारी हो।  यह तो हमारी समझ पर ही टिका रहेगा कि हम उस धरा को क्या समझें और कैसे स्वीकार करें।  यह तो कुछ ऐसा ही हुआ कि एक कटोरा लेकर हमने समुद्र से पानी उठाया , फिर उस पानी को समुद्र के विस्तीर्ण जलराशि में मिला दिया और यह तलाश करने लग गए कि समुद्र में मिलनेवाले पानी का कौन सा हिस्सा उस कटोरे में था ! मौजूदा परिस्थिति में विविध प्रकार से विडम्बना का निर्माण होता आया जब हम किसी समुदाय को मतों और पंथों में बँट जाते हुए देखते आये हैं।  संत महात्मा का यही प्रयास रहेगा कि सभी समुदाय को किसी ख़ास मापदंड पर एक किया जा सके और उन्हें शाश्वत मार्ग का पथिक बनाया जा सके; अब उस मार्ग का कुछ भी नाम हो और उस विचारधारा को किधर से भी बहने दिया जाता हो ; अंततः एक ही पड़ाव पर सबका महा सम्मलेन होना एक भवितव्य ही है। 

इसमें कोई संदेह नहीं कि वेद, उपनिषद्, गीता, महाभारत, रामायण, पुराण, आगम ,निगम आदि पवित्र ग्रंथों के जरिये संत महात्मा समय समय हमारा दिशा निर्देशित करते आए और ऐसा आगे भी करते ही रहेंगे; फिर भी एक ऐसा विचार बनता है कि अब जलबिंदु को जलबिंदु ही समझा जाय और हमारा मार्ग उस दैवत्व के विशुद्ध तत्व को सही प्रकार से समझने के लिए बने जिसपर चलकर संत महात्मा समग्र मानव समाज को विशुद्ध दैवत्व के उपस्थिति का अनुभव दे सकें।  जीव मात्र के अभिव्यक्त होने की क्रिया में उस देवत्व को सन्निविष्ट  रहते हुए भी देखा जा सकेगा; सिर्फ इतना ही नहीं उस पूर्ण देवत्व का अंशमात्र को जीव चेतना में भी परिलक्षित किया जा सकेगा। 

एक आश्रम संस्था के प्रमुख थे ; उनको लोग स्वामी बुद्धानन्द कहा करते थे।  उनकी गाड़ी झाड़खंड और ओडिशा की सीमा पर बसे एक जंगल के बीच से गुजर रहा था।  उसी जगह कुछ ऐसे जनजाति बसे थे जिनका कोई स्थायी ठिकाना ही नहीं था; ही हम उन्हें किसी जगह पर स्थायी रूप से बसते हुए देख ही पा रहे थे। ऐसे ही एक स्थानांतरण के मुहूर्त में उसी रास्ते से स्वामीजी और उनके कुछ साथी गुजर रहे थे, जबकि एक जनजाति महिला दर्द से कराह रही थी।  जैसे ही सन्यासी महाराज का काफिला रुका वैसे ही अन्य सभी जनजाति के लोग वो जगह चढ़कर और उस पीड़िता को भी छोड़कर चल दिए; आखिर उस पीड़िता का इलाज करने के लिए चिकित्सकों को उतारा गया; भोजन की व्यवस्था की गई; कुछ भोजन वहीँ छोड़कर वो लोग चले गए।  से पहुंचाने का यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा ताकि बिरहोड़ समुदाय के उस जनजाति का विशवास जीता जा सके।  स्वामी बुद्धानन्द और उनके साथी सम्प्रदाय को छोड़कर अन्य किसी सम्प्रदाय को उस जनजाति का विशवास जीतने में सफलता नहीं मिली। 

उसी जनजाति के नजदीक एक कालिंदी टोला भी था जहां नागदेवता को पकड़ने और बेचने के व्यवसाय से जुड़ा एक कालिंदी बूढ़ा भी रहता था।  एकदिन आश्रम के लोगों के साथ काम में हाथ लगाते हुए खंडहर से निकलनेवाले एक नागदेवता को पकड़ने के लिए उसी कालिंदी बूढ़ा को बुलावा भेजा गया।  उसने ख़ुशी ख़ुशी उस नागदेवता को अपने पास रखी टोकर में डाल दिया।

"इस नागदेवता का क्या करोगे?" स्वामीजी का सहज ही पूछना था ।

"पहले तो दांत निकालना होगा, स्वामीजी", कालिंदी "दांत" शब्द पर कुछ ज्यादा ही बल देकर अपने मन की बात कह रहा था ; और भी काफी कुछ कहा।

"ऐसा क्या किया जाय, जिसके करने पर इसे तुम गहन वन में जाकर छोड़ दोगे?"

यह तो उस कालिंदी के लिए काफी कठिन एक विषय बन गया। मन ही मन सोचा इस संत महात्मा से भी क्या कुछ लेना उचित होगा! पर उसे पैसा टी चाहिए, और फिर यह जो उसका व्यवसाय ठहरा!

ज्यादे देर तक कालिंदी को चुप्पी साढ़े देख महाराज समझ गए कि इसे कुछ बड़े रकम की उम्मीद रही होगी और उसके माँगने में भी कुंठा हो रही होगी।  वो स्वयं ही उनके पिछले महीने के संग्रह में से आधी जे ज्यादे की रकम निकालकर कालिंदी को देने के लिए कहे और यह बोलकर गए कि नागदेवता को कुछ गभीर वन में जाकर प्रकृति की गोद में छोड़ दिया जाय; नैसर्गिक रूप से उसे जो जहर की झोली और विषदंत जैसे मिला होगा उसे भी चढ़ दिया जाय।

पैसों में रखा ही क्या है! भक्तों के पास जाने से और अनुभव कथन कहने से फिर दान मिलाने की संभावना जरूर बनेगी।  सामने चलनेवाला वीर सन्यासी भला तूफ़ान से और जोखिमों से कभी घबराया है, ता फिर आगे कभी घबराएगा ! नागवता को सिर्फ इसलिए भी कैद में रखना उन्हें मंजूर नहीं था को वो जहरीलेल हैं, अनायास ही अन्य जीवों का नाश भी कर देते हैं; नैसर्गिक रूप से मिले विष से वो शिकार भी करते होंगे, भोज्य को भी मौत के घात उतारते होंगे और वैसे प्राणी की जनसंख्या को भी नियंत्रण में भी रखते होंगे; यह तत्व कालिंदी के समझ से परे रहा होगा, पर स्वामीजी भली भाँती समझ रहे थे; स्वामीजी प्राण संचार और संहार वृत्ति का विषय भी समझ रहे थे जिसमे अनाधिकार हस्ताक्षिओ कर दिन मनुष्य का धर्म नहीं माना जाता; अतः ऐसा अधर्म करने की वृत्ति से स्वामीजी ने उस कालिंदी को रोका।  .

भाष्य की भाषा

क्या यह जरूरी है की हर वक्त तत्ववेत्ता ऋषि महात्मा जब भी भाष्य लिखें तो वह संस्कृत में ही हो और उसे ही शास्त्रीय योगदान माना जाएगा? क्या अन्य विविध भाषा में लिखे कथामाला और व्याख्यान को भाष्य नहीं माना जाएगा?

            वस्तुतः भाष्य किसी भी भाषा में लिखे गए हों, अगर शास्त्र की गंभीरता और तत्वगत विवेचना विघ्नित न होती हो तो उस हास्य को शास्त्रीय योगदान मान लेने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए; उन तत्व विवेचना को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार  कर लेनेवालों की संख्या भी बढ़ती ही रहेगी; इस मार्ग में तत्व वेत्ता ऋषियों में आपसी  सामंजस्य भी रह जाती है; हम उन सभी ऋषियों और विदूषकों से जब भी भाष्य सुनें तो उन सभी प्रस्तुति में भी सामंजस्य का निदर्शन मिलता ही रहेगा ; वस्तुतः शास्त्र विषयक चिंतन और विमर्श में तर्क की कोई संभावना है ही नहीं।

            भाषा के विषय में परस्पर भेद बुद्धि का विषय कुछ ऐसा ही है जैसे विविध नदियों की धारा विविध स्थान से निकलकर बीहडों, पहाड़ियों, खाड़ी और अरण्य भूमि के बीच से होते हुए अंततः सागर में ही जा मिलता और एकरूप हो जाता; इस पूरे सफर में रहते हुए भी जलबिंदु अपने तत्वगत स्वरुप को बनाये रख लेता और फिर से उस जलचक्र में समाविष्ट होने के लिए और आकाश मार्ग से विचरते हुए उच्च स्थानों पर जाकर फिर से नदी की धारा का हिस्सा बन जाता है; यह निरंतर चलनेवाली एक नैसर्गिक चक्र होने के साथ जीवन का समर्थन , संवर्धन और सम्पोषण करने लायक एक तत्व-सांगत चक्र भी बन जाता।  विज्ञान के आधार पर अगर विचार करें तो व्याख्यान की भाषा और स्वरुप भी बदल जाएगा; अगर धर्म दर्शन के सन्दर्भ को सामने रखकर विचार करते रहें तो शास्त्र की भाषा कुछ और प्रकार की होगी; विज्ञान की प्रगति के साथ सामंजस्य रखते हुए हमें भी अब उन अनजाने तत्व को अपनी चर्चा का हिस्सा बना लेना होगा जिसके बारे में हमारे पूर्वज कुछ हद तक अनभिज्ञ थे; सृष्टि और विनाश विषयक चक्र में, बतौर उदाहरण भी अगर चर्चा करें तो पायेह्गे, जैसी कल्पना वेदों और पुराणों में दर्ज थी उसी के मुताबिक़ कृष्ण अंचल में पूरे नक्षत्र मंडल और आकाश गंगा को ही समाविष्ट होते हुए और विनाश लीला का सामना करते हुए देखा गया।  कितना ही प्रयास और यत्न क्यों न कर लें सावर मंडल के साथ अपने इस आकाश गंगा का भी वही अंजाम होनेवाला है जो अन्य सर्जन को होता हुआ परिलक्षित किये जा रहे हैं। जगत को नाशवान समझते हुए भी हमारे मन में व्याप्त सभी भेद बुद्धि का प्रशमित हो जाना और ब्रह्म ज्ञान का उत्सर्जन एक सहज प्रगति के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि किसी रूप से थोपा गया अनचाहे उत्सर्जन के रूप में।

अभिन्न परम सत्ता

सृष्टि के आदि काल से ही हम यह प्रत्यक्ष करते रहे हैं कि विश्व चराचर के विक्सित होने के हर क्रम में ब्रह्म स्वरुप परम सत्ता की उपस्थिति आवश्यम्भावी माना जाएगा।  कण मात्र को भी जो हम अस्तित्व में आते हुए और विक्सित होते हुए देख रहे हैं उसके पीछे उस परम तत्व की ही भूमिका मानी जा सकेग्गी; उसे ही चिरंतन अविनश्वर सत्ता भी मानेंगे। [1]  परमात्मा को प्रकट करनेवाला सत्ता भी स्वप्रभ ज्ञान ही है; [2] इसे अक्षर ब्रह्म को ध्यान में रखकर भी कहा गया। यही अक्षर ब्रह्म हमें अज्ञानता से छुटकारा पाने के लिए और परमात्मा के सान्निध्य को अनुभव करने के लिए सहायक बना रहेगा। [3]  

                ब्रह्म की संगति भक्त को परम आनंद देनेवाला ही है। [4] बुद्धिमान साधक सदा सर्वदा विद्वान और विनम्र ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और असंस्कारी को समान मानते हैं । [5] ब्रह्म में दृढ़, ब्रह्म को जाननेवाला, शांत बुद्धि वाला और मोह रहित व्यक्ति कोई प्रिय वस्तु प्राप्त होने पर उत्साहित नहीं होता, और न ही कोई अप्रिय वस्तु प्राप्त होने पर निराश होता है। [6]

पगड़ी  

योगी पुरुष, परिब्राजक युवा , रेगिस्तान के पथ कड़ी धूप में पैदल ही जा रहे थे; उस प्रकार की कड़ी धुप से कुछ अनभिज्ञ भी थे।  सर पर केशराशि भी काफी कम ही बचे थे। पहले तो गला सूखने लगा ; उन्हें लगा कुछ और दूर जाकर जरूर कोई छत्र छाया मिल ही जायेगी, पर दूर दूर तक इस प्रकार से कोई पगडंडी या फिर आसरे और जलछत्र का नाम मात्र भी  नहीं था।  पानी मिले या न मिले कम से कम  कड़ी धूप से राहत मिले तो भी बात बन जाती; मीलों तक उसकी भी कोई संभावना न थी।  कुछ देर चलने के बाद युवा महाराज जी का सर चकराने लगा। 

       "अरे गिरा, गिरा। " , ऐसा कहते हुए चार पांच अपने गागरोन को दर किनार रखते हुए दौड़ पड़ीं ; करीब आकर उस युवा सन्यासी के सर पर और मुख मंडल पर पानी का छिड़काव किया गया।  एक बाला ने अपना ओढ़ना निकालकर महाराज जी के लिए लपेटा बनाकर सेर पर डालते हुए फटकार भी लगाने लगी, "इस रेगिस्तान में रहते हुए और इस तरह कड़ी धूप में चलते हुए इस पगड़ी को बनाये रखना , समझ गए?"

बिना समझे कोई उपाय भी न था; उनके लिए वह लपेटा एक सीख ही बनकर आया।  ज्ञान पाने से किसी भी रूप में घमंड आना संभव ही नहीं हो सकता; अगर घमंड, दम्भ आदि आया तो समझो और बहुत कुछ सीखना शेष है ।  वैसे भी अगर कहा जाय तो मनुष्य जीवन भर कुछ न कुछ सीखते ही रहता है; उसके यह सीखने का सिलसिला कभी ख़त्म ही नहीं होनेवाला, भले ही जीवन चर्या ही क्यों न ख़त्म हो जाए।


[1] सन्दर्भ गीता अध्याय १५: गीता में जिसे अक्षर ब्रह्म स्वरुप माना गया;

[2] 'ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥' –

'जिसने ज्ञान के द्वारा आत्मा के अज्ञान को नष्ट कर दिया है, उसके लिए वह ज्ञान, सूर्य की तरह, परमात्मा को प्रकट करता है (गीता .१६)

[3] 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' - 'सत्यं ज्ञानम् अनंतम् ब्रह्म' - 'अक्षरब्रह्म शाश्वत, ज्ञानस्वरूप और असीम है' (तैत्तिरीय उपनिषद . ) 'प्रज्ञानं ब्रह्म' - 'प्रज्ञानं ब्रह्म' - 'अक्षरब्रह्म ज्ञान का स्वरूप है' (ऐतरेय उपनिषद . )

उपरोक्त श्लोक का सार यह है कि अक्षरब्रह्म गुरु हमें अज्ञानता से छुटकारा पाने और परमात्मा की प्राप्ति का साधन है।

[4] ' ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्ष्यमश्नुते' - ' ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षय्यमश्नुते' - 'जो ब्रह्म की संगति पाता है; मन, वचन और कर्म से अक्षरब्रह्म गुरु की संगति करता है; वह शाश्वत आनंद पाने का अधिकारी बन जाता है;अपनी आत्मा में परमात्मा के रूप में दृढ़ विश्वास, परम भक्ति, स्वेच्छा सेवा आदि गुणों को प्राप्त कर लेता है और ब्रह्मरूप बन जाता है  (गीता .२२ )

[5]  'विद्याविन्यस पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव स्वप्नकेच पण्डिताः समदिशानः॥' –  (गीता .१८ )

[6] प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसंमूढ़ो ब्रह्मविद्ब्राह्मणि स्थितः॥  – - अर्थ:  (गीता .२०)