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शंखनाद

आज हमें यह सोचने में भी शायद कुछ अलग ही लगता होगा जब हम एक जानकारी पाते हैं कि युद्ध शुरू होने से पहले शंखनाद से कुरुक्षेत्र की धरती को पवित्र किया गया था; पितामह, गुरुदेव, सभी भ्राता, प्रमुख  योद्धा और स्वयं जगदीश्वर भी अपने अपने शंख साथ में लाये थे; उन सभी शंखनाद से सुर, असुर, राजा, सेनानायक, राठी, महारथी और स्वयं जगदीश भी युद्ध क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का भान कराते रहे। 

शंखनाद से ही सभी कर्मकांड शुरू करने की बात और उसी शंखनाद से कर्मकांड समाप्प्त करने की बात हमारी जानकारी में आयी जरूर; पर रण क्षेत्र   में  अगर वैसी परिस्थिति का निर्माण हो तब हमें फिर से उस कर्म काण्ड के बारे में विचार करना होगा जिसमे युद्ध को भी शंखनाद से शुरू करने के बारे में और सूर्यास्त के बाद इस रण को फिर से शंखनाद के जरिये समाप्त कर देने की बात कही जाती हो। आधुनिक युग का युद्ध है ही निराला; कहीं कहीं पर अंधकार का सहारा लेकर , छिपकर , शत्रु को कोई मौका न देते हुए आक्रमण कर दिए  जाते होंगे; तो कहीं सूचना जाल का सहारा लेकर मशीनें खराब कर दिए जाते होंगे; और फिर कहीं पूरी दुनिया को चार पांचबार विनष्ट कर देने की योजना बन रही होगी; योजना बनाने वालों को शायद ही इस बात की जानकारी रही होगी कि  संसार विनष्ट होने के बाद फिर किसी भी मनुष्य के लिए धरती पर स्थान नहीं बन पायेगा; संसार के रचना तंत्र के साथ खेलने का अर्थ हुआ विनाश लीला शुरू करने के लिए जगदीश्वर श्री हरि को शंखनाद करने के लिए मजबूर कर देना।

हमें जगदीश्वर के शंखनाद के विपरीत चलने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए; वैसी पात्रता भी किसी मनुष्य को नहीं मिली; सूर्य से ऊर्जा लेकर उसी के सहारे भोजन बनाकर अन्य सभी जीव का पोषण करने की जिम्मेदारी; प्रकृति में संतुलन बनाये रखने की जिम्मेदारी जिस भाँती जिस जीव को मिली होगी उसे वैसा ही करते रहना होगा; शंखनाद करके शिकारी कभी भी शिकार पर झपट्टा नहीं मार पायेगा; या फिर किसी अपराधी को पकड़ते समय किसी दरोगा को शायद ही हम शंखनाद करते हुए देख पाए!

कुरुक्षेत्र में शंखाबाद के जरिये मानसिक और बौद्धिक संघर्ष की सूचना हो जाने के बाद दोनों पक्षों  की सेना में व्यूह रचना की ओर नजर डालने का मौका मिला; आधुनिक युग में शंखनाद के जरिये युद्ध शुरू करने की बात को  बेमानी मान लेने को हम जल्दबाजी ही मानेंगे; शंखनाद के पैमाने और तरीके भले ही बदल गए होंगे पर अभी भी युद्ध के पहले   अखबार के जरिये, प्रचार नाध्याम के जरिये, पत्राचार, सभाएं और सेना स्थानान्तरित करने के जरिये युद्ध का शंखनाद ही होता है।  सेनानायकों के आपसी मेल मिलाप को भी हम शंखनाद ही मानेंगे।  इतिहास साक्षी है कि अपने देश में संघर्ष और नरसंहार रोकने के लिए शंखनाद किये गए थे; भले ही उस शंखनाद के बाद हमें शंखनाद करनेवाले सैनिक के जीवन पर संकट का बादल धूमायित होते हुए देखना पड़ा; और फिर उन्हें हमसे दूर कर देने का प्रयास भी किया गया; सभ्य जनजाति को सभ्यता की शिक्षा देने के क्रम में भी शंखनाद करनेवाले सेनानायकों की जानें संकट में आयी; उनके ऊपर हथियार का प्रयोग करनेवालों को शायद इस बात का अनुमान भी न रहा होगा कि शरीर छुड़ा लेने से किसी जननायक को जनता जनार्दन के ह्रदय से दूर नहीं किया जायेगा; ऐसा कर पाने के बारे में सोचनेवाले भी बुद्धि से कमजोर ही माने जाएंगे।

युद्ध को कभी हमने शुरू होते हुए जरूर देखा होगा; पर इसकी समाप्ति की ओर संसार को एकरूप होते हुए आज तक नहीं देख पाए।  युद्ध संस्कृति का जो भयानक परिणाम रहता होगा उसे देखकर इतिहास से सीख लेनेवालों की संख्या भी कई होंगे; पर वैसा लड्डू किस काम का जो हमेशा हमेशा के लिए एक डब्बे में ही रख  दिया जाय? हमें ऐसे अग्रज की तलाश हमेशा से रही जो जनता जनार्दन के ह्रदय सम्राट बन पाएंगे; अपने यहां भी ऐसे महात्मा आये जिन्हें ह्रदय सम्राट बनते हुए भी हमने देखा; और फिर उन्हें हम  सही प्रकार से समझ ही नहीं पाए।  शास्त्र में भी कुछ ऐसी ही मान्यता बन रही है कि जगदीश्वर श्री हरि के सही स्वरुप को हम शायद ही ठीक से समझ पाएं! आखिर सागर की गहराई के बारे में जानकारी पाने के उद्देश्य से निकलनेवाले नमक के पुतले को कभी न कभी पिघलना तो पड़ेगा; उसके बाद यह फिर कोई माने नहीं रखता कि जगदीश्वर के शंखनाद से सृजन का निर्देश मिला या विनाश की लीला रची गई!

हम उस अवसर की बंभीरता के बारे में सिर्फ कल्पना कर पाएंगे जब सभी रथी महारथी योद्धा के शंखनाद से कुरुक्षेत्र की भूमि को प्रकम्पित किया गया होगा; उसके बाद फिर श्रीहरि के पांचजन्य की भी बारी आयी होगी; पर श्रीहरि के शंखनाद के जरिये प्रसारित की जानेवाली विनाशलीला को शायद ही कोई पक्ष के महारथी ठीक से समझ पाए होंगे; अगर समझ पाते तो फिर श्रीमद्भागवद्गीता में एक ही अध्याय रहता और सव्यसाची के आसपास अन्य सेनानायकों की कतार लग जाती; क्यूंकि उस परिस्थिति में उन सभी को श्रीहरि के पास रचनाधर्मिता का और आध्यात्मिक चेतना का गुप्त मन्त्र जो लेना था ! पर ऐसी परिस्थिति बनते हुए हम नहीं देख पाए। परिणाम हम सबके सामने है; युद्ध शुरू हो जाने के बाद एक योद्धा के मन में युद्ध के भीषण परिणाम के बारे में सोच विचार पनपे, और फिर उसे अगर ऐसा लगने लगे कि युद्ध न करते हुए अरण्य जीवन स्वीकार कर लेना श्रेय होगा  तो फिर हमें खुश होना चाहिए! पर इस बात को जानकार श्रीहरि काफी नाराज हो गए और उस भावना को एक योद्धा के ह्रदय में पनपनेवाली कायरता, कमजोरी, अज्ञान और हीन भावना कह दिया।   वस्तुतः रण भूमि का बीच का क्षेत्र किसी भी योद्धा के लिए शांति, अहिंसा और संतोष की बात करने के लिए स्थान, काल  या फिर पात्रता  के मापदंड से उपयुक्त स्थल नहीं मान  पाएंगे ; जगदीश्वर भी ऐसा नहीं मान पाए; इस प्रयास को उन्होंने स्वधर्म के निमित्त से भी गलता बताया ।  इसी लिए श्री हरि उस योद्धा को युद्ध करने के लिए बताते रहे।

…… (विषाद योग शीर्षक पुस्तक से ; प्रस्तुति: चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता)

 

जगदीश्वर


इतना तो
  तय हो ही गया होगा कि किसी भी ग्रह नक्षत्र मंडल को अनंत अनंत काल के लिए अस्तित्व में नहीं रखा जाएगा; कभी न कभी अपने भरे पूरे संसार को लेकर समग्र नक्षत्र मंडल को विनाशलीला से गुजरना होगा  और फिर नए सृजन के चक्र की और जाना होगा।  सूर्य और सूर्य के साथ जुड़े धरती के अधीन बने विश्व चराचर जगत के बारे में भी यही सत्य है।  कब और कैसे उस प्रलय का सामना करना होगा इसे बताने के लिए शायद ही कोई मनुष्य अस्तित्व में बने रह पायेगा! यही भवितव्य है, और इस भवितव्य को ब्रह्म ज्ञान करके त्याग की भावना से विश्व चराचर जगत में सुख भोगना होगा। ज्ञान विज्ञान की अपनी सीमा रहती होगी और दर्शन के अपने पैमाने रहते होंगे; धर्म को सिर्फ एक पगडंडी जैसा ही समझना होगा; एकमात्र अध्यात्म का परिमंडल ही सबसे व्यापक बना रहेगा जिसके आधार पर अक्षर ब्रह्म के सही स्वरुप को समझने का प्रयास ठीक से हो पायेगा।  उसी प्रकार के समझ को आधार मानकर विश्व चराचर जगत में मानव से मानव को जोड़ा जाना संभव है; उस महासम्मेलन के जरिये ही जगत का कल्याण संभव; अन्य किसी संकीर्ण  मार्ग से उस ध्येय को शायद ही फलीभूत किया जा सके!

..........चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता (विभूति योग शीर्षक पुस्तक से ; प्रथम प्रकाश जनवरी २०२५ )

सेवा का भाव

 

अपने देश में सेवा भाव से काम करनेवाली संस्थाओं की कमी नहीं है | उस संस्थाओं को देश विदेश से सेवा कार्य और ग़रीब कल्याण के नाम से पैसे भी मिल जाते हैं | इस प्रकार से सेवा करने के लिए बनी संस्थाओं की गतिविधि चलती चली रही है | उसी संस्था के आस पास समान विचारधारा वाले और समरूप तत्वज्ञान से प्रबुद्ध होकर कार्य करनेवालों का जमावड़ा भी होता रहा है | जब कोई व्यक्ति किसी दरिद्र व्यक्ति तक आसानी सा पहुँचना चाहे तो भी इन सेवा भावी संस्थानों के ज़रिए पहुँचने का प्रयास किया जाता है ताकि दान को महिमा मंडित किया जा सके और उस सेवा भाव का मूल मकसद सध सके |

आचार्य छाणक्य कहा करते थे कि सत्य अगर कड़वा हो और अप्रिय हो तो कहा जाय | पर सत्य को अगर हम इश्वर मान लें तो असत्य कहना या सत्य को छिपाने के लिए गोल मटोल बातें करना भी कहाँ तक मानी हो सकेगा !

ध्येय से भटकाव

संस्थाओं के बनने की प्रक्रिया में कई ध्येय को सामने रखा जाता है और उस ध्येय को पाने के लिए संस्था की गतिविधियाँ बनाई जाती है | अगर ध्येय की प्राप्ति हो गई या फिर गतिविधियों को चलाने के लिए कोई माध्यम बचा हो तो संस्था का निष्क्रिय होना स्वाभाविक है | उस परिस्थितीई में संस्था को कुछ ऐसे तट का चुनाव करना होता है जहाँ से विकास कार्य में लगे लोगों की उदार पूर्ति का काम चलता रहे | यह विषय सभी संस्थाओं के लिए सत्य नहीं भी हो सकता; जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसा विषय निरंतर ही चलनेवाला है ; किसी ख़ास तत्व को ध्यान में रखकर नागरिकों का प्रबोधन, भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोलना और धर्माचरण से नागरिकों को जोड़ना आदि विषय नित्य जीवन का अंग है | अतः ऐसे विषयों से जुड़ी संस्थाओं की अहमियत भी सदा के लिए रहने ही वाली है | प्रश्न उन संस्थाओं के बारे में निर्माण होता है जिन्हें ग़रीबी उन्मूलन का बीड़ा उठाते हुए जनता जनार्दन तक पहुँचना है और ग़रीब कल्याण योजनाओं के ज़रिए राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका अदा करना है |

ग़रीबी उन्मूलन अगर किसी संस्था का ध्येय हो सकता तो सरकार बहादुर का भी यही ध्येय है और उनका प्रयास भी यही है कि ग़रीब नागरिक के ग़रीबी से ग्रसित होना का सही कारण पता करते हुए उसे उस ग़रीबी के जाता जाल से छुड़ा सके |

संवेदनशीलता

पुराण और वेदों में ऐसे काफ़ी उदाहरण मिलते हैं जिसके ज़रिए हम एक सम्राट और एक नागरिक के संवेदनशीलता को समझ सकें | एकबार भक्त सुदामा के परिवार वर्ग ने सुझाया कि उनके मित्र श्री कृष्ण कन्हैया सम्राट बन चुके , अब तो सुदामा को इस अवसर का भरपूर लाभ उठाते हुए अपनी ग़रीबी दूर कर लेनी चाहिए ! पर सुदामा के मन में कुछ संकोच था; जिस मित्र को एक मुट्ठी चावल की भुजिया नहीं दे पाए थे उसी मित्र से कुछ कैसे माँगा जाय ! और फिर मित्र भला किसी मित्र से कहाँ कुछ माँगता है ! मित्र से सिर्फ़ मैत्री का ही संबंध रहता है | उस मैत्री के संबंध में स्वार्थ का आना उचित नहीं है और ऐसा करना भी नहीं चाहिए |

काफ़ी अनुनय विनय करने के बाद सुदामा मान तो गये पर उनके मन में किसी और कारण से आनंद और हर्ष का बाढ़ आया ; काफ़ी लंबी अवधि के बाद उन्हें अपने मित्र से मिलने का मौका मिलेगा और इस मौके को सुअवसर में बदलते हुए सुदामा वही भेंट लेकर निकल पड़े आश्रम प्रवास के समय जो कृष्ण के माँगने पर भी नहीं दे पाए थे | उस कारण से बने आत्म ग्लानि को धो डालने का समय आया है यह जानकार भी सुदामा हर्षित हो रहे थे |

गिरिधारी का मित्र वह भी ऐसी दशा में ! विश्वास भला किसे हो पाता , अतः सैनिकों का भ्रमित होना भी जायज़ था | सुदामा को कृष्ण के सिंह द्वार पर ही रोका गया | अंदर जानकारी भेजी गई, और फिर क्या;  गिरिधारी अपने उस मित्र को गले लगाने के लिए दौर पड़े और अपने परिषदों को अचंभे में डाल दिया | उस मित्र को अपने ही आसन पर बिठाया और दोनों का प्रेम संवाद फिर देखते ही बन रहा था |

अगला पड़ाव

 


काफी अवधि के बाद फिर से उस पवित्र भूमि पर बैठकर पवित्र जीवन के बारे में संतों से सुनने का मौका मिला।  वह माहौल ही अनोखा  था जब मैं आचार्य विनोबा को उन संतों के बीच प्रत्यक्ष रूप से मूर्त होता हुआ देख रहा था और यह भी महसूस कर रहा था कि मुझे भी कुछ ठोस कदम उठाते हुए ज्ञान गंगा के पवित्र सरोवर में संतरण करने के कार्यक्रम को नित्य नैमित्यिक अनुक्रिया बना लेना चाहिए।  तत्व को आधार मानकर उसकी गहराई में उतर जाने के लिए कई दिव्य जनों को प्रयत्न करते हुए देखकर भी मन , बुद्धि और चित्त को एक समाधान मिलता है और हम शाश्वत मार्ग ार चल पड़ने के लिए कुछ साहस जूता पाते हैं। इसे एक प्रात्यक्षिक भी समझा जाना चाहिए जिसके जरिये हमें अपने सामुदायिक जीवन के अगले  पड़ाव के बारे में अपनी समझ बनाने की जरुरत महसूस हो रही है। 

यह तो स्वाभाविक ही है कि कुछ लोग पैसों के लिए काम करेंगे और अन्य कुछ लोग प्रतिष्ठा के लिए; उन दोनों समूहों से अलग हटकर कुछ ऐसे भी दिव्य जन  होंगे जन्हें न तो पैसों का प्यास रहेगा और न ही प्रतिष्ठा कि भूख।  उन्हें सार्विक समाधान के अनुसंधान के निमित्त से दिव्य पथ पर चलना होगा ; इसी में वो अपने जीवन का समाधान मानेंगे और तीसरी शक्ति का हिस्सा बन जाना पसंद करेंगे।  उस तीसरी शक्ति की बिरादरी भी बड़ी होनेवाली है। 

इस सफर को स्वार्थ से परमार्थ की ओर किया जानेवाला सफर समझा जाना चाहिए; इसे कुछ और स्पष्टता से समझने के लिए हम यह भी प्रत्यक्ष कर पाएंगे कि हमारा जीवन निसर्ग के अधीन है; उसकी कुछ सीमाएं भी निर्धारित कर दिए गए हैं, उस सीमा में ही हमें बने रहना होगा; उस सीमा से हटकर हम ग्रहों और नक्षत्रों तक का सफर नहीं कर पाएंगे; उसी प्रकार धरती कीसीमा सूर्य के परिमंडल तक; सूर्य की सीमा ब्रम्हांड के परिमंडल तक; ब्रम्हांड की सीमा ऊर्जा और अदारथ के बेच के समन्वय तक; ऊर्जा और पदार्थ के समन्वय सृष्टि और विनाश के चक्र तक सीमित कर दिया गया।  सिर्फ परम सत्ता को ही असीम रखा गया।  उस परम सत्ता को समझ पाने का लिए हमें अपने सीमित पगडंडी से बाहर तो आना होगा ही।  

क्या उस दिव्य जीवन की ओर दिव्य कर्म के जरिये चलने की तमन्ना सभी आम जनों को भी रखना चाहिए, या फिर इसे किसी ख़ास वर्ग तक ही सीमित समझा जाय? यह तो वैसा ही हुआ जैसे छोटी मछलियां सरोवर में ही रहे और सिर्फ बड़ी मछलियों को समुद्र में उतरकर गोते खाने का सपना देखना चाहिए; पर हकिअक्त में विस्तीर्ण जलराशि का साम्राज्य सबके लिए सामान रूप से सुगम बना दिया गया।  यह नैसर्गिक होने के साथ साथ शाश्वत मार्ग का द्योतक भी समझा जाएगा।  

ब्रह्म उपासक

 

जब राजा विश्वामित्र को यह लगने लगा कि भुजबल से ब्रम्ह ज्ञान कहीं श्रेष्ठ है तो खुद को गहन साधना में लगा दिए और अरण्य जीवन को स्वीकार कर लिया; तपस्या से संतुष्ट होकर ब्रह्मा उन्हें ऋषि पद से विभूषित करने के लिए आये।  इस उपाधि से विश्वामित्र संतुष्ट नहीं हुए और ही अपने तपस्या को ही छोड़ा।  काम और क्रोध को वशीभूत करके विश्वामित्र को महर्षि का पद मिला; इसमें भी उन्हें संतोष कहाँ मिलनेवाला था! अब तो उनके मस्तक से तपस्या कि दीप्ति निकलने लगी; पूरा परिमंडल भी आभा से भर आया।  सभी देवता ब्रह्मदेव से आवेदन निवेदन करने लगे।  असल में विश्वामित्र उस ब्रह्मज्ञान का धन पाना चाहते थे जिसके पाने से उनके समक्ष ब्रह्म का अधिष्ठान प्रतिभासित हने लगे, वो जहां भी जाएँ वहीँ ब्रह्मज्ञान का भी अवतरण सहज ही हो; इस अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए ब्रह्मदेव विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि पद से अलंकृत करते हुए उनकी अभिलाषा को पूर्ण कर दिए। 

          यह अथक और निरंतर साधना का ही फल था जिसके बल पर विश्वामित्र महर्षि से ब्रह्मर्षि तक का सफर तय कर पाए।  सभी बाधाओं को पार करते हुए अपने कर्तव्य पथ पर निरंतर आगे रहे और प्राप्त की प्राप्ति कर लेने में सफल हुए।  प्राप्त की प्राप्ति इसलिए भी कहा गया ताकि हम ईश्वर के द्वारा सबकुछ निर्लित होने के बावजूद उसके अकर्ता स्वरुप में परिव्यात होते हुए परिलक्षित होता रहेगा। [1]  ईष्ट सबके कर्मों का अधिष्ठाता, सबका सर्जक, जीवमात्र का अंतरात्मा, साक्षी चेतन सत्ता होते हुए भी विशुद्ध और  निर्गुण है [2] समग्र विश्व चराचर की उत्पत्ति, विकास और विनाश उस ब्रह्म से ही घटित होता आया ; जीवन समाप्त हो जाने के बाद जीवात्मा का ब्रह्म में ही विलय हो जाता है (तै. उप.  /); इस विषय का सम्यक ज्ञान होने के बाद ही महर्षि तपस्या करते करते ब्रह्मर्षि बनाकर गुणातीत सर्वशक्तिमान को अनुभव करना चाहते रहे ; तपस्या में लगे रहे।  ब्रह्म ने स्वयं ही इस जगत रुपी जड़ प्रकृति का सृजन किया और उसी में परिव्याप्त भी होता आया; अतः प्रकृति को प्रत्यक्ष रूप से जगत का कारण स्वरुप तत्व नहीं माना जा सकता; उसके निरपेक्ष रूप से ब्रह्म को ही इसका कारण स्वरू भी माना जाना चाहिए । [3] त्यागनेयोग्य बताये जाने के कारण "आत्मा" प्रकृति का वाचक नहीं हो सकता। [4]

आत्मा को गैर-संवेदनशील तत्वों के समान वर्ग या श्रेणी से संबंधित नहीं माना जा सकता है। [5] आत्मा एक ही स्थिति में रहती है और परिवर्तन से अलग नहीं है। आत्मा को “अक्षर” (न बदलने वाला) माना जाएगा। [6]  आत्मा ज्ञान का आधार (ज्ञान का भंडार या स्थान) है । आत्मा स्वयं ज्ञान है और ज्ञान का स्थान भी (उपनिषद)। सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृति (दुर्गा) से उत्पन्न रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव जी अर्थात् तीनों गुणोंद्वारा संस्कार वश किये जाते हैं; अहंकार से ग्रसित मनुष्य शिक्षित होते हुए तत्वज्ञान हीन अज्ञानी की भांति ‘मैं कर्ता हूँ‘ ऐसा मानता है। [7]  आत्मज्ञान की ओर ले जाने वाले दो मार्ग  हैं : चिंतन की ओर इच्छुक लोगों के लिए ज्ञान का मार्ग, और कर्म की ओर इच्छुक लोगों के लिए कर्म का मार्ग। [8]

“लोकेस्मिन द्विविधा निष्ठा……..”[9]

अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे, अतः उन्होंने समतावाचकबुद्धिशब्द का अर्थज्ञानसमझ लिया और उसी के अनुसार गांडीव डालकर रथ के पिछले हिस्से में आकर बैठ गए   श्री भगवान पहलेबुद्धिऔर फिर  बुद्धोयोगशब्द से समता का वर्णन करते हुए एक योद्धा को युद्ध करने के लिए उठ खड़ा होने के लिए प्रेरित करते रहे; अतः यहाँ भी भगवान ज्ञानयोग और कर्मयोग- दोनों के द्वारा समता का ही विवरण देते रहे।

दो निष्ठाएँ बतायी गई  हैं- “सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठा;“ जैसे लोक में दो तरह की निष्ठाएँ हैं- ‘लोकेऽस्मन्द्विविधा निष्ठा’, ऐसे ही लोक में दो तरह के पुरुष हैंद्वाविमौ पुरुषौ लोकेवे हैं- क्षर और अक्षर। क्षर की सिद्धि-असिद्धि, प्राप्ति-अप्राप्ति में सम रहनाकर्मयोगहै और क्षर से विमुख होकर अक्षर में स्थित होनाज्ञानयोगहै।

क्षर और अक्षर इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है (परमात्मा): ‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः वह परमात्मा क्षर से तो अतीत है और अक्षर से उत्तम है; अतः शास्त्र और वेद में वहपुरुषोत्तमनाम से प्रसिद्ध है। ऐसे परमात्मा के सर्वथा सर्वभाव से शरण हो जानाभगवन्निष्ठाहै। इसलिये क्षर की प्रधानता से कर्मयोग, अक्षर की प्रधानता से ज्ञानयोग और परमात्मा की प्रधानता से भक्तियोग चलता है

सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठा- ये दोनों साधनों की अपनी निष्ठाएँ हैं; परंतु भगवन्निष्ठा साधकों की अपनी निष्ठा नहीं है। कारण कि सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठा में साधक कोमैं हूँऔरसंसार है’- इसका अनुभव होता है; अतः ज्ञानयोगी संसार से संबंध-विच्छेद करके अपने स्वरूप में स्थित होता है और कर्मयोगी संसार की वस्तु को संसार की ही सेवा में लगाकर संसार से संबंध-विच्छेद करता है। परंतु भगवन्निष्ठा में साधक को पहलेभगवान है’- इसका अनुभव नहीं होता; पर किसी विलक्षण तत्व की  स्थिति का ज्ञान हो ही जाता है। वह श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भगवान को मानकर अपने-आपको भगवान के समर्पित कर देता है। इसलिये सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठा में तोजाननामुख्य है और भगवन्निष्ठा मेंमानना। ईष्ट को निवेदन करने के उपरांत भोजन ग्रहण करनेवाले ही वास्तव में सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं; स्वयं के लिए पकाया हुआ विविध व्यंजन का आनंदपूर्वक सेवन करनेवाले साधक ऐसा नहीं कर पाते। [10] जीवात्मा को नियम्य और अन्तर्यामी को नियंता बताया गया ; अतः अन्तर्यामी पद ‘परब्रह परमात्मा’ का ही वाचक है, ‘जीवात्मा’ का नहीं। [11] स्तितप्रज्ञ साधक का लक्षण बताते हुए ब्रह्म निर्वाण पाने का भी अधिकारी बताया गया। [12] परस्पर निर्भरशीलता का विज्ञान इस बात से ही सत्यापित की जा सकेगी जब हम यह देखेंगे कि जीव मात्र को जीवित रहने के लिए भोजन चाहिए; भोजन के उत्पादन में लगे वनस्पति को प्रकाश और वर्षा चाहिए; यज्ञार्थ कर्म करने से वर्षा होगी; सभी साधक को यह यज्ञार्थ कर्म में लगाना होगा; यही प्रकृति में जीव के परस्पर सहावस्थान का भी सिद्धांत माना जाएगा। निर्धारित कर्म (कर्तव्य कर्म और विधायक कर्म) करने से ही प्रकृति को पुष्ट और समृद्ध किया जा सकेग।  इस तत्व की पुष्टि कई स्थानों पर  विविध रूप से की जा चुकी और ऐसा कहते हुए भगवान भक्त को कर्म से जोड़ने का भी प्रयास करते हैं, न कि कर्म का सम्पूर्ण त्याग करने की। [13] विधायक कर्म का विवरण वेदों में भी दर्ज किया गया जो कि भगवान का ही कथन माना जाएगा। [14] ब्रह्म की संगती पानेवाला शाश्वत आनंद की अनुभूति पा लेगा, गुरु की संगती करनेवाला सत्संगी साधक वह योग को धारण करनेवाला आत्मा (योगात्मा ) कहा जाएगा। [15] 

ऐसी भी मान्यता है कि वेद भगवान के सांस से निकले; जिसमें मनुष्य के कर्तव्य कर्म स्वयं ईश्वर द्वारा निर्देशित हुआ। [16]  तंत्र सार में यज्ञ को स्वयं सर्वोच्च दिव्य भगवान कहते हैं, यज्ञ में सदैव ईष्ट का ही अधिष्ठान माना जाएगा; इस तत्व की प्रतिष्ठा वेद उपनिषदों में भी कई प्रकार से हो चुकी और कई बार दोहराये भी गए। [17]



[1] "सम्पूर्ण जगत का कर्ता होते हुए भी ईश्वर अकर्ता ही रहेगा। (गीता -- १३)

[2] एको देव: सर्वभूतेषु गूढ: सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा

कर्माध्यक्ष: सर्वभूताधिवास: साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च श्वेता - ११।।

[3] तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् (ब्रह्मसूत्र //)

[4] हेयत्वावचनाच् ( ब्रसू-,. )

[5] 'अव्यक्तोयम् अचिन्त्योयम'-गीता II-25.

[6] 'अविकार्यः अयमुच्यते'- (अविकार्योऽयामुच्यते।) गीता II-25

[7] क्रियमानानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। सर्वविमूढ़ात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।। गीता -२७ ।।

[8] लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मायान्घ |

ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् || अध्याय श्लोक ||

भगवान ने कहा ; लोके - संसार में ; अस्मिनयह ; द्वि-विधादो प्रकार की ; निष्ठाविश्वास ; पुरापहले ; प्रोक्ता - समझाया गया ; मायामेरे द्वारा (श्रीकृष्ण) ; अनघनिष्पाप ; ज्ञान-योगेन - ज्ञान के मार्ग से ; सांख्यनाम्चिंतन की ओर प्रवृत्त लोगों के लिए ; कर्म-योगेन - कर्म के मार्ग से ; योगिनाम् - योगियों का;

[9]अनघ- अर्जुन के द्वारा अपने श्रेय की बात पूछी जानी ही उनकी निष्पापता और कर्तव्यनिष्ठा का परिचायक समझें ; क्योंकि अपने कल्याण की तीव्र इच्छा होने पर साधक के पाप और अपवित्रता विषयक अपूर्णता नष्ट हो जाते हैं।

‘लोकेऽस्मिन्द्विविविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया- यहाँलोके पद का अर्थ मनुष्य शरीर समझना चाहिये; क्योंकि ज्ञानयोग और कर्मयोग- दोनों प्रकार की साधना के जरिये मानव शरीर को ही उन्नति का मार्ग मिलेगा।

निष्ठा - अर्थात समभाव में स्थिति एक ही है; इसे - ज्ञानयोग से और कर्मयोग से पाया जा सकेगा। इन दोनों योगों का अलग-अलग विभाग करने के लिये  इस समबुद्धि को सांख्ययोग के विषय में कह दिया गया ( गीता में दूसरे अध्याय के उन्तालीसवें श्लोक में); इसे कर्मयोग के विषय में कहा जाना शेष था  - ‘एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु

पुरा पद का अर्थअनादिकाल भी होता है औरअभी से कुछ पहले भी समझा जाएगा यहाँ इस पद का अर्थ है- अभी से कुछ पहले अर्थात पिछला अध्याय, जिस पर अर्जुन की शंका है। यद्यपि दोनों निष्ठाएँ पहले बारी बार  से कही  जा चुकी है, तथापि किसी भी निष्ठा में कर्मत्याग की बात नहीं कही गई। 

[10] यज्ञशिष्टशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ।।

………. श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय ३ श्लोक १३ ।।

यज्ञ-शिष्ठ – यज्ञ में अर्पित भोजन के अवशेष ; अशिनः – खाने वाले ; सन्तः - साधु व्यक्ति ; मुच्यन्ते – मुक्त हो जाते हैं ; सर्व – सभी प्रकार के ; किल्बिषैः – पापों से ; भुञ्जते – आनंद लो ; ते - वे ; तू - परंतु ; अघम – पाप ; पापः – पापी ; तु - कौन ; पचन्ति – पकाना (भोजन) ; आत्म-कारणात् - अपने स्वयं के लिए;

‘यज्ञशिष्टाशिनः संतः’- कर्तव्यकर्मों का निष्काम भाव से विधिपूर्वक पालन करने पर[3] योग अथवा समता ही शेष रहती है। यज्ञशेष का अनुभव करने पर मनुष्य में किसी भी प्रकार का बंधन नहीं रहता।

[11] स्मार्तम् अतद्धर्माभिलापाच् छारीरश् ( ब्रसू-,.२० ) ब्रह्मसूत्र //२०

"लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षणिकल्मशाः। छिन्नद्वैघा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।" , "जिसका संदेह नष्ट हो गया है, जो परमात्मा में दृढ़ है, जो सभी जीवों के कल्याण में तल्लीन है, ऐसा ऋषि पापों से मुक्त हो जाता है और ब्रह्मधाम पाने का अधिकारी बन जाता है। " (श्रीमद्भागवद्गीता .२५)

[12]एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनं प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृत्युचति॥ , “जो लक्षण स्थितप्रज्ञ साधक के बताये गए हैं, जैसा की उल्लिखित श्लोक के पहले गीता में दर्ज की गई , वह ब्रह्म अवस्था है;जिसे  एक बार पा लेने  के बाद व्यक्ति कभी भी मोह के वशीभूत नहीं होता। यदि यह अवस्था अन्तिम श्वास में भी प्राप्त की  जाय तो उसे ब्रह्मधाम की ही प्राप्ति होगी " (गीता .७२) [ब्रह्मनिर्वाण अर्थात विदेहमुक्ति]

[13] अन्नद भवन्ति भूतानि पर्जन्याद अन्न-सम्भवः।

यज्ञाद भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म-समुद्भवः।। श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय , श्लोक १४ ||

अन्नतभोजन से ; भवन्ति - निर्वाह ; भूतानिजीवित प्राणी ; पर्जन्यात्वर्षा से ; अन्नअन्न का ; संभवःउत्पादन ; यज्ञात्यज्ञ करने से ; भवतिसंभव हो जाता है ; पर्जन्यःवर्षा ; यज्ञः - यज्ञ करना ; कर्म - निर्धारित कर्तव्य ; समुद्भवः - से उत्पन्न;

[14] कर्म ब्रह्मोद्भवम् विद्धि ब्रह्मक्षर-समुद्भवम्।

तस्मात् सर्व-गतम् ब्रह्म नित्यम् यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।  श्री मद्भागवद्गीता अध्याय ३ श्लोक १५।।

कर्म - कर्तव्य ; ब्रह्मा - वेदों में ; उद्भवम् – प्रकट ; विद्धि - तुम्हें पता होना चाहिए ; ब्रह्मा – वेद ; अक्षर - अविनाशी (ईश्वर) से ; समुद्भवम् – प्रत्यक्ष रूप से प्रकट ; तस्मात् - इसलिये ; सर्व- गतम् – सर्वव्यापी ; ब्रह्मा - भगवान ; नित्यम् – सदैव ; यज्ञे – यज्ञ में ; प्रतिष्ठितम् - स्थापित

 

[15] ' ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्ष्यमश्नुते' - ' ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षय्यमश्नुते' - 'जो ब्रह्म की संगति प्राप्त करता है वह शाश्वत आनंद प्राप्त करता है' (गीता .२२ ) ब्रह्म की संगति (अक्षरब्रह्मस्वरूप गुरु की संगति); जो मन, वचन और कर्म से अक्षरब्रह्म गुरु की संगति करता है, वह योग को धारण करने वाला आत्मा ही होगा। 

'ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥' , 'जिसने ज्ञान के द्वारा आत्मा के अज्ञान को नष्ट कर दिया , उसके लिए वह ज्ञान, सूर्य की तरह परमात्मा को प्रकट करनेवाला ही होगा  (गीता .१६ )

[16]अस्य महतो भूतस्य नि श्वासितमेतद् यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदो 'थवंगिरसः  (बृहदारण्यक उपनिषद . .११ ) [श्लोक ]

"चार वेद-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद-सभी सर्वोच्च दिव्य स्वरुप  व्यक्तित्व की सांस से निकले हैं।" वह दिव्य स्वरुप नियंता ईश्वर ही होंगे।  इन सनातन वेदों में मनुष्य के कर्तव्य स्वयं ईश्वर ने बताये हैं।

[17] यज्ञो यज्ञ पुमांश्च चैव यज्ञशो यज्ञ यज्ञभवनः यज्ञभुक् चेति पंचात्मा यज्ञेष्विज्यो हरिः स्वयम् [ श्लोक १० ]

भागवतम (११ .१९ .३९ ) में, श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं : यज्ञो 'हं भगवत्तमः [ श्लोक ११ ] "मैं, वासुदेव का पुत्र, यज्ञ हूं " वेद कहते हैं: यज्ञो वै विष्णुः [ श्लोक १२] " यज्ञ वास्तव में स्वयं भगवान विष्णु ही हैं।"