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विधाता का विधान

 

["चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता विरचित हे राम शीर्षक पुस्तक से "]

 

विधाता हमें कर्म में लगाकर सृष्टि में निरंतरता लाने का प्रयास करते रहते हैं और एक क्रम से हमें भी उन्नति के मार्ग पर बने रहने के लिए प्रेरित करते हैं।  प्रकृति के गुणों के अधीन ही जीव कर्म के लिए प्रवृत्त होते हैं और विधायक कर्म में लिप्त होते रहते हैं। [i]  वस्तुतः एक क्षण के लिए भी व्यक्ति पूर्ण निष्क्रियता से नहीं रह सकता; यदि सिर्फ बैठे हों तब भी कुछ न कुछ तरंगों से मन अशांत हुआ रहता होगा; गहन निद्रा में भी हम स्वप्नलोक में सक्रिय रहते होंगे।  निद्रा में भी श्वास और संवहन की क्रिया के साथ साथ स्वयःक्रिय स्नायु की क्रिया भी चला करेगी। अतः यह भी कहा जा सकेगा कि पूर्ण समाधि जैसी स्थिति में भी हम सक्रिय रहते होंगे और विश्व चराचर के इस पार्थिव जगत में चेतना सहित वापस आने के लिए प्रयत्न कर लिया करेंगे ; अगर सफलता मिली तो सक्रिय हुए और विफलता मिली तो शरीर छूटा! बीच के अंर्तवर्ती पर्याय में ही चेतना का आवागमन होता रहेगा।  

श्रेष्ठ वही कहलायेंगे जो ज्ञानेन्द्रिय को वश में करके कर्मेन्द्रियों को आसक्ति रहित होकर  विधायक कर्म में लगा सकेंगे। [ii]  प्रजा पालन और प्रजा रक्षण के बारे में कहा जाता है: ब्रह्मा प्रजापालक हैं और प्रजा के कल्याण के लिए भी तत्पर रहते हैं। [iii] पूर्ण कर्मयोगी तो सभी कर्म यज्ञ  के रूप में ही किया करेंगे; [iv] भोजन करते समय भी जठराग्नि रुपी कुंड में भोजन रुपी द्रव्य कि आहूति देंगे। संग्रह वृत्ति से बचते हुए कर्मयोगी को विधायक कर्म में लगाना चाहिए। [v]

 



[i]  न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: ।। श्रीमद्भागवद्गीता  अध्याय ३ श्लोक ५ ।।

 न – नहीं ; नमस्ते - अवश्य ; कश्चित् – कोई भी ; क्षणम् – एक क्षण ; अपि – सम ; जातु – सदैव ; तिष्ठति – रह सकता है ; अकर्म-कृत - कर्म के बिना ; कार्यते – किये जाते हैं ; नमस्ते - अवश्य ; अवशः – असहाय ; कर्म - कार्य ; सर्वः – सभी ; प्रकृति-जैः – भौतिक प्रकृति से उत्पन्न ; गुणैः – गुणों से

 

[ii] यस् त्विन्द्रियानि मनसा नियम्यारभते 'अर्जुन

कर्मेन्द्रियैः कर्म-योगम् असक्तः स विशिष्यते।। श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय ३ श्लोक ७।।

यः – कौन ; तू - परंतु ; इन्द्रियाणि – इन्द्रियाँ ; मनसा – मन से ; नियम्य – नियंत्रण ; अरभते - प्रारंभ होता है ; अर्जुन – अर्जुन ; कर्म-इन्द्रियैः – कर्मेन्द्रियों द्वारा ; कर्म-योगम् - कर्मयोग ; असक्तः – आसक्ति रहित ; सः – वे ; विशिष्यते - श्रेष्ठ हैं;

[iii] सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्वष्टकामधुक् ।।

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।  परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।।

……………… श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय ३ श्लोक १०, ११ ।।

 

“प्रजापति ब्रह्माजी ने सृष्टि के आदिकाल में कर्तव्य-कर्मों के विधान सहित प्रजा की रचना करके उनसे कहा कि तुम लोग इस कर्तव्य के द्वारा सब की वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुम लोगों को कर्तव्य पालन की आवश्यकता सामग्री प्रदान करने वाला हो। अपने कर्तव्य कर्म के द्वारा तुम लोग देवताओं को उन्नत करो और वे देवता लोग अपने कर्तव्य के द्वारा तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे।“

[iv] गृहेश्व अविशतम् चापि पुंसाम कुशल-कर्मणाम् मद-वर्त-यत-यमानं न बंधाय गृह मतः (भागवत ४-३०-१९  (६)

“पूर्ण कर्मयोगी , अपने नित्य क्रिया और कर्तव्यों को पूरा करते हुए भी, ईष्ट को सभी गतिविधियों का भोक्ता जानकर, ईष्ट के  लिए अपने सभी कार्य यज्ञ के रूप में करते हैं।

[v] स विश्वजितं अजहरे यज्ञं सर्वस्व दक्षिणम् अदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचम इव (रघुवंश ४ - ८६ )[ श्लोक ५]

"रघु ने विश्वजीत यज्ञ इस सोच के साथ किया था कि जैसे बादल पृथ्वी से पानी इकट्ठा करते हैं, अपने आनंद के लिए नहीं, बल्कि उसे वापस पृथ्वी पर बरसाने के लिए, उसी तरह, एक राजा के रूप में उनके पास जो कुछ भी था, वह जनता से कर के रूप में एकत्र किया गया था, अपनी ख़ुशी के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर की ख़ुशी के लिए। अतः उन सभी संग्रहों को प्रजा हितार्थ खर्च करके फिर से भिक्षा पात्र लेकर योगक्षेम का इंतजाम करने के लिए निकल पड़े ।“

फकीरी

 


कभी अपने ही देश के राष्ट्रपति महोदय को कुछ ऐसी पीड़ा होने लगी कि वो ठीक से सो भी नहीं पा रहे थे; अगर सो भी जाते हों तो नींद ही नहीं आ रही थी।  वहाँ से कुछ दूरी पर बसे एक नगर में रहनेवाले एक फ़कीर बाबा के बारे में उन्हें पता चला ।  कभी कभी पढ़े लिखे लोग भी फकीरी पर भरोसा करने लग जाते हैं; और ख़ास करके तब जब अन्य सभी औषधि काम ही न आते हों।  औषधि के भी अपने कुछ नियम, कुछ सीमाएं और कुछ कमियाँ रह ही जाती होगी।  यह एक नैसर्गिक विषय ही समझें जो हर सृजन में कुछ न कुछ कमी छोड़ दिया करते हैं ; और उस कमी से चल पड़ने के लिए हम मजबूर भी हो जाते हैं।

आखिर महोदय को लेकर उनका ख़ास काफिला फ़कीर बाबा के शहर में आ पहुंचा ; उनके पास पहले सन्देश वाहक भेजा गया।  कोई आम व्यक्ति का आना जाना रहता तो अलग बात थी; पर उनके जाने के लिए व्यवस्था कुछ ख़ास ही बन जाती होगी ! आला अधिकारी के साथ कुछ एक हुए सिपाही वर्ग का काफिला पहले जा पहुंचा और फ़कीर बाबा को ही आदेश देने लग गए, "बाबा चलो, तुमसे हमारे राष्ट्रपति महोदय मिलाना चाहते हैं। "  

फ़कीर बाबा थोड़ी देर चुप्पी साधे रहे, और कुछ गड़बड़ी में भी थे , उन्हें मरीजों को देखने के लिए निकलना भी था; बाबा वहां जरूर जाते थे जो उनके पास नहीं आ पाता था ; सिपाही और अधिकारी के हरकतों को देखकर उन्हें ऐसा नहीं लगा कि उनके मालिक चलने फिरने की ताकत खो दिए हैं , वो बोले, "उनके दरबार में एक फ़कीर का क्या काम ! उन्हें जाकर कह दो मैं नहीं आऊंगा। "

संवाद पाकर राष्ट्रपति महोदय समझ गए कि जरूर अधिकारी लोगों ने फ़कीर बाबा के साथ अखर कर बात किया होगा।  अधिकारी हो जाने के बाद लोगों को अंग्रेजियत की हवा लग ही जाती है, और फिर उसी प्रकार सी उड़ान भरने लग जाते हैं; कभी कभी यह भी भूल  जाते हैं कि अपने यहाँ धरती नाम की कोई वस्तु है; और जहां हमें भी अपना शरीर छोड़कर जाना होगा।

मुसीबत का पैमाना कभी कभी लोगों को घुटनों पर लाकर छोड़ देता है; देश की जिम्मेदारी उठानेवाले महाशय के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।  फिर उन सन्देश वाहकों को भेजा गया; उन्हें घर पर ही रहने के लिए कहा जाय, राष्ट्रपति महोदय ही उनसे मिलने के लिए आएंगे।  जब तक सन्देश वाहक पहुँच पाते तबतक बाबा निकल चुके थे; दो तीन लोगों को वहीँ रहने के लिए कहा गया।  देर रात बाबा को सन्देश  मिला, पर दूसरा दिन क्या होगा वो दूसरे दिन सबेरे ही तय कर लेंगे।

दूसरे दिन भी बाबा देर से ही वापस आये; आकर देखते हैं कि पूरा काफिला ही उनके मचान के पास डेरा डाल चूका है; पड़ोस के घर से कुर्सियाँ  और मेज लाकर महोदय को बैठने भी दिया गया।  बाबा को देखकर और कोई खड़ा हो या न हो, राष्ट्रपति महोदय जगह छोड़कर खड़े हो गए; और उनको देखकर अन्य सभी लोग भी ताल में ताल मिलाने लगे; कुछ लोगों को मजबूरन ही खड़ा होना पड़ा।  जिस आदमी का रहने खाने, नहाने आदि का कोई ठिकाना ही न रहा होगा, उसके लिए राष्ट्रपति जी जगह छोड़कर खड़ा हो जाएंगे !

इस घटना के लिए कोई भी मानसिक रूप से प्रस्तुत नहीं थे, कुछ देर तक सन्नाटा रहा।  फ़कीर बाबा अपने चबूतरे पर आसीन हो गए और जिन मरीजों दूर बिठाकर रखा गया था, उन्हें एक के बाद एक बुलाने लग गए।  राष्ट्रपति जी को लगा उनका नंबर ही शायद पहले आ जाएगा, ताकि वो जल्दी से जल्दी  जगह छोड़कर अपने डेरे पर जा सकें; पर यह तो बाबा का दरबार था ! फिर उन्हें सबकी पीड़ा समझना है। 

जिनकी तकलीफें ज्यादा थी उन्हें पहले बुलाया जा रहा था।  आखिर महोदय  का नंबर आया, " कहिये, क्या तकलीफ है?"

"तहलीफ!"

"यहाँ हर कोई तकलीफें लेकर ही आता है !"

"हाँ, वैसे मुझे भी तकलीफ तो है।  रात को नींद नहीं आती; काफी दवा बदल बदल के लिया, पर कोई असर नहीं हो रहा है। "

"इंसान को नींद आती है, सुलतान को नहीं।  समझ में आया; या फिर और कुछ बताना होगा ?"

"कोई ताबीज , कोई दवा!"

"पढ़े लिखों को ताबीज आदि देना ही बेवकूफी है ! तुमने इंसान और सुलतान को मिलाकर रख दिया ; तो नींद कैसे आएगी ! रात को जब बिस्तर पर जाते हो तो यह भूल जाया  करो कि तुम इस देश के सुलतान हो, तो फिर नींद आ ही जायेगी। "

हप्ते भर में राष्ट्रपति जी को फ़कीर बाबा के बताये नियम से चलने का फल मिल गया; नींद भी आ गई, सफलता भी मिलने लगी।  दिमाग पर से मानो किसी ने एक परदे को ही खींचकर अलग कर  दिया ।  फकीरी पर पहले से ही उन्हें कुछ विश्वास था, वो और बढ़ता चला गया।  उस शहर में आते ही महोदय बाबा के दरबार में जाते थे।

ब्राहण की गाय

ब्राह्मण देवता को एक गाय दान में मिली; उस गाय को लेकर महाशय घर तो आ गए, पर रखें कहाँ? एक छोटी सी कुटिया में अपना सस्त्रीक डेरा लगता है, और उसी के बगल में मनसा देवी का एक उपासना स्थल भी बनाया गया था; फिर गौ माता के लिए मुश्किल से चार गज जमीन बन पाती होगी।  उसके ऊपर से फिर आनेजानेवालों   की कतार लगाती थी।  फिर भी किसी तरह गैया को बाँधी गई; नियमित चारे की व्यवस्था भी की गई। यह तो हमेशा के लिए परेशानी ही बन गई; ऊपर से ब्राह्मणी के कठोर वचन की बौछार चलती थी।  ब्राह्मण देवता तो गाय लेकर फिर पटकथा भूल ही गए, पर मोहिनी  के लिए यह किसी फंदे से कम नहीं; भरपूर खानेवाली गाय एक चटाक भी दूध नहीं देती।  ऐसा दिन भी आ गया जब पगहा छुड़ाकर गैया हरियाली की और भागने लगी।  तंग आकर महिनी ने उसे फिर बांधना ही छोड़ दिया, "जाओ, पड़ोस में कई खेतिहरों का बसेरा हैं, मांगकर काम चला लो। "

गौ माता को मान भाषा की समझ आई हो, चलते हुए दो चार बार मुड़ मुड़कर पीछे देखने लगी; अपना हिस्सा पाने के लिए दोपहर को घर आ जाती, हिस्सा पा लेने के बाद फिर चल देती। आनेजाने का यह सिलसिला चलता रहा।  हर बात की स्थिरता आ गई होगी ऐसा भी नहीं।  उसपात कईओं की नजर भी थी।  वे खिला पिलाकर गौ माता का विश्वास हासिल करने का प्रयास करते रहे।  फिर अकेली गैया ज्यादे दिन अकेले रहेगी क्या! उसे अपने जैसों की तलाश ही थी, जो जन्मेजय साहूकार के गौशाला में मिल ही गया।  उस पड़ाव तक गैया का कदमताल बना रहा, उसके बाद मुड़कर वापस आने की बात और दोपहर के भोजन में से हिस्सा मांगने की बात मानो भूल ही गई। 

पूजापाठ से वापस आने के बाद रोज ब्राह्मण देवता भगवती के बारे में पूछते और मन मोटाव को बनाते हुए किसी तरह भोजन कर लेते। महीने भर   से सामने का परिसर खाली देखकर उन्हें लगा कुछ इंतजाम करना चाहिए; पता नहीं कड़ी धुप में गौ माता कहाँ डेरा डालती होगी?   कुछ खाने के लिए मिलता भी होगा या नहीं! कई बात सोचकर उन्हें पीड़ा भी होती थी।  अपने देश की कथा है ही निराली; यहाँ गौ माता को पूजनेवाले और काटकर खा लेनेवाले साथ साथ रहते भी हैं और जीविका के लिए अनुसंधान भी करते हैं।  कहीं विपरीत   प्रकार से बने प्रयोगशाला में गौ माता को ले जाय गया हो तब तो पाप ही लग जाएगा।  यह सोचकर ब्राह्मण देवता अपने काम काज छोड़कर तलाशी अभियान चलाने लगे। 

बलभद्र ब्राह्मण देवता का बचपन का मित्र, उसे किसी साहूकार के गौशाला में ब्राह्मण देवता की गाय नजर आई।  खबर फ़ैल गई; पंचायत बैठी; निर्णय यह हुआ कि कुछ खर्चा पानी देकर साहूकार के पास से ब्राह्मण देवता भगवती को वापस ले जाएंगे।  इसबार भगवती बगावत पर आ गई , और अपने साथी सहपाठी को छोड़कर ब्राह्मण देवता के घर आने से इनकार कर दिया।  जिस साईकिल के पीछे बांधकर उसे लाया जा रहा था वो साईकिल भी चकनाचूर हो गया; ऊपर से कई घाव भी बने ! आखिर सौदागर की बुद्धि भी सौदों के इर्द-गिर्द ही चलती है; जाहिर सी बात थी कि एक सस्ते का सौदा हुआ और गौमाता को हमेशा के लिए साहूकार के गौशाल में जगह मिल गई। 

घर आने के लिए ही ब्राह्मण देवता चले थे, बीच पड़ाव में उन्हें फिर से बलभद्र से मुलाकात हो गई; लम्बी चर्चा भी चली।  उन्हें इसबात का भी पता चला कि भगवती को उनके घर पर ही उपेक्षा मिली, यही कारण रहा होगा कि उसने साहूकार के घर से वापस आने के लिए राजी नहीं हो रही थी।  जब भी कुछ कारनामें को अनजाम दिया जाता है तब उसके पीछे किसी न किसी किरदार की भूमिका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आँकी जाती होगी।  इस दृष्टि से भगवती का बेघर हो जाने के पीछे भी ब्राह्मणी का ही हाथ माना गया।   एक मानवी होने के कारण उसमें श्रद्धा , भक्ति, ईश्वर अनुराग सहज रूप से ही रहता होगा; पर दृश्य जगत में कुछ कारनामों के जरिये उसने इसका प्रदर्शन ठीक से शायद नहीं किया होगा।  ब्राह्मणी को भी उसके किये का पछतावा था; साथ ही साथ मजबूरी भी थी।  गरीबी की मार झेलनेवाले परिवार से हम शायद ही यह उम्मीद रख सकें कि अपना पेट काटकर भगवती का पेट भरें; उसपर से तब जब ऐसा करने से कोई नगद नारायण अत ही न हो!

ब्राह्मणी को लगा कि भगवती आ ही रही होगी, इसबार उसने अपनी चूड़ियां बेचकर चारा लाकर रखने का इंतजाम किया; कमसे कम महीने भर की चिंता से मुक्त होने का मौका मिले! अब उसे बाहर नहीं छोड़ा जाएगा।  पर ईश्वर को यह योजना मंजूर न थी, नतीजा हुआ कि ब्राह्मण देवता मलहम पट्टी और दवाई के साथ थपेड़ों को झेलते हुए घर वापस आये; साथ में खंडित हुआ पगहा भी था।  कुछ कह पाने की स्थिति में भी न थे।  आकर बिस्तर पर   लेटे और कम्पित स्वर में एक लोटा पानी माँगा; वह पीने के लिए या फिर हाथ धोने के लिए, यह भी स्पष्ट नहीं हो रहा था।  

त्रिवेणी

आ मदालसा बुआ और पूज्य भाया के मिमित्त से मेरा वर्धा प्रवास और साथी संस्थाओं से संपर्क सं १९९५ से जारी है।  उत्तर बुनियादी के अभ्यास , शिक्षा शोध और जल, जंगल जमीन विषयक अध्ययन के निमित्त से भी संस्थाओं और कुछ सरकारी संघों के साथ रिश्ते बने।  वर्धा प्रवास उन सभी संबंधों का केंद्रीय पक्ष है। 

पूज्य भाया और मदालसा बुआ के साथ जुड़े रहने का एक बड़ा सन्दर्भ उस त्रिवेणी से है जो पूज्य जमनालालजी, पूज्य बापू और आचार्य विनोबा के कारण बना।  श्री जमनालालजी पर यह जिम्मेदारी दी गई थी की क्रांतिकारी परिवारों को मदद पहुंचाएं और उनके बहु बेटियों को संरक्षण दें; जो कि उनहोंने बखूबी निभाया।  उसी निमित्त से वो कई बंगाली परिवार में भी आते रहे और प्रत्यक्ष रूप से मदद भी पहुंचाया।  बचपन से हमें यही सिखाया गया कि पूज्य भाया और मदालसा बुआ अपने हैं; उनसे हमारा गहरा रिश्ता है। गिने चुने साथी संस्था को तकनीकी मदद पहुंचाने के क्रम में अन्य कई संस्था से भी सम्बन्ध जुड़ गया।  वह सिलसिला आज भी जारी है।  मेरी और से किसी भी संस्था से समर्थन या सहयोग पहुंचाने का क्रम बंद नहीं किया गया।  जहां दिशा और पैमाने बदल जाते हैं वहाँ कुछ हद तक दूरियां बन जातीं हैं।  

सहज रूप से मैं आचार्य विनोबा को आधुनिक संत मानता हूँ और यह भी महसूस करता हूँ कि उनके बताये लोक नीति और लोक व्यवस्था के अद्घार पर किसी भी संस्था संघ को सक्षम बनाया जा सकता; वह फिर अपना देश भारत या फिर विश्व जगत ही क्यों न हो।  अगर सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि जनता जनार्दन का सबसे बड़ा हिस्सा ऐसा ही जी जय श्री राम या जय रावण खुलकर नहीं बोलता; वो सिर्फ जय ही, जय हो बोलते हैं और जिस तरफ पल्ला झुका उस तरफ झुक जाते हैं।  कभी सिकंदर विश्व जय करने निकले थे और भारत में जब उनका अभियान चल रहा था तब कुछ ऐसे संत मिले जो अपने लिए दिध गज की जमीन नाप रहे थे।  उनसे इसका कारण पूछ गया तो उनहोंने कहा कि सिर्फ उसी जमीन से उनका वास्ता होनेवाला है; वो भी कुछ पल के लिए , उसके बाद वो भी मिट जाएगा।  उनमे से एक संत ने सिकंदर को कहा, "राज्य जय करके तुम्हारा सिंहासन पर बैठना संभव ही नहीं ही पायेगा, उसके पहले तुम्हने तुम्हारा शरीर त्यागना होगा और तुम्हारा भी उस डेढ़ गज जमीन से ही वास्ता होनेवाला है। "

सिकंदर ने फिर अपने साथियों से कहा, "इस प्रकार के संतों क न तो प्रतिष्ठा कि लालसा है और न ही धन और भूमि का प्रयोजन, उन्हें सिर्फ लोक हितार्थ काम करते रहना है।  अगर कोई इन महात्माओं का विश्वास जीत लिया तो वह भारत भूमि पर राज करेगा। "

भारत के इतिहास में शायद ही ऐसा कोई पल आया हो जब्ब उसके शाशकों ने किसी पर हमले किये हों, या फिर किसी देश को लूटा हो ; ार अत्याचार सहने और मुसीबतें झेलने की परमार सी चली आ रही है।  गुलामी के क्रम में एक बड़ा मोड़ तब आ गया जब बम्बई के एक अंग्रेज अफसर एल्फिंस्टन ने अपने सम्राट से पत्राचार करते हुए भारत को हमेशा के लिए गुलाम बनाने का मसौदा लिख डाला, "संस्कृति किसी भी सम्प्रदाय की रीढ़ की हड्डी होती है।  अगर हम उस सम्प्रदाय को गुलाम बनाना चाहते हों टी हमें उस हड्डी में विकार लाना हगा।  अंग्रेजी सीखा देने से भारत के सम्प्रदाय में विकार आ जाएगा और ये गुलामी करने के आदि हो जाएंगे।  इसके लिए उन्हें मयबोध से अलग हटाकर सिर्फ भाषा, गणित और कुछ वयवहार सिखाना होगा।  वो अपनी संस्कृति से काट जाएंगे और अंग्रेजी संस्कृति से जुड़ जाएंगे।  फिर यह माने नहीं रखता कि हम भारत में हैं या नहीं; भारत के लॉग सदियों के लिए अंग्रेजियत कि गुलामी करते रहेंगे । "

 इस बात का संकेत भारत के मनीषियों को मिल चूका था।  इसे रोकने के लिए सबसे ठोस कदम उस त्रिवेणी ने उठाया जिसका जिक्र पहले किया जा चूका है।  नै तालीम को अमली जामा पहनाने का काम और रचना कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर लग जाने कार्यक्रम उसी दिशा में किया जानेवाला पहल था।  स्वतंत्र भारत में फिर संस्था संघ के पैमाने और दिशा बदलते गए और उस त्रिवेणी से निकले स्वराज और स्वावलम्बन कि धरा को कहीं खो जाते हुए देखा गया।  लोक सेवक और उन सेवकों के संघ कि बात तो अछूती रही; कुछ और ही सेवक संघ बनाते रहे और जनता जनार्दन के अरमाँण को बारी बारी से कुचला जाने लगा।

आचार्य विनोबा यह भी समझ चुके थे कि जान, जार और जमीन क लेकर संघर्ष की स्थिति बन सकती है।  इसलिए उनहोंने सभी कार्यकर्ताओं को भूदान यजन में लगाया और खुद भी कूद पड़े।  आज भी हमें इतना तो विश्वास है ही कि किसी भी प्रकार की उन्मत्तता से जनता जनार्दन क मुक्त करने का काम उस त्रिवेणी के kund से ही किया जा सकेगा।  इतना जरूर है कि सूचना तंत्र के युग में उस तत्व कि गहराई में उतरकर हमें संघबद्ध होकर काम करना होगा।  संघबद्ध होने का पहला सिद्धांत यही है कि हम सभी भेद बुद्ध से ऊपर उठकर लामबंद ह सकें और समस्याओं से उभरने का प्रयास करें।

कई बार ऐसा लगता था कि मदालसा बुआ और भाया के गुजर जाने के साथ साथ मेरा शायद वर्धा प्रवास छूटेगा; पर प्रेम सम्बन्ध इतना गहरा  था कि उस प्रेम सम्बन्ध को शायद इस jeevan में खंडित नहीं किया जा सकेगा।  विश्वास और विश्वसनीयता के यही पैमाने हैं जिसके आधार पर हम संघबद्ध होने का प्रयास करते हैं; फिर भौतिक दूरी बेमानी हो जाती है।  बाबा विनोबा में एक हुनर तो था कि वो हर व्यक्ति से काम ले लेते थे; उनहोंने डाकुओं से भी हथियार डलवाया और उन्हें समाज कि मुख्य धरा में मिवाया; श्री जमनालालजी उस सरस्वती धरा कि भाँति बिना  थके कार्य करते रहे। 

क्रान्ति वीरों के परिवार के साथ एक और परेशानी ऐसी थी कि उनके बच्चों को स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाटा था।  उन बच्चों को उठाकर आना, बुनियादी शिक्षा से शिक्षित करना होनहार बनाना, यह भी उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी रही।  इन यादों को ताजा होते हुए तब महसूस करता हूँ जब ब्रह्म विद्या मंदिर में दाखिल हो जाता हूँ और वाहन बेस वरिष्ठ जनों से बातचीत करने लग जाता हूँ।  मेरे लिए यह गर्व का ही विषय है कि उस तत्व सममान के वातावरण में मैं पला बढ़ा और वही संस्कृति मुझे विरासत में मिल गई। देश में उन्मत्तता और माहौल का बिगड़ाव देखने से पीड़ा होती है और अपने शोधार्थी स्वभाव के कारण विविध प्रकार से समाधान सूत्र निकालने के लिए मन बेचैन हो उठता है।  कुछ संस्था संघ से मुझे कुछ उम्मीदें तो हैं; पर उनकी मर्यादा और सीमा को समझते हुए मैं इसे जाहिर नहीं कर सकता।  कहते हैं अर्थ ही अनर्थ का मूल है , इस बात को सत्यापित करते हुए संस्था संघों में भी भटकाव देखा जा रहा है; उनके कई इकाइयों के पैमाने और दिशा बदल भी रही है।  इन सबको जोड़ने का विज्ञान भी तत्व कि गहराई में ही निहित है।  गीता में भी श्री कृष्ण आखिर में अर्जुन से कहते हैं, "यजन, दान और तप त्यागने योग्य नहीं हैं; इसका अनुपालन तो सबको करना चाहिए ।"

मानव का जीवन मात्र ही किसी न किसी उद्देश्य को पूरा करने के निमित्त हुए हम महसूस कर सकेंगे; किसी भी रोजगार (या जिसे हम जीविका उपपार्जन के लिए किया जानेवाला वृत्ति कहते होंगे) व्यक्ति का लगे रहना एक नैसर्गिक विधान ही मन लेना होगा।

"मैं कर्म नहीं करता, मैं ज्ञान मार्ग का उपासक हूँ, मैं व्यक्ति जीवन से संन्यास ले चूका; मेरे लिए कोई कर्म शेष ही नहीं रहता; मैं कर्म के बंधन से मुक्त होकर दिव्य जीवन का पथिक बन चूका हूँ; आदि कहनेवाले किसी भ्रम में रहकर कर्म विमुखता का प्रदर्शन करते होंगे।  महर्षि वेदव्यास स्थान स्थान पर कई बार श्री भगवान के जरिये इसी बात का स्पष्टीकरण करते हुए बार बार  कर्मी, ज्ञानी और भक्त को जीवन पर्यन्त कर्म में जुड़े रहने की शिक्षा देते आये।  उस तत्व पर लम्बी लम्बी व्याख्यान लिहनेवाले संत महात्मा भी "उस यज्ञार्थ कर्म"; "ज्ञानाग्नि दग्ध कर्म"; विधायक कर्म; नित्य कर्म ; आदि विषयों पर अपने अभिमत देते हुए; और ऐसा भी कहते आये कि साधक, भक्त, ज्ञानी, प्रजा पालक आदि सभी जीव के लिए नित्य और विधायक कर्म में लगे रहना ही होगा।

इस विषय को अधिक स्पष्ट करते हुए हम दैनिक जीवन से कुछ उदाहरण जरूर ले सकेंगे।

गुजरात के किसी गांव में जाकर एक युवा सन्यासी दिनभर व्याख्यान देते रहे; उनके पास शंकाएं और व्यक्तिगत समस्या लेकर आनेवालों की कतार लगी रही।  ऐसा करते करते दिन बीता।  संध्या के समय जहां उनके लिए रात्रि वास की व्यवस्थ की गई वहाँ भी कुछ श्रीमंत लोग आते रहे, चर्चाएं चलती रही; ज्ञान की गंगा भी बही।  अंततः देखा गया एक महाशय चुप्पी साधे कमरे के एक कोने में काफी देर बैठे रहे।   

महाराज जी को लगा उस आगंतुक को भी कोई समस्या रही होगी; सबके सामने शायद नहीं कह पा रहे हैं ; फिर पूछे, "सब तो चले गए! तुम्हें कोई तकलीफ है तो कह सकोगे। "

"तकलीफ?"

"यहां तो सभी आगंतुक तकलीफें और शंकाएं लेकर ही आते रहे!"

"हाँ, वैसे मुझे भी एक तकलीफ तो है। सब तो गए, अब आपके भोजन की क्या व्यवस्था होगी? मैं तो ठहरा हरिजन, आपको पका हुआ भोजन लाकर दे भी नहीं सकता; और आपको इस तरह भूखा छोड़कर जा भी नहीं सकत। "

युवा सन्यासी इस भूमिका में किसी अनपढ़ ग्रामीण को देख पाने के लिए मानसिक रूप से तैयार न थे; इसलिए उन्हें कुछ अजीब ही लगा।  वो शास्त्र के जानकार थे, संन्यास के मार्ग पर नए थे; गीता का ज्ञान उन्हें भी था; पर भूमियकायें बांधकर खुद को श्रेष्ठ मानने लगे थे।  अतः किसी ग्रामीण, और ऊपर से हरिजन में, इस प्रकार की परिपक्वता उनके अहंकार के तिनकों को हटा दिया; आँखे आंसू से भरा; यह सोचने लगे इस हरिजन ने उनके पिता का काम कर दिया ; सभी ज्ञानी, तत्व वेत्ता पंडितों को लज्जित भी कर दिया।

"हरिजन हुए तो क्या हुआ तुम ही पकाकर ला दो !"

"लोग क्या कहेंगे! मेरे हाथ से खाने से आपको भी लोग कोसेंगे; आपकी जात भी चली जायेगी; ऊपर से ठहरे महंत ! "

"अब तो तुम्हारे हाथ से ही भोजन लेना होगा; नहीं तो एक्डिन में क्या होगा, भूखा ही सो जाऊंगा। "

अंततः उस हरिजन के जरिये ही भोजन की व्यवस्था की गई , वही खाकर युवा सन्यासी सो गए। यहाँ आगंतुक हरिजन अपने वैयक्तिक गुणधर्म के आधार पर युवा सन्यासी के लिए भोजन का इंतजाम किया किसी स्वार्थ की भावना से ग्रसित न होकर यज्ञार्थ कर्म के नियमों के अधीन ही युवा सन्यासी की सेवा में बैठा रहा, अपनी भूमिका आने तक धीरज के साथ बैठा रहा।

गीता  à त्यागी

कभी एक देवस्थान में पुजारीजी के दरबार में कुछ साधक, महात्मा, तत्ववेत्ता धर्म दर्शन विषय पर चर्चा करने बैठे; चर्चा भी लम्बी चली; सब अपने अपने अध्ययन  और हुनर के बारे में लम्बी व्याख्यान देने लगे।  आखिर पुजारी जी की बारी आयी।  उनसे पुछा गया कि गीता पढ़ना क्या सबके लिए जरूरी है?  उनहोंने (पुजारीजी ने) उस प्रश्न पूछने वाले माशय से कहा, "जरा जल्दी जल्दी गीता, गीता……….  कहकर बताओ!"

जिज्ञासु महाशय जल्दी जल्दी कहने लगे, "गीता, गीता, गीतागीतागी ……. त्यागी, त्यागी…………. "

"अब तो तुम त्यागी, त्यागी, त्याग………..  ऐसा कहने लगे! बस, अगर तुम त्यागी का सही मतलब समझ गए तब तो गीता पढ़ना जरूरी नहीं ! "

पुजारी जी का यह भी कहना था, "जब शरीर ही हमारा नहीं तब घमंड कैसा, और मेरा मेरा; मैं करूँ , मैं करूँ इस बात को लेकर झगड़े क्यों?"

गीता और अन्य सभी शास्त्रों में इसी बात को बारी बारी से, कथा और कहानी के जरिये भी वही एक बात को ही बार बार कहा गया ; जो समझ जाते होंगे, उनके लिए ज्यादा पढ़ना फिर जरूरी नहीं रह जाता। भक्त का विश्वास, ज्ञानी का ज्ञान और साधक कि साधना  ; ये सब ईश्वर द्वारा निर्देशित कर्म को करने के लिए ही होना होगा।  असली सुख तो खुद के खो जाने में ही है। ज्ञान कि अपनी एक सीमा भले ही होता हो, पर असल में तो वह असीम ही है, जिसे पूरी तरह कभी आत्मसात नहीं किया जा सकेगा; जो ऐसा मानते होंगे उनके प्रति हम सबके मन में करुणा ही रहेगी।

नमक का पुतला

कभी बड़े  बड़े  विद्वान्  मंदिर के महंत जी का हुनर विषयक जानकारी लेने के निमित्त से मंदिर परिसर में आ गए।  उन सबकी एक ही शिकायत थी कि पुजारी जी विधिपूर्वक पूजा का अनुष्ठान नहीं करते; यहां तक कि भगवान को जूठा भी खिला दिया करते हैं।  सबको भगवान का दर्शन कराने की बात भी करते  होंगे।  अतः शास्त्र, वेद, कर्मकाण्ड विषयक उनके हुनर की परीक्षा लेना जरूरी समझा जाय।  अनुमति भी मिली, परीक्षा, सवाल-जबाब का दिन भी तय हुआ और सबके सब महानुभाव उस कक्ष की और चल दिए जहां पुजारी जी रहते थे।  उनके साथ कुछ और भक्तों का रहना-खाना चलता था; सबके सब घबराये, सिर्फ पुजारीजी के चेहरों पर चिंता की एक भी लकीर न थी; पहले की भाँती बिलकुल "साद प्रसन्न"। 

परीक्षक वर्ग अपना- अपना परिचय देते रहे; उसी में काफी समय बीता; प्रश्न पूछने का सिलसिला कहलाने ही वाला था, इतने में पुजारीजी सबको रोककर अपनी एक छोटी सी बात कहने लगे, "देखो भाइयों, एकबार नमक का एक पुतला सागर नापने निकला , उसकी घर वापसी न हो सकी ! अब मुझे कुछ और न कहना; आप सब सवाल पूछ सकेंगे। "

आनेवालों में कानाफूसी होने लगी,"यह वेदांत सार है! इसका अर्थ यही लगाया जा सकेगा, किपुजारीजी को भागवत, पुराण, वेद, उपनिषद्, गीता का सम्यक ज्ञान रह भी सकता है ; शायद वो ईश्वर के साथ एकरूप हो गए होंगे, इसी लिए उनके लिए कर्मकांड आदि बेमानी लगते होंगे। "

काफी देर तक चुप्पी लगी रही; सबको अपने अपने आधे अधूरे ज्ञान के बारे में चिंता होने लगी; पोल खुल जाने कि पीड़ा भी सताने लगी; प्रश्न पूछने के लिए “पहले आप, पहले आप…..” का सिलसिला चल पड़ा।  आगे आये भी तो कौन! कोई छोटा पुतला तो कोई कुछ बड़ा; समुद्र नापने के निमित्त से पीड़ा सबको ही होनेवाली; सबको बिखरना भी होगा, मिटाना भी होगा और एकरूप भी होना होगा।  अंततः मजबूरी में ही समझें, प्रश्न पूछने का सिलसिला शुरू ही नहीं हो पाया; यहां तक कि उनमें से कुछ साधक भक्त बनकर पिघल जाने कि पीड़ा से छुटकारा लेने का प्रयास करते हुए अपनी राह चल दिए।

भोजन छोड़ देना; अग्नि को न चूना; सिर्फ व्याख्यान करते रहना; आदि संन्यास की उत्तम दशा  नहीं हो सकती; ईश्वर से एकरूपता की स्थिति में सभी मोह माया आदि अपने आप ही मिट जाय करेंगे; अगर मेरा " मैं पन "  नष्ट न हो पाते हों तो कभी कभी "मैं सेवक, तुम सेवक का भान " लेकर ईश्वर के साथ एकरूप होने का सिलसिए चल सकेगा।  फिर धीरे धीरे मेरा "मैं" उस चिरंतन सनातन सत्ता के साथ एकरूप हो पायेगा; आखिर पिघलना ही जीवन की नियति हो सकेगी; कोई पहले ही पिघले, और फिर कोई कुछ दिनों के बाद!

कर्म विषयक शंकाओं का निरसन करते समय भगवान कहते हैं:

न तो कोई केवल कर्म से विमुख रहकर कमर्फल से मुक्ति पा सकने की पात्रता रख सकता और न ही केवल शारीरिक संन्यास लेकर ज्ञान का अन्वेषण करते करते सिद्धावस्था पाने की पात्रता रख सकता। यह भी मान्यता बानी कि क्षण भर के लिए भी कोई कर्म का अनुष्ठान किये बिना नहीं रह सकता; कर्म का अनुष्ठान तो प्रकृति के गुणों के अधीन अपने आप ही होते रहेंगे । सावधानता इस बात की भी रहे कि इन्द्रिय संयम के साथ साथ अंतर मन पर भी नियंत्रण  बने।  सिर्फ बाहरी इन्द्रिय संकुल का नियंत्रण रहे और अंतर मन में उद्वेग, भोग - लालसा आदि बनी रहे तो उन्हें हम पाखंडी  ही कहेंगे, न कि तत्व वेत्ता साधक या कर्मयोगी।  (गीता III - ४- ६)

श्रेष्ठ वही माने जाएंगे जो इन्द्रिय संयम रखने के साथ साथ किसी आशा अभिलाषा के बिना ही नियत कर्म में लगे रहते हैं।  कर्म विमुखता से शरीर का भरण पोषण भी संभव नहीं हो पायेगा; इसलिए नियत कर्म में लगे रहना कहीं श्रेष्ठ मानें। भगवान के सुख के लिए और फल की आसक्ति के बिना अपने नियत कर्म में हमें लगे रहना होगा; इसे यज्ञ के निमित्त से किया जानेवाला कर्म ही समझें; जठर की अग्नि में भोजन की आहुति; ज्ञान रुपी अग्नि में कर्म की आहुति; अहम् रुपी प्रखर तेज में मन के संकल्पों का हवन; दान रुपी यज्ञ में समपदाओं का हवन ; और इसी प्रकार से और कई रूप में यज्ञ संस्कृति का परिचायक कर्म का अनुष्ठान साधक का कर्तव्य ही समझें।  उसी संस्कृति का बखान करने के लिए योगेश्वर समय समय पर, स्थान स्थान पर यज्ञार्थ कर्म की बात करते आये। ईश्वर के प्रति सर्पण के भाव से किया जानेवाला कर्म (यज्ञार्थ कर्म) सदैव मंगलदायक ही होगा; इसके अनुष्ठान से दिवाता और मानव के बीच समन्वय की भी स्थापना हो पाएगी; साधक खुद का सन्निधि में भी ईश्वर के अधिष्ठान रूई शाश्वत सत्य का उदघाटन कर सकेंगे। (गीता III – ७-१२  )[1] 

 

दूसरे क्या करें क्या न करें यह देखना भी अनुचित हगा, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे मन  में जो तत्व और विचार अनपटाए हों उसके विरोध में कोई कार्य करके हम कमसे काम अपने से चल न करें। इस वक्त इतना तो जरूर कहा जा सकेगा कि उस त्रिवेणी के कुंड में मैं बसेरा बना चूका हूँ; आगे क्या पड़ाव आनेवाला है इसका भी मुझे ज्ञान नहीं।  अपनी अनुसन्धित्सा बनी रहे यही अभिलाषा है।



[1] दान को यज्ञ रूप से करने की संस्कृति अपने समुदाय में कोई नया विषय नहीं है; इसे हम काफी प्राचीन समय से; वैदिक संस्कृति के काल से ही सुनते आये हैं।

"सच्चे कर्मयोगी अपनी गृहस्थी के कार्यों को पूरा करते हुए अपने सभी कार्यों को ईश्वर के प्रति सरन के भाव से  यज्ञ के रूप में करते हैं और केवल इष्ट को ही  सभी कर्मों का भोक्ता मानते हैं।" ….. श्रीमद्भागवतम्-4.30.19

प्रगति

 


ठाकुर नरेन को जनता जनार्दन के लिए व्रती होकर काम करने की प्रेरणा दे रहे थे और नरेन को व्यक्तिगत प्रगति की धुन लगी थी | निर्विकल्प समाधि का मंत्र तो है ही उत्तम कोटि का; पर ठाकुर रामकृष्ण को लग रहा था कि सभी भक्त वत्सल अगर समाधि  लेने  लग जाएँ तो फिर समाज का क्या होगा ! अतः कुछ भक्तों को वैयक्तिक प्रगती की लालसा से ऊपर उठकर शिव सेवा ज्ञान से जीव सेवा में लगना है | तभी समाज को प्रगती की राह पर लाया जा सकेगा | आचार्य विनोबा का मंत्र ही सर्वोदय का था ; प्रार्थना भी सामूहिक ही हो; उसमें भी सबके भावनाओं को भली भाँति पिरोए जाएँ |


संघ से महासंघ



मानवता का परिपोषक और उसके विपरीत , मार्ग पर चल पड़ने के आधार को नियामक मानकर विश्व को हम दो धूरी में बँट जाते हुए भी अब देख सकेंगे | संवेदनाओं को आधार मानकर संघों के सम्मेलन से ही मानवता का परिपोषक और परिचालक महासंघ भी बनेगा | उस ओर संघीय ढाँचों के मुखिया पहल कर भी चुके हैं | पिछले शताब्दी में हमने दो महा संघों को बनते और बिखरते भी देखा है | इस शताब्दी में भी उससे कहीं बलशाली एक महासंघ का निर्माण होगा और पुराने संघीय वतावस्था में कुछ फेर बदल करके उसे मिला लिया जाएगा या फिर पुराने संघ को पूरी तरह से नष्ट करके नये महासंघ की रूपरेखा को प्रस्तावित कर दिया जाएगा | कोई भी संघ जब जनता जनार्दन के अरमानों और आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाते हों तो उसका यही अंजाम होना एक भवितव्य मानना होगा |

अब वैसा समय नहीं रहा कि किसी एक गुट या संप्रदाय का वर्चस्व अन्य लोग आसानी से स्वीकार कर लें | सबके मतों को पुष्ट करते हुए प्रतिभागिता आधारित व्यवस्था के ज़रिए ही संघीय ढाँचों को ज़्यादा से ज़्यादा बल मिलेगा | इस ढाँचे से अलग होकर कोई भी व्यवस्था ज़्यादा कारगर सिद्ध नहीं हो सकती, ही उसे ऐसा होने देने की ज़रूरत है |

गुरु शिष्य परंपरा का दर्शन रामायण में दर्ज किया गया, मित्र और मैत्री परंपरा का दर्शन महाभारत में दर्ज हुआ, राजतंत्र के ऊपर से विश्वास हटने के क्रम में लोकतांत्रिक और समजतन्त्रिक व्यवस्था का मिश्रण आधुनिक विश्व का दर्शन रहा और अब सूचना तंत्र और प्रौद्योगिकी के बल पर क्रियान्वित रहने के मंत्र से अत्याधुनिक विश्व का क्रियान्वयन होना तय है | इस परिस्थिति में उसी संप्रदाय या समूह को अधिकाधिक समर्थन प्राप्त होगा जिसके पास तांत्रिकी का बल है | जो संसार को एक बलशाली निदान देते हुए प्रगति के मार्ग पर समुचित तरीके से मार्गदर्शन कर सकेंगे | जिनके पाससर्वजन हिताय सर्वजन सूखायकोई समाधान सूत्र रहेगा | कोरोना संक्रमण से विश्व को जो नुकसान हुआ वो दूसरे विश्व युद्ध में हुए नुकसान से कहीं ज़्यादा है, इस महामारी से समग्र अर्थ व्यवस्था पर दोहरी मार पड़ी, लोगों के रोज़गार छिन गये, दिहाड़ी मजदूरों को भुखमरी का शिकार होना पड़ा, सभी राष्ट्रों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारी नुकसान उठाना पड़ा, व्यक्ति से व्यक्ति की दूरियाँ बढ़ी और साथ ही साथ विश्वास भी टूटा | कुछ शक्तिधर देश इस संकट से भले ही उभर पाएँ पर विकास मुखी देशों के लिए इस संकट से पार पाना शायद ही संभव हो | इस संकट से उभरने के तुरंत बाद ही भुखमरी और बेरोज़गारी का संकट पूरी दुनिया को चपेट में लेने के लिए प्रस्तुत रहेगा |

ऐसा इसलिए भी होना तय है क्यूंकी सभी देश प्रत्यक्ष या फिर परोक्ष रूप से एक दूसरे पर निर्भर करने लगे हैं, एक दूसरे की व्यवस्था परस्पर के द्वारा काफ़ी मात्रा में प्रभावित भी होने लगी है | ऐसे सन्दर्भ में किसी भी संकट से उभरने के लिए भी संयुक्त रूप से योजनाएँ बनाने पड़ेंगे | एक दूसरे के क्रिया कलापों से होने वाले सभी परिवर्तनों का सम्मिलित परिणाम क्या होगा उसपर भी मंथन करने की ज़रूरत है |  अब जो संघ शक्ति का विज्ञान सन्दर्भित होगा उसके सम्मुख हमें स्वावलंबन के विवर्तित तत्वों को अमल में लाते हुए समग्र और सर्व समावेशक क्रियान्वयन के अंतर्गत विश्व व्यवस्था का नक्शा बनाना होगा | समस्या जागतिक है, तो जाहिर सी बात है की निदान तंत्र और संबंधित चिकित्सकीय प्रबंधन भी जागतिक हो, उसके व्यवस्थापन में लगनेवाले  लोग जागतिक हों तो जाहिर सी बात यह भी है कि प्रभावित लोग भी जागतिक नागरिकता के धारक ही होंगे | ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रीय नागरिकता के बगल में एक जागतिक नागरिकता मिल पाने की प्रक्रिया से भी हमें गुज़रना होगा , ताकि हम आसानी से जागतिक क्रियाकलापों में अपनी अपनी भूमिका तय कर सकें | यह कोई अलीक कल्पना पर आधारित समाज और नियमन का विज्ञान नहीं है, बल्कि यह तो समाज के जागतिक सूत्रों को एक तंत्र में पिरोने का ही विज्ञान होगा |

राजनीति के कारण भेदभाव करने का आरोप एक राजनैतिक दल अन्य दलों पर लगाने लगेंगे , यह एक सहज प्रवृत्ति मानी जाएगी | अजूबा तो तब होगा जब सभी राजनीति करने वाले दल और नेतागण सुर में सुर मिलाकर खुद को एक सैनिक के नाते जनता जनार्दन के सम्मुख प्रकट करने लगें और अपनी अपनी भूमिका तय करने लगें | यह परिस्थिति भारत जैसे देश में आकर चली भी गई | आरंभिक समय में जब लोगों को कोरोना संक्रमण के स्वरूप विषयक कोई जानकारी नहीं थी और भारत इस लड़ाई को लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं था तब सभी दल और नेता गण सुर में सुर मिलाने लगे, पर ज़्यादा दिन ऐसा कर पाने में असमर्थ रहे | इसका कारण पैसा और जनता पर अपने अपने नियंत्रण रख पाने के समीकरण के कारण ही होता हुआ सन्दर्भित हुआ | कोई एक सरकार पक्षपात का आरोप लगाने लगी तो कोई और सरकार के नेतागण जनता जनार्दन के खाते में सीधे पैसा देने का परोक्ष रूप से विरोध करने लगे | राजनीति का खोखलापन इतना गंभीर हो उठा कि महाराष्ट्र के पालघर में उन्मत्त लोग संतों को सिपाहियों के सामने ही पीट पीट काट मार दिए | व्यवस्था पर इसलिए भी सवाल खड़े कर दिए गये जब वहाँ की सरकार कुछ संवेदनहीनता का परिचय देते हुए संतों की हत्या को एक हादसा कहने लगे और लोगों से पुनः पुनः गुज़ारिश करने लगे कि उस घटना को कोई साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास करें | | समस्याओं का प्रमाण और ज़िम्मेदारियों का समीकरण कुछ भी हो सकता है , पर जनता जनार्दन के सामने  राजनैतिक  दलों का स्वार्थी स्वरूप प्रतिभासित होने लगा |

स्वतंत्र देश में जहाँ तिरंगों के नीचे भारतीय सेना के सभी होनहार जवान कार्यरत हो सकते हैं, जहाँ तिरंगे की शान बनाए रखने के लिए सिपाही जान की बाजी लगाते हों, जहाँ तिरंगे की शान में गीत गाए जाते हों , जिसकी गरिमा को ठेस पहुँचाने के पहले दुश्मन पचास बार सोचता हो उसी देश में कुछ राजनैतिक दल अलग अलग ध्वजों तले भारत को खुशहाल बनाने का शपथ लेने लगें और एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल दें तो यह कुछ शोभनीय विषय नहीं हो सकता | उन दलों और गुटों पर जनता जनार्दन को भरोसा रखने  से पहले भी हज़ारों बार सोचने की ज़रूरत है | संघीय ढाँचों में अपनी अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु अलग अलग विचारधारा रखनेवाले समूह को अगर सरकारी यंत्र का हिस्सा बनने दिया जाए तो जाहिर सी बात है कि उनके बीच के दरारों में ही अलगाव की जड़ों का विस्तार होता रहेगा, और अंततः ऐसी दरारें क्रमशः  संघ को ही संकट में डाल देगा| जहाँ नागरिक ही संकट में हों वहाँ नगर, परिषद, नेता , महाजन आदि लोगों का क्या होगा ? ऐसे महत्वाकांक्षी और स्वार्थी लोगों को रोज़गार के अवसर कौन देंगे? पहले तो राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र से भारी संख्या में मजदूरों को उनके गृह राज्य जाने के लिए मजबूर कर दिया गया, और उसके बाद आर्थिक गतिविधि शुरू कर पाने हेतु उनके वापसी की माँग होने लगी | इसका पता लगाना बहुत ही ज़रूरी है कि कौन कौन सी परिस्थिति में मजदूरों को बेरोज़गार होकर अपने घर की ओर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा | मजदूर और किसान जिस देश में सुरक्षित हों उस देश में गिने चुने कर्मचारियों को सुरक्षित रख पाना कहाँ तक संभव हो सकेगा?  कौन से तंत्र होंगे जिसमें कामगार, मजदूर और किसान सुरक्षित रह सकें? किसान और मजदूर के खातों में कुछ रकम दे देने से, उनके लिए खाद्यान्न उपलब्ध करने से और उनके मुफ़्त इलाज का दायित्व ले लेने से कुछ हद तक राहत मिलने की उम्मीद जताई जा सकेगी | इसे लंबी अवधि तक चलनेवाले उपयोजना का हिस्सा नहीं समझा जाना चाहिया | मजदूर , किसान और बेसहारा लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना और उन्हें हर परिस्थिति में हर राज्य में मदद मिल पाने की परिस्थिति का निर्माण करना ही स्थाई समाधान की ओर बढ़ाया जाने वाला पहला कदम मान सकेंगे |

सहभागिता आधारित लोकतंत्र

मौजूदा परिस्थिति में अगर हम जनता जनार्दन को एक ही ध्वज तले लाने का प्रयास करें तो हमें प्रतिनिधित्व आधारित लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक के लिए अंशभागी परिकल्पना को रूपयित करते हुए हर पक्ष की सहभागित सुनिश्चित करने लायक क़ानून परिषद का गठन करना होगा | भारत के सभी नागरिक को अगर हम संघीय रचना का हिस्सा मान रहे हैं तो उनके अंशभागी परिकल्पना को रूपयित करते समय भी उन्हें क़ानून परिषद या संसद में अपनी राय रख पाने का अवसर देना होगा | किसी एक होनहार जन प्रतिनिधि को सरकारी तंत्र से परिचित कराने हेतु और उनकी पात्रता सुनिश्चित करने हेतु किसी खास राजनैतिक दल का सहारा लेने की आवश्यकता इसलिए भी मानने लायक होगा क्यूंकी सभी दल अपनी अपनी आकांक्षाओं का बोझ जनता जनार्दन पर डालते चलेंगे और उन सबके जीवनयात्रा का खर्च सरल जनता पर डाल दिया जाएगा | अगर कुछ कर पाने की पात्रता हम रखते हैं तो सर्वोपरि महात्मा गाँधी द्वारा प्रस्तावित लोक सेवक संघ के प्रारूप पर अमल करने हेतु हम अंतर मन से तैयार हों और उसे अपने देश में त्वरित लागू करने के लिए एक वालिष्ठ और युगोपयोगी कदम उठाने का सत्साहस दिखाएँ | विरोध सिर्फ़ विरोध करने के लिए होकर एक तर्कसंगत विषय के साथ साथ संपूरक निदान तंत्र का हिस्सा रहना चाहिए | अपने यहाँ विरोध करना लोकतंत्र का एक कलंक बन चुका है, यहाँ तक की विरोध करने लायक ताक़त जुटाने के लिए विद्देशी ताकतों का सहारा भी लिया जाता है, जिसका नतीजा अलगाव और आतंक भी हो सकता है |

जम्मू कश्मीर आतंक का शिकार बना हुआ है | ऐसी परिस्थिति में वहाँ बसे लोगों पर क्या बीत रही होगी, यह तो हम आसानी से सोच भी सकते हैं | सवाल उल्टे तरफ से भी पूछा जा सकता है, कश्मीर में इतने आतंकी कहाँ से पैदा हो रहे हैं? उनको निरंतरता के साथ कौन सहयता दिए जा रहा है? इस जिहाद में काफ़ी लोगों की जानें जा रही है | इन तमाम पहलुओं को उजागर करने लायक कोई तर्कसंगत निदान तंत्र हमारे पास रहे यही अपेक्षित मानी जा सकेगी | मुसीबतों से हम ज़्यादा देर तक भाग नहीं सकते, इसका डटकर मुकाबला करने हेतु हमें अग्रज बनना होगा | व्यवस्था में लगे रहने के साथ साथ अपने करीबियों का भी ध्यान रखना होगा | इतना ही नहीं ऐसा करते हुए हमें संवेदनशील भी रहना होगा | मजदूर जब कर्मस्थल से अपने अपने घर के लिए चल पड़े तब किसी किसी के नज़रों के सामने से ही गुजर रहे होंगे | उन सभी लोगों के बीच अधिक संवेदना विकसित होने की ज़रूरत है | उन्होंने सभी ज़िम्मेदारियों को सरकार  पर थोपना मुनासिब समझा | जनता जनार्दन द्वारा मान्य एक संस्था हैसरकार, उसमें भी कुछ ऐसे तंत्र हैं जिन्हें यंत्र मानव से तुलना की जा सकती है | उनके सक्रिय होने का सीधा संबंध राजनैतिक इच्छाशक्ति द्वारा ही निर्धारित होता रहता है | 

अगर महासंघ बनना तय है और सबने अगर उसी व्यवस्था में जाने का निश्चय किया हो तो हमें यह भी देखना होगा कि आनेवाले कालखंड में उस व्यवस्था का स्वरूप कैसा होगा और उस व्यवस्था में  लगनेवाले  लोगों की उम्मीदें क्या होंगी | लोग सहज रूप से किसी भी व्यवस्था हिस्सा बन जाना ज़्यादा पसंद करेंगे और उन्हें हर व्यवस्था को लागू करने में तेज़ी लाना ज़्यादा पसंद होगा | लोग धार्मिक और जनजाति  आदि के भेद को भुलाकर एकसाथ काम करना ज़्यादा पसंद करेंगे | एक दूसरे की भावना को सनझते हुए कार्यरत रहने का भी प्रयास करेंगे | हमें भी चाहिए कि हम उस व्यवस्था और धारा का पूरा समर्थन करें और लोगों को आपस में घुल मिल जाने के लिए पूरा समर्थन दें | अपने अपने संकुचित विचारों को छोड़कर एक साझी संस्कृति का निर्माण करें और रचना कार्य में लग जाएँ |

आज विश्व में कोरोना संक्रमण हेतु निदान तंत्र, औषधि, चिकित्सा प्रणाली आदि तलाशने में लोग लगे हुए हैं, उनके पास सबसे सहयोग मिलने की उम्मीद भी है | इस परिस्थिति में सभी जन जितनी सघनता से कार्यरत रहेंगे उतने ही अच्छे परिणाम का दर्शन हो सकेगा | यह एक ऐसी अवधि है जब हम एक दिखने वाले दुश्मन का मुकाबला कर रहे हैं | यह दुश्मन एक लंबी अवधि के लिए हमारे बीच रहने वाला है, अतः जाहिर सी बात है कि हमें इसके साथ ही रहना सीखना होगा |

एक आम नागरिक खुद को संक्रमित होने से बचाने के लिए सामाजिक दूरी बनाकर रखते हुए कार्यरत रहें,  विशेष ज़िम्मेदारी में लगे लोग अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह कुशलता पूर्वक करें, अलगाव का लाभ उठाने वाले तत्वों को पहचानते हुए  ऐसे विघटनकारी तत्वों को समाज के चक्र से अलग रखने का प्रयास हो, देश के नागरिकों को अपने अपने धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक भेद को भूलना होगा | अधिकाधिक सघन रूप से कार्य कर पाने का एक सुनहरा मौका , जो कि कोरोना संक्रमण के मध्यम से आपदा के रूप में आया है, हमारे सम्मुख कई चुनौतियों को एकसाथ रख दिया | हमें अपने सूक्ष्म बुद्धि से आपदा प्रबंधन के कौशलों में लचीलापन रखते हुए अनदेखे शत्रु को पहचानना होगा और उचित उपयोजना पर अमल करना होगा | इस क्रम में कोई एक लापरवाही पूरी व्यवस्था और समग्र प्रबंधन को विफल कर देगा |  व्यवस्था में लगे लोगों को और ज़्यादा संवेदनशील होने की आवश्यकता है | संवेदना ही राष्ट्रीयता और समन्वय का मानक होने के साथ साथ उत्तम व्यवस्था का परिचायक है | इसके अभाव से किसी भी राष्ट्र और संप्रदाय के लिए संकटापन्न स्थिति में जाना एक भवितव्य मान लेना अनुचित होगा | हम इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते कि संवेदना रहित क्रिया कलाप हिंसा से ग्रसित हो सकता है | ऐसी परिस्थिति में संवेदनाओं को अगर राष्ट्रीय क्रिया कलाप का हिस्सा बनाना भी चाहें तो उसका मानक कौन कौन से होंगे? किसके प्रति संवेदनाओं को बनाए रखने की बात कही जाएगी? संवेदनाओं का दृष्टिगोचर पक्ष कौन कौन से होंगे?

                सर्वोपरि अगर संवेदनाओं को आधार मानकर राष्ट्र रचना की कल्पना हम कर लें तो मजदूरों को बेघर होकर रास्ते पर निकालने की नौबत ही नहीं आती | दूसरे चरण में अगर मजदूर अपने कर्मस्थल से निकलकर अगर घर की ओर चल भी पड़े होंगे तो उन्हें रास्ते पर ही उचित सहयोग मिल जाता | संवेदना की कमी और संवेदनाओं का नहीं होने का ही नतीजा दिहाड़ी मजदूरों के रूप में हमारे सम्मुख सन्दर्भित होने लगा |


-------------- चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता