ईश्वर अनुकम्पा

 


गीता के बारे में शास्त्री, महात्मा, आचार्य, गुरु और तत्व-वेत्ता मनीषी समय समय पर भिन्न मत पोषण करते आए; उन मतों और विचारों का सम्मेलन हमें गीता में दर्ज तत्वों को और अधिक सुगमता से समझने में मदद रूप होगा; सहायक और सम्पोषक  भी होता रहेगा | इसमें शायद ही किसी को संदेह हो कि गीता कर्मयोग-शास्त्र है, पर उन कर्मों का जो ज्ञान में अर्थात् आध्यात्मिक सिद्धि में और शांति में परिसमाप्त होते हैं, उन कर्मों का जो भक्ति प्रेरित हैं, अर्थात् यह वह ज्ञान युक्त सचेतन शरणागति है जिसमें भक्त कर्मी अपने-आप को पहले भगवान् के हाथों में सौंप दता है और फिर भगवान् की सत्ता के सान्निध्य को काफ़ी करीबी से महसूस भी करता रहता है, यह उन कर्मों का शास्त्र नहीं है जिन्हें आजकल कर्म नाम से भौतिक और विधायक कर्म के विषय और नित्य क्रिया से समझा जाना शुरू हुआ है, उन कर्मों का बिल्कुल नहीं जो अहंकार से ग्रसित मन के द्वारा किसी के कल्यणार्थ किए जाते हों, जिसमें कर्तापन का भान हो गया हो; जो वैयक्तिक, सामाजिक और भूतदया के विचारों, सिद्धांतों और महानता के भान से ग्रसित हुए हों। यह भी सत्यापित करना कुछ ग़लत ही होगा जिसके आधार पर हम यह मानने लगें कि गीता ने आधुनिक नित्य कर्म के सिद्धांतों और क्रियाशीलता के विचारों को आत्मसात किया हो; उन कर्मों को अहम माना हो और नित्य क्रिया से साधक को जुड़े रहने की वकालत किया हो |  दावा यह भी करता आ रहा होगा कि गीता सभी साधकों को नित्य जीवन से अलग कर देगी, सन्यासी, वैरागी, त्यागी और महात्मा बना देगी; व्यक्ति जीवन के नित्य क्रिया से अलग कर देगी यह भी संपूर्ण ग़लत है | यह स्पष्ट शब्दों में कर्म के मानव सिद्धांत का, अर्थात् सामाजिक कर्तव्यों को निःस्वार्थ भाव से करने के आदर्श का, इतना ही नहीं, बल्कि समाज सेवा के सर्वथा आधुनिक आदर्श का भी प्रतिपादन करती है।

क्या गीता आधुनिक समाज में मुल्यबोध संप्रेषित करने के निमित्त से सफल प्रयास के रूप में एक स्वीकार्य पहल बनी रहेगी? क्या इसे विस्तृत समुदाय के अरमानों और ब्रह्म जिज्ञासा प्रशमित करने के लिए एक सफल प्रयास के रूप में अपनाया जा सकेगा? इन सब बातों का उत्तर तलाशे जाने के क्रम में इतना ही कहा जा सकता कि गीता में, स्पष्ट रूप से कुछ सामेकित समाज विज्ञान के नियमन और सामाजीकरण के अनुरूप, और केवल तत्व चिंतन के साथ मिश्रित ब्रह्म जिज्ञासा  का ऊपरी अर्थ ग्रहण करते हुए भी, इस तरह की कोई बात मान्य नहीं की जा सकती, यह केवल विज्ञान मानस्क और सामाजिक उलटफेर के कराल ग्रास में ग्रसित विचारकों के प्रयातनों से उपजे भ्रम का नतीजा मानें, जिसके अड़हार पर कुछ न कुछ समझ लेने की जल्दबाजी पनपती रहेगी; चित्त , बुद्धि और मन का उतावलापन भी परिलक्षित होगा; एक प्राचीन ग्रंथ को अर्वाचीन बुद्धि से समझने का प्रतिफल भी मान सकेंगे जिसके आधार भी कुछ भी व्याकयाँ किसी भी क्रम में चल पड़ती है, सर्वथा पुरातन, प्राच्य और भारतीय शिक्षा को पश्चिम के भोगवाद की संस्कृति के आलोक में समझने की व्यर्थ चेष्टा ही मानें जो व्यक्ति मानस को भटका देगी । गीता जिस कर्म का प्रतिपादन करती है वह मानव-कर्म नहीं बल्कि दिव्य कर्म है, सामाजिक कर्तव्यों का पालन नहीं बल्कि कर्तव्य और आचरण के अन्य सब पैमानों को त्यागकर अपने स्वभाव के द्वारा कर्म करने वाले भागवत-अधिकृत महापुरुषों का कर्म है जो नाहंकृत भाव से संसार के लिये नहीं उन सर्वशक्तिमान के प्रति नैवेद्य के रूप में सम्पूर्ण श्रद्धा भाव और सार्विक आत्म निवेदन के साथ यज्ञ रूप से किया जाता हो ; सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय विधायक कर्म के रूप में किया जाता हो; सभी स्वार्थ सिद्धि के आग्रह को दर किनार करते हुए सामाजिक संवेदनशीलता कू पुष्ट करने के निमित्त से किया जाता हो ; जो मनुष्य और प्रकृति के अंतर परिवर्थन्शीलता की कड़ी में सार्विक रूप से सदा मौजूद रहेगा। अन्य बिंदुओं के आधार पर अगर गीता के शिक्षाप्रद पहलुओं के आधार पर विचार करें तो पाएँगे, गीता नीतिशास्त्र या आचारशास्त्र, या फिर तर्क शास्त्र व उग्र जातीयातावाद, का ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि अपने आध्यात्मिक जीवन को समृद्ध कर पाने लायक शिक्षण बिंदुओं से पुष्ट विचारों, सिद्धांतों और नीतियों का संकलन ही मानें। आधुनिकों की बुद्धि वर्तमान समय में पश्चिमी भोगवाद से ग्रसित उग्र जातीयातावाद से आच्छादित या फिर तीव्र पाखंडवाद से पल्लवित  भोगवाद और इंद्रिय उत्पीड़न को उत्सर्जित करानेलायक प्रपंचक क्रियाओं का संवर्धक संकुचित बुद्धि है जो अपने मूल सूत्र-स्वरूप यूनानी-रोमन संस्कृति की परमोच्च अवस्था के दार्शनिक आदर्शवाद का ही नहीं, बल्कि मध्यकालीन युग में पनपनेवाले ईसाई और इस्लामी भक्तिवाद का भी परित्याग करते करते अंततः आधुनिक स्वरूप पा चुकी ; प्रपंचकों का आधार बन चुकी; नीति और मानव मूल्यों को झुठलानेवाले समाज का आधार बन चुकी; अपितु गहन वैचारिक अंधत्व का शिकार बन चुकी। दार्शनिक आर्दशवाद और भक्तिवाद के स्थान पर इसने व्यावहारिक आर्दशवाद और समाज सेवा, देशसेवा और मानव सेवा का भाव अपना तो लिया पर उस भाव को संपुष्ट करने के लिए समग्र प्रयत्नशीलता के साथ धर्मार्थ साधना के मार्ग का परित्याग कर डाला। ईश्वर से इसने छुटकारा पाने का प्रयास करते करते उस सर्वशक्तिमान के महज भौतिक स्वरूप तक विचार और चित्त को सन्निविष्ट कर डाला; अथवा यह कहिये कि ईश्वर को केवल क्षणिक अवसर तक ध्यान में लाने के लिए रख छोड़ा; सिर्फ़ सौदे का आधार बनाते हुए पाप-पुण्य के तराजू तक सीमित रख छोड़ा; अर्थ और सामर्थ के मानकों के अनुसार ईश्वर आराधना के विषय को केंद्रित कर डाला; ईश्वर अनुकंपा को प्रकृति जन्य विषयों से अलग करके देखना चाहा; और ईश्वर के स्थान पर देवरूप से मनुष्य को और प्रत्यक्ष पूज्य प्रतिमा रूप में समाज,  संप्रदाय और कृष्टि को प्रतिष्ठित करते हुए भौतिकता का आधार अपना लिया। अपनी सर्वोत्तम अवस्था में यह व्यवहार्य, नैतिक और सामाजिक विधायक अनुक्रिया का आधार स्वरूप होने के साथ साथ कर्मनिष्ठा और कर्तव्य निष्ठा का भी नियामक है;, परोपकार करने की अहमिका, समाज से समाज को जोड़ने की उत्कंठा, विस्तारवाद को सत्यापित करने की अभिलाषा के साथ साथ समग्र जाति को सुखी और समृद्ध करने की प्रबल इच्छा भी रहेगी ।

इस बात से कदापि इनकार नहीं किया जा सकता कि सर्वजन हिताय- सर्वजन सुखाय विधायक कर्म को प्रधानता देना कोई विपरीत धारा का द्योतक होता हो; अगर यही युग धर्म हो गया हो और इसे ही समग्र विकास को सुनिश्चित कर पाने की कुंजी मान लिया गया हो तो उसे गीता के आलोक में मान्य करनेआक नित्य कर्म का हिस्सा बनाना होगा और साधक वर्ग को उस क्रिया को अपनाते हुए अध्यात्मिक उत्कर्ष पाने के ध्येय से साधना के मार्ग पर अडिग भी रहना होगा; और, ऐसा मान लेने का कोई कारण शायद ही सत्यापित हो सके कि जिस मनुष्य ने भागवत स्वरूप को प्राप्त कर लिया हो, जो ब्रह्म स्थिति से पुष्ट चिन्मय अवस्था को पहचानता हो; ईश्वर अनुकंपा से पुष्ट जीव की उपस्थिति को अनुभव कर सकता हो; सनातन परंपरा से संचालित सृष्टि-विनाश के क्रमिक चक्र को समझता हो; चैतन्य अवस्था में, आनंदमय अवस्था मे तथा भागवत सत्ता में रहता हो, उसके कर्म में ये सब बातें हों, जबकि इसे ही सर्वसमावेशक युग धर्म मान लिया गया हो;, ये ही काल-विशेष की सबसे उत्कृष्ट ध्येय वस्तुएं हों, और उस समय इनसे बड़ी और कोई चीज हो, महत् आमूल परिवर्तन को अपनानेलायक कोई विधायक परिवर्तन हुआ हो; किसी समाज को जोड़े जाने की बात प्राथमिकता से अपनाया गया हो; तो ये सब बातें साधक  के विधायक और साध्य कर्म अवश्य ही बनी रहेंगी। कारण, जैसा कि भगवान् अपने शिष्य से कहते हैं, वह श्रेष्ठ पुरुष है और उसे ऐसा आचरण करके दिखाना है जो दूसरों के लिये प्रमाण-स्वरूप हो, और सचमुच  जंग में उतरे और मैदान में दोनों सेनाओं के बीचों बीच खड़े भ्रम, शंका, प्रमाद आदि से ग्रसित एक योद्धा से जो बात कही जा रही है वह यही है कि वह अपने समय के सर्वोत्कृष्ट आदर्श और तत्कालीन संस्कृति के अनुसार क्षात्र धर्म के अनुसार कर्तव्य कर्म को अपना ले , आचरण करे, पर ज्ञान युक्त होकर करे, उस वस्तु को जानकर करे जो इन सब के पीछे प्रत्यक्ष या परीक्ष रूप से निहित है; एक विशिष्ट ज्ञान और भक्ति की धारा में स्नात प्रबुद्ध साधक की भाँति; कि  सामान्य मनुष्यों की तरह जो केवल बाह्य धर्म और विधि का ही अनुसरण करते रह जाते हैं और जीवन के अपने ध्येय को समझ ही नहीं पाते।

परंतु विचारणीय बात यह है कि आधुनिकता से ग्रस्त व्यक्तिमानस ने, तथा उस परिखा में विचरण करनेवाले तत्वदर्शियों ने,  अपनी व्यावहारिक प्रेरक शक्ति में से जिन दो तत्वों को अर्थात्ईश्वर या सनातन ब्रह्म” को औरआध्यात्मिकता या के दिव्य स्वरूप के उत्सर्जन के वैधानिक अनुक्रिया” को अपसारित कर दिया है; ऐसा करने का प्रयास भर किया हो; या फिर विषयों को विकृत कर प्रस्तुत करने का प्रयास भर किया हो; सम्यक दृष्टि को धूमिल कर पाने की लालसा लिए शास्त्र में खुद के अरमानों और अभिलाषा को चढ़ाया हो; या फिर उस विधायक तत्व, आत्म तत्व और योग तिवेणी के मंगल कलश को कलुषित करने का प्रयास किया हो; वे दोनों ही तत्व गीता में दर्ज आधारभूत तत्व के रूप में मान्य की गई | उसी मान्यता के परिपन्थि सनातन परंपरा भी चल पड़ी। जिसे हम अभी आधुनिकता या भोगवाद मान रहे हैं उसमें और सनातन परंपरा में कई द्वन्द परिलक्षित होते हैं: यह कहती है मानवता, मानविकता में रहें, क्षार पुरुष में सीमित रहें; प्राण,  और बुद्धि का सम्मेलन करें; सदा परिवर्थन्शील काल प्रवाह के साथ चलें | जबकि गीता का मत है कि देवत्व प्राप्ति की अभिलाषा लिए क्षार  अक्षर के अस्तित्व का ज्ञान रखते हुए आत्मा, परमात्मा और जीवात्मा के अस्तित्व को मानते हुए सनातन परंपरा पर आस्था बनाए रखें न कि परिवर्तन की धारा में बहे चलें |

व्यवहार में हमारे अंदर कुछ संकीर्णता और कुटिलता अगर रह भी गये होंगे तो उन सबको हटाते हुए और गीता के आत्म तत्व के सिद्धांतों को प्रतिस्थापित करते हुए भक्त वत्सल से कुछ उच स्तर के कार्य करा लिए जाएँ, या उन्हें ऐसा कर पाने के मार्ग में सहायक बनें; उत्साह और उद्दीपन के तरंग के आधार पर यह भी मान्य करें कि व्यक्ति मात्र के चैतन्य में उच्च आदर्श का उद्दीपक और सकारात्मक पक्ष है; भले ही भक्त वत्सल किसी भी देवता, किसी भी अवतार , या फिर किसी भी धर्मादर्श का अनुसरण करते हों | इसी आलोक में यह भी प्रतिपाद्य विषय मान लेना होगा कि गीता सेर्फ निस्वार्थ भाव से कर्म करते रहने की शिक्षा दिलाने लायक विधायक कर्म तत्व का विज्ञान नहीं ; अपितु यह विधायक कर्म के साथ साथ परमार्थ के लिए कर्तव्य पथ पर बिना रुके बिना थके और निडर होकर लगे रहने का उत्तम विज्ञान है|

गीता के समग्र संकलन में से कुछ श्लोक चुनकर यह साबित कर देना बहुत ही आसान है कि इसमें निस्वार्थ भाव से सेवा करते रहने को श्रेष्ठ माना गया; कहीं शुद्ध भक्ति की वंदना दर्ज की गई; कहीं पर ज्ञान से पुष्ट कर्म की बात कही गई; यह भी प्रतिपाद्य की गई कि क्षार पुरुष के साथ अक्षर पुरुष भी एक ही ब्रह्म के प्रतिफलक, उद्योजक और क्रियात्मक स्वरूप होंगे (अद्वैत का सिद्धांत) जिसे गीता का केंद्रक भी माना जा सकेगा | यह भी प्रतिपादित टा आया कि गीतापुरुषोत्तम को सभी प्रकार से पूर्ण मानते हुए यह प्रतिस्थापना रखती है कि साधक का ध्येय उस पूर्णता की प्राप्ति का ही रहे और उसी मार्ग के लिए परिपूरक सिद्धांतों और विचारों का संकालन गीता का आधार स्वरूप है | 

गीता का प्रायोजन तभी सन्दर्भित होता हुआ पाया गया जब कर्तव्य बुद्धि से भटका हुआ एक योद्धा ईश्वर शरणागती लेते हुए यह सुनिश्चित करना चाहा की रण भूमि के बीचों बीच एक योद्धा की क्या भूमिका हो सकती: और वो भी तब जब यह पता चले कि उसी के रिश्तेदार, सगे संबंधी, गुरु और पितामह शत्रुपक्ष में खड़े हो जाएँ; वो भी तब जब धर्म, नीति, तत्व और कर्तव्य नामक विधाओं पर इंद्रिय उत्पीड़ण, अज्ञान और भ्रम का आच्छादन बन जाए! यह एक ऐसी परिस्थिति के आलोक में ईश्वर द्वारा प्रतिपादित की गई जब धर्म रक्षा को सुनिश्चित करने के निमित्त से एक योद्धा जंग की भूमि में उतर चुका था और वैराग्य, त्याग, सन्यास आदि की बातें करने लग गया था |

व्यक्ति जीवन में कभी न कभी किसी न किसी रूप में संघर्ष सदा ही चलते रहता है | कई ऐसे पड़ाव भी आते हैं जब व्यवहार ज्ञान, तत्व ज्ञान और कर्तव्य बुद्धि का सही सम्मेलन ही नहीं हो पाता; न ही भ्रम के भंवर से व्यक्ति सही तरीके से निकल पाता; न ही यह तय कर पाता कि ईश्वर शरणागति लें भी तो कैसे; अंतर मन और चित्त को बसेरा किए दिव्य पुरुष का सान्निध्य महसूस कर पाने लायक स्थिति बनते बनते बिगड़ जया करती; कभी कभी व्यक्ति इंद्रिय उत्पीड़न का शिकार हो जाता और चेतना का उन्नत तरंग अनुभव ही नहीं कर पाता; ऐसा होते होते कभी कभी जीवन की अनुक्रिया ही मंगल प्रभात की ओर बढ़ी जाती जहाँ से अगला सफ़र कैसा होगा इस बारे में किसी को भी सम्यक ज्ञान नहीं हो आता | यह वही पड़ाव है जहाँ साधक एक सामान्य जीवन चर्या से उभरते हुए दिव्य जीवन की ओर चल पड़ते हैं और अपने सभी इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करते हुए उस दिव्य सनातन शक्ति को खुद के करीब पाते रहेंगे और क्रमिक उन्नति की ओर बढ़े चलेंगे | द्विविधा और भ्रम की स्थिति से उभर पाने के निमित्त से कोई भी व्यक्ति एक योद्धा रूप से खुद की भूमिका काफ़ी सरलता पूर्वक ही तय कर सकेगा यही अभिप्रेत हो | इसी ध्येय से पुष्ट गीता में समय समय पर और स्थान स्थान पर योग विद्याओं का सम्मेलन प्रतिभासित होता आया |

गीता कर्म को अकर्म से श्रेष्ठ मानते हुए भी कर्म सन्यास को अहम मानती; अपितु कर्म को ईश्वर अनुकंपा पाने के मार्ग में लगाने ने लायक एक साधन स्वरूप मानती ती; यहाँ तक कि भक्त वत्सल को उस विधा में लगे रहने और सातत्य बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करती; एक योद्धा को उसके ज्ञान के मुताबिक और कर्तव्य पालन कर पाने के अनुकूल शिक्षा मिलती रही; वह भी तब जब सर्व शक्तिमान स्वयं ही मित्र भाव से उसके करीब आकर एक सारथि के रूप में भूमिका अदा करते रहे और एक योद्धा को उसके शक्ति, कौशल, आत्मबल के साथ साथ कर्तव्य और धर्म रक्षा के संकल्प की याद दिलाते रहे; उसे ध्येय मार्ग पर बने रहने के लिए प्रेरित करते रहे; समग्रता का भान से खुद भी पूरी प्रक्रिया में भाग न लेते हुए भी प्रक्रिया को काफ़ी हद तक प्रभावित करते रहे |

उस परिस्थिति में अवतार योद्धा बनकर नहीं बल्कि युद्ध को अंजाम तक पहुँचाने के निमित्त से एक सारथि बनकर मैदान में उतरे; समग्र परिस्थिति में हथियार उठाकर, संहार वृत्ति का अभ्यास करते हुए धर्म विजय को सुनिश्चित करने के मार्ग में एक योद्धा और उनके वर्गों का समुचित प्रबोधन करते रहे; उन सबके करीब उस सर्व शक्तिमान के सान्निध्य का भी आभास दिलाते रहे; यह भी सुनिश्चित करते रहे कि धर्म विजय सुनिश्चित करने के निमित्त से मैदान में उतर्नेवाले किसी भी योद्धा का आत्मबल धूमिल होने पाए; ही उन्हेंईश्वर अनुकंपा किसी अन्य अनुकंपा के मुखापेक्षी रहना पड़े | मधुसूदन यह भी प्रतिपादित करने लगे कि उसी ईश्वर अनुराग का अंश प्रत्येक जीव में विराजमान समझी जाय; उसी के मुताविक आत्मा के अविनश्वरता का सिद्धांत भी समझी जाए और तदनुरूप अपनी भूमिका बनाकर रणभूमि में शत्रु का डटकर मुकाबला की जाए; कि पीठ दिखाकर भागने का प्रयास हो | भक्त वत्सल जिज्ञासु प्रवृत्ति का होने के साथ साथ आनुगत्य भी प्रकट कर दिया करेगा और यह भी समझाना चाहेगा कि उसके मन में पनपनेवाले शंकाओं और द्विविधाओं को जड़ मूल से समाप्त की जाय; उत्साह, उद्दीपन, अग्रगामी की वृत्ति के साथ साथ चित्त, मन और बुद्धि की स्थिरता भी बनी रहे | योद्धा का यह भी तर्क था कि भले ही हम न्याय, नीति और धर्म का पक्ष लेकर संघर्ष की वृत्ति अपनाते हों पर न्याय को सुनिश्चित करने और धर्म प्रतिष्ठा के साथ साथ अधर्म मिटाने के लिए निर्दयता के साथ रक्तपात की जाए, हत्याएँ की जाए यह कहाँ तक समीचीन हो सकता! ऐसा शायद ही उचित हो कि इतने रक्तपात के बाद एक सुंदर और विकास मुखी शासन प्रणाली की नींव रखी का सके; शंका यह भी बनी रही कि अत्यधिक रक्तपात के बाद शायद वर्णसंकार पनपने का भी मार्ग खुल जाए और जनजाति के गुणवत्ता कलुषित हो जाने की आशंका बनी रहे | गीता में भी ममता, करुणा, प्रेम और भाईचारे के साथ साथ अहिंसा और शांति की शिक्षा अवश्य रहेगी पर वैसी शिक्षा उन महान आत्माओं के लिए माना जा सकेगा जो व्यक्ति जीवन की संकिर्णता और स्वार्थ सिद्धि के संकुचित नियमन से ऊपर उठकर शाश्वत मार्ग पर चलते हुए श्रेयार्थ मार्ग पर बने रहें और मोक्ष प्राप्ति की ओर बढ़ता चले| सामान्य जीवन को चरितार्थ करने के निमित्त से कर्तव्य कर्म को स्वीकार करते समय एक सैनिक को यह भी लग सकता कि सभी हत्याओं के लिए उसे पाप लगेगा और नरक भोगने पड़ेंगे; पर पा-पुण्य के ज्ञान से उभरकर धर्म रक्षणा र्थ सेवा करते रहने की तमन्ना लिए युद्ध भूमि पर उतरने वाला कोई योद्धा अवश्य ही दिव्य ज्ञान का धनी और ईश्वर अनुकंपा का धारक होगा; कि संकीर्णता और स्वार्थ सिद्धि के आवेश में कर्तव्य कर्म से विमुखता रखनेवाला कोई सामान्य सिपाही | कर्तव्य वह भावना है जो व्यवहार में सामाजिक धारणाओं पर निर्भर है, इस सामान्य अर्थ से हम इस शब्द को और अधिक व्यापक करके यह कह सकते हैं कि अमुक कर्म हमारा अपने प्रति कर्तव्य है अथवा इस व्याप्ति से भी आगे बढ़कर यह कह सकते हैं कि सर्वस्व का त्याग करना बुद्ध का कर्तव्य था या यह भी कह सकते हैं कि गुहा में स्थिर होकर बैठना यती का कर्तव्य है; सीता माता के बारे में पता लगाकर वापस आना और उसी संदेश से मर्यादा पुरुषोत्तम को अवगत कराना महाबली बजरंगी का कर्तव्य था ; अपने गुरु की महिमा का गायन करते हुए उपायाचक और परिव्राजक की भूमिका में उतारकर संसार का चक्कर लगाना एक वीर सन्यासी का कर्तव्य था; कर्तव्य परायणता के आधार पर ही माता खुद खाकर अपने संतान के सामने भोजन परोसा करती होगी; एक गाय अपने बछड़े को दूध पिलाती होगी; एक किसान अपने फसल की सिंचाई करता होगा; एक दाता भिक्षु को दान देता होगा; एक पुजारी मंदिर में विग्रहों को सजाता होगा और पूजा अर्चना करता होगा |

गीता का निर्माण बुद्ध, ईसा या मुहम्मद जैसे किसी महापुरुष के आध्यात्मिक जीवन के फलस्वरूप नहीं हुआ; यह वेदों और उपनिषदों के समान किसी विशुद्ध आध्यात्मिक अनुसंधान के सम्मिलित प्रयत्न का सीधा प्रतिफल के रूप में माना जा सकेगा; न ही अपने आप में स्वतंत्र रूप से कोई धर्म ग्रंथ या उपाखयान माला या फिर विधायिका के रूप में स्वीकार्य हो सकेगा; बल्कि, यह जगत के राष्ट्र और उनके संग्रामों तथा मनुष्यों और उनके पराक्रमों के ऐतिहासिक महाकाव्य के अंदर एक उपाख्यान के रूपप में सन्निविष्ट किया हुआ कतोपकथन है जिसे इसके एक प्रमुख पात्र, धर्मार्थ सेवा में लगे एक योद्धा के जीवन में पनपने वाले शंका, द्विविधा, भ्रम, दर, प्रमाद, कपुरुषता नकारात्मक तत्वों को प्रशमित करते हुए साहस, कर्तव्य बुद्धि, दिव्य ज्ञान, भक्ति की धारा और हिंसा विवेक विषयक सम्यक ज्ञान विषयक प्रबोधन करने के लिए रचा गया |  ऐसा भी हो सकता है कि गीता में अन्य कई मनीषी और महात्माओं के द्वारा संप्रेषित तत्व विवेचना का संकलन दर्ज हुआ हो; यह शायद महाभारत के भीष्म पर्व का अंश ही रहा हो; या फिर इसे बाद में महर्षि वेदव्यास के द्वारा अलग से संकलित किया गया हो; ऐसे कई तर्क उपस्तापित किए जा सकेंगे | यह आख़िर तर्क का ही विषय माना जाएगा; इस तर्क की कोई प्रतिष्ठा भी शायद ही हो सके | कुछ भी हो इतना तो तय ही मानें कि गीता में दर्ज सांख्य, योग और वेदांत की त्रिवेणी भक्ति, ज्ञान और कर्म की धारा से भक्त वत्सल को पुष्ट करने का कठिन कार्य बड़ी ही सरालता से कर लेगी और व्यक्ति मानस का कुशल प्रबोधन भी कर सकेगी |

यह वही चैतन्य स्वारू को अभिव्यक्त करने का एक सफल प्रयास है जिसके ज़रिए मानावरूपी जगदीश्वर अपने भक्त को कर्तव्य कर्म कर पाने के लायक बनाते हुए उसे आत्मज्ञान से पुष्ट और बुद्धि-विवेक से वलिष्ठ बनाने का सफल प्रयास कर रहे हैं | कर्तव्य आपेक्षिक शब्द है और सन्दर्भ के मुताबिक बदलते रहता होगा; एक चिकित्सक का कर्तव्य है मरीजों को रोगमुक्त करना; एक किसान का कर्तव्य है फसल का पोषण करना और उसकी रक्षा करना; ऐसे अनगिनत पाहलू होंगे जहाँ व्यक्ति को कर्तव्य कर्म के आधार पर खरा उतरता देखा जा सकेगा; सिर्फ़ इतना ही नहीं उसे उन कर्तव्य कर्म संपादित करते हुए खुद की समृद्धि और वैचारिक परिपक्वता का भी ध्यान रखना होगा ताकि अनावश्यक ग़लतियों से खुद को बचाता जा सके | कर्तव्य पथ पर बने रहने के लिए व्यक्ति को निरपेक्ष धार्मिक और नैतिक विधान का उल्लंघन करना पड़ता है; यदि जज को यह विश्वास हो जाये कि किसी मनुष्य को फांसी की सजा देना मानवता की दृष्टि में पाप करना है, समर भूमि में सिपाही का ही चित्त यदि आधुनिक युद्ध-विरोधियों का-सा हो जाये या टालस्टाय के समान उसके चित्त में यह जाये कि किसी भी मनुष्य की जान किसी भी हालत में लेना वैसा ही घृणित काम है जैसा कि मनुष्य का मांस भक्षण करना; अगर माँस विक्रेता को यह लगने लगे कि जीव हत्या का पाप व क्यों करे, क्यों न माँस खानेवाले से ही यह पाप करवाया जाए; यदि वकील की आंख खुल जाये और वह देखने लगे कि झूठ सदा पाप ही है; ऐसे और भी कई परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती है जहाँ लगाने  लगता है कि पाप किए बिना प्राणी का जीवित रहना ही शायद असंभव है |

कर्तव्य पथ पर अडिग रहनेवाले व्यक्ति का यह धर्म कर्तव्य-विषयक सामाजिक संबंध या भावना पर निर्भर नहीं, बल्कि मनुष्य की, नैतिक मनुष्य की जागी हुई अंतःप्रतीत पर निर्भर है। अंतर मान से जागृत होनेवाले संवेदनाओं और इंद्रिय जन्य स्पंदनों से उपजे प्रमाद का ही नतीजा है कि कर्तव्य कर्म को समझे बिना व्यक्ति खुद को पापी, पाप का भागी और प्रपंचक समझने लग जाता है | आचार धर्म बाह्य अवस्था पर निर्भर हो सकती या फिर अंतर मन में पनपनेवाले बुद्धि विवेक द्वारा संचालित हो सकती; इन दोनों ही स्थिति में गीता कभी इस बात की वकालत नहीं करती कि अंतर मन की चेतना को मारकर बाहरी पद मर्यादा के अधीन व्यक्ति को क़ैद कर दो; सतह स्फूर्त कर्तव्य - बुद्धि को कुचल डालो; या फिर जागृत विवेक को झुठलाते रहो; बल्कि गीता चित्त, मन और बुद्धि के बीच संतुलन बनाते हुए अहम के सात्विक पक्ष का संवर्धन और तामसिक पक्ष का दमन करने का कार्य करती रहेगी |

अर्जुन और श्रीकृष्ण के अर्थात् मानव-आत्मा और भागवत आत्मा के सख्य का रूपक अन्य भारतीय ग्रंथों में भी आता है, जैसे एक स्थान में यह वर्णन है कि इन्द्र और कुत्स एक ही रथ पर बैठे हुए स्वर्ग की ओर यात्रा कर रहे हैं, जैसे उपनिषदों में दो पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हुए मिलते हैं, अथवा जैसे यह वर्णन आता है कि नर-नारायण ऋषि ज्ञानार्थ एक तपस्या कर रहे हैं; सर्वोपरि वह सम्यक ज्ञान ही लक्ष्य है जिसे पाने के लिए आत्मा--परमात्मा का सम्मेलन और परिसंवाद चल पड़ा; गीता में पिंड स्थ होता गया; तत्व चिंतकों और भाष्यकारों के कुशल प्रयत्न से निखरता गया, सँवारता गया, परिमार्जित होता गया |

योद्धा और जगदीश्वर दोनों ही रणभेरियों के तुमुल निनाद से आकुल समर-भूमि में शस्त्रों की खनखनाहट के बीच युद्ध के रथ पर रथी और सारथी के रूप में विद्यमान हैं; उपदेष्टा गुरु केवल मनुष्य के वे अंर्तयामी ईश्वर ही नहीं हैं जो केवल ज्ञान के वक्ता के रूप में ही प्रकट होते हों, बल्कि मनुष्य के वे अंर्तयामी ईश्वर हैं जो सारे कर्म-जगत् के संचालक, प्रजापालक और नियंता हैं; कर्मों और यज्ञों के छिपे हुए स्वामी हैं और सेवकों के हृदय सम्राट हैं; सख्य परमपारा को प्रकट करनेवाले युगल मूर्ति हैं; धर्मयुद्ध के रूपक और नियामक भी |

परोपकारवाद का सिद्धांत

धर्मयुद्ध का शंखनाद होनेमात्र से गीतोपदेश का आरंभ परिलक्षित होता रहा; समर सज्जा का परिचय देने के बाद और पूरी परिस्थिति का जायज़ा लेने के बाद अर्जुन के सामने दो ही विकल शेष थे: या तो संहार वृत्ति के साथ युद्ध करने के लिए आगे बढ़े, या फिर हथियार डालकर युद्ध भूमि से बाहर निकले और जीवन से सन्यास लेकर अरण्य गमन करे | दोनों ही परिस्थितियाँ अर्जुन को भ्रम में डालने के लिए प्रायापत थी |

इसमें एक योद्धा को प्रत्यक्ष या परीक्ष रूवप से कुछ हासिल होता भी होगा या नहीं यह तर्क का विषय है, पर इतना टू तय है कि वीर पराक्रमी योद्धा का पक्ष लेनेवाले सभी जनों के उपकृत होने की संभावना बन चुकी थी | अगर योद्धा हथियार डाल दे तो धर्म का आश्रय लेनेवालों का रक्षण शायद ही हो सके; धर्मार्थ सेवा में लगे लोगों के ऊपर संकट के बादल मंडराते रहेंगे; अपितु उनके विनष्ट हो जाने का भी डर बना रहेगा | अतः योद्धा का यही धर्म शेष रह जाता है कि धर्म युद्ध के मैदान में उतार जाने के बाद युद्ध करे; जय-- पराजय की चिंता से मुक्त होकर ऐसा करे; धर्म विजय और धर्म के आश्रय लेनेवालों का विजय सुनिश्चित करे |

गीता में वर्णित समर योद्धा संघर्ष में पड़ी हुई उस मानव-आत्मा का नमूना है जिसे अभी तक ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, पर जो मानव-जाति में विद्यमान उन श्रेष्ठतर तथा भागवत आत्मा के उत्तरोत्तर अधिकाधिक समीप रहने तथा उनके अंतरंग सखा होने के कारण इस ज्ञान को कर्म-जगत् में प्राप्त करने का ; उसी के आधार पर कर्तव्य पथ पर चलाने का और निष्ठावान कर्मयोगी के नाते ज्ञान के ज़रिए विधायक कर्म करते रहने की दीक्षा लेने का अधिकारी हो गया |

मानव चेतना में देवत्व का अवतरण, जिसे आधार मानकर धर्म रक्षा के लिए प्रायोजनीय संघर्ष की मान्यता चल पड़ी; जिसे सत्यापित करने के लिए कई व्याख्यान और उपाखयान चल पड़े; जिसे समझते हुए सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र के सम्मेलन को मोक्ष का मार्ग समझा गया; जिस आधारभूत सिद्धांत और आरंपप्रा को कभी भी भारतीय दर्शन में झुठलाने का प्रयास तक नहीं हुआ; जिसे पाखंड वाद को जदमूल से समाप्त करने और धर्म प्रतिष्ठा सुनिश्चित करने के लिए अहम कुंजी समझा गया - उन सभी को समुचित महत्व के साथ गीता ज्ञान मे समाविष्ट होनेवाले तत्व के रूप में हम भली भाँति देख सकेंगे, महसूस कर सकेंगे और आत्मसात करने का भी उतना ही प्रयास करेंगे | किसी अन्य संस्कृति में अवतार वाद और धर्मादर्श को भले ही सनातन परमरा से कुछ अलग विषय समझा जाता हो पर सनातन धारा के सर्व समावेशक संगम के सामने उनका टिके रहना कदापि शायद ही संभव हो सके; शायद ही तर्क में से कोई सांकरा मार्ग निकालकर सनातन धारा को अवैज्ञानिक करार दिया जा सके |

तो ऐसे हैं गीता के भगवद्-गुरु, सनातन अवतार, स्वयं श्री भगवान् जो मानव-चैतन्य में अवतीर्ण हुए हैं, ये वे महाप्रभु हैं जो प्राणिमात्र के हृदय में अवतीर्ण हुए हैं, ये वे हैं जो परदे की आड़ में रहकर हमारे समस्त चिंतन, कर्म और हृदय की खोज का भी उसी प्रकार संचालन करते हैं जैसे दृश्यमान और इंन्द्रिग्राह्य रूपों, शक्तियों और प्रवृत्तियों की ओट में रहकर इस जगत् के, जिसको उन्होंने अपनी सत्ता में अभिव्यक्त किया है,-महान् विश्वव्यापी कर्म का संचालन करते हैं। उन्नत होने की हमारी संपूर्ण चेष्टा और खोज शांत, तृप्त और परिपूर्ण हो जाती है यदि हम इस पर्दे को फाड़ सकें, और अपने इस बाह्य स्व के परे अपनी वास्तविक आत्मा को प्राप्त हों, अपनी सत्ता के इन सच्चे स्वामी के अंदर अपनी समग्र सत्ता को अनुभव कर सकें, अपना व्यक्तित्व इन एक वास्तविक पुरुष पर उत्सर्ग करके उनके होकर रहें, अपने मन की सदा छितरी हुई और सदा चक्कर काटने वाली कर्मण्यताओं को उनके पूर्ण प्रकाश में मिला दें, अपने प्रमादशील बेचैन संकल्प चेष्टाओं को उन्हीं के महत्, ज्योतिर्मय और अखंड दिव्य संकल्प की भेंट कर दें, अपनी नानाविध बर्हिमुखी वासनाओं और उमंगों को, उन्हीं के स्वतःसिद्ध, आनंद की परिपूर्णता में त्यागकर, तृप्त करें।ईश्वर मानव चैतन्य में अवतीर्ण हों या फिर मानव चैतन्य ही ज्ञान , भक्ति और कर्म के आधार पर ईश्वर के चैतन्य का आश्रय स्थान बन सके - इन दोनों पहलुओं को एक दूसरे से अलग करके देखना शायद ही संभव हो सके; शायद ही उन सभी परिस्थितियों को वर्गीकृत करते हुए देवत्व के अधिष्ठान और अधिष्ठाता दिव्य जीवन को वर्गीकृत किया जा सके; वह हमारा मूल विषय भी नहीं है, और न ही हमें उन सूक्ष्म चीज़ों में जकड़े रहना चाहिए | यह तो वही हुआ कि गंगा जी में प्रवाहित धारा से उठाए जल बिंदु और अन्य जलधि से उठाए हुए जलबिन्दु- दोनों ही बादल निर्माण कर लें पर बादल में से इन्हें अलग कर पाने का कोई ठोस आधार है ही नहीं; न ही हम यह सत्यापित कर सकेंगे कि जलधारा पहले या बादल पहले!

यहाँ बाह्य कर्म के अधीन होकर रहने की अस्था दूर हो जाती है और इसके स्थान पर कर्म की गहन गति से मुक्त पुरुष का अपने कर्म को स्वतः निर्धारित करने का सिद्धांत स्थापित हो जाता है। और, जैसा कि हम आगे चलकर देखेंगे, यही ब्राह्मी चेतना, कर्म से पुरुष की मुक्ति और अंतःस्थित तथा ऊर्ध्वस्थित परमेश्वर के द्वारा स्वभाव में कर्मों का निर्धारण-यही कर्म के विषय में गीता की शिक्षा का मर्म है। गीता को समझना, और गीता जैसे किसी भी महान् ग्रंथ को समझना तभी संभव है जब उसका आदि से अंत तक और एक विकासात्मक शास्त्र के हिसाब से अध्ययन किया जाये। परंतु आधुनिक टीकाकरों ने, बंकिमचंद्र चटर्जी जैसे उच्च कोटि के लेखक से आरंभ कर जिन्होंने पहले-पहल गीता को आधुनिक अर्थ में कर्तव्य का प्रतिपादन करने वाला शास्त्र बताया, सभी टीकाकरों ने गीता के पहले तीन-चार अध्यायों पर ही प्रायः सारा जोर दिया है, और उनमें भी समत्व की भावना औरकर्तव्य कर्मपर, औरकर्तव्से इनका अभिप्राय वही है जो आधुनिक दृष्टि में गृहित है; कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ( कर्म में ही तेरा अधिकार है, कर्म फल में जरा भी नहीं )- इसी वचन को ये लोग गीता का महाकाव्य कहकर आप तौर पर उद्धृत करते हैं और बाकी के अध्याय और उनमें भरा हुआ उच्च तत्त्वज्ञान इनकी दृष्टि में गौण है; हां, ग्यारहवें अध्याय के विश्वरूप-दर्शन की मान्यता इनके यहाँ अवश्य है। आधुनिक मन-बुद्धि के लिये यह बिलकुल स्वाभाविक है, क्योंकि तात्विक गूढ़ बातों और अतिदूरवर्ती आध्यात्मिक अनुसंधान की चेष्टाओं से यह बुद्धि घबरायी हुई है या अभी कल तक घबराती रही है और अर्जुन के समान कर्म का ही कोई काम में लाने योग्य विधान, कोई धर्म ढूंढ़ रही है। पर गीता जैसे ग्रंथ के निरूपण का यह गलत रास्ता है।

उसमें कोरे परोपकारवाद की या किसी विशुद्ध विकार-रहित सर्वत्याग के भाव की ध्वनि नहीं है; गीता की समता एक आंतरिक संतुलन और विशालता की स्थिति है, जो आध्यत्मिक मुक्ति की आधारशिला है। इस संतुलन के साथ और इस प्रकार की मुक्ति की अवस्था में हमें उस कर्म का सम्यक् आचरण करने का आदेश मिलता है जोकार्य कर्महै-कार्यं कर्म समाचर, गीता की यह शब्द योजना अत्यंत व्यापक है, इसमें सर्वकर्माणि, सब कर्मों का समावेश है, यद्यपि सामाजिक कर्तव्य या नैतिक कर्तव्य भी इसमें जाते हैं, पर इतने से ही इसकी इति नहीं होती, “कार्य कर्मइन सबका समावेश करता हुआ भी इन सबका अतिक्रम करके बहुत दूर तक विस्तृत होता है।

यही जगदगुरु हैं जिनके सनातन ज्ञान के ही बाकी सब उत्तमोत्तम उपदेश केवल विभिन्न प्रतिबिंब आंशिक शब्द मात्र यही वह ध्वनि है जिसे सुनने के लिये जीव को जागना होगा। अर्जुन जो इन गुरु का शिष्य है और जिसने युद्ध क्षेत्र में दीक्षा ली है- इस धारणा का पूरा भाग है; अर्जुन गीता के प्रतिपादन की एक ऐसी पद्धति भी है जिससे केवल यह उपाख्या ही नहीं, बल्कि संपूर्ण महाभारत के मनुष्य के आंतरिक जीवन का एक रूपक मात्र बन जाता है, और फिर उसमें हमारे इस बाह्य जीवन और कर्म का कोई संबंध नहीं रहता, बल्कि इसका संबंध अंतरात्मा और हमारे अंदर स्वत्व के लिये लड़ने वाली शक्तियों के युद्ध से रह जाता है। इस प्रकार विचार की पुष्टि महाकाव्य के साधारण स्वरूप और इसकी यथार्थ भाषा से तो नहीं होती और यदि इस विचार पर बहुत अधिक जोर दिया जाये, तो गीता की सीधी-सादी दार्शनिक भाषा आदि से अंत तक क्लिष्ट, कुछ-कुछ निरर्थक दुर्बोधता में बदल जायेगी।

वेद की और कम-से-कम पुराणों के कुछ अंश की भाषा स्पष्ट रूप से रूपकात्मक है, ये स्थूल दृश्यमान जगत् की चोट में रहने वाली वस्तुओं के वर्णन से और उनके दिग्दर्शन से भरे पड़े हैं, पर गीता में जो कुछ कहा गया है, साफ-साफ कहा गया है और मनुष्य के जीवन में जो बड़ी-बड़ी नैतिक और आध्यात्मिक कठिनाइयां उपस्थित होती हैं उन्हीं का हल करना इसका हेतु है, इसलिये इसकी स्पष्ट भाषा और सुस्पष्ट विचारों को एक ओर धरकर अपने मन के अनुसार तोड़-मरोड़कर उनका अर्थ लगाना ठीक नहीं। परंतु इस विचार में इतना सत्य तो है ही कि गीता की शिक्षा को जितने सुंदर ढंग से बैठाया गया है वह यदि प्रतीकात्मक भी हो, तो भी उसको एक विशिष्ट प्रकार का नमूना अवश्य ही कहा जा सकता है, और वास्तव में गीता जैसे ग्रंथ की शिक्षा को इसी प्रकार बैठाना ही चाहिये, नहीं तो यह जो कुछ रचना कर रही है उसके साथ इसका कोई संबंध नहीं रह जायेगा। यहाँ एक अर्जुन एक महान् जगद्व्यापी संघर्ष में राष्ट्रों और मनुष्यों के भगवत्-परिचालित कर्म को करने वाला एक प्रतिनिधि-पुरुष है। गीता में यह कर्मनिष्ठ मानव-जीव का नमूना है जो अपने कर्म द्वारा कर्म के उस उत्कृष्ट और अति भीषण संकट के समय इस समस्या के सामने पड़ा है कि मनुष्य के जीवन में और आत्म स्थिति में, यहाँ तक कि पूर्णता संबंधी शुद्ध नैतिक आदर्श में भी आपाततः जो यह असंगति दिखायी देती है वह आखिर क्या है?

अर्जुन इस युद्ध में रथी है और भगवान् श्रीकृष्ण उसके सारथी। वेद में भी एक जगह यह वर्णन आता है कि मानव-आत्मा और देव रथ पर बैठे लड़ाई लड़ते हुए किसी महान् गंतव्य स्थान की ओर जा रहे हैं। पर वहाँ केवल आलंकारिक वर्णन है, रूपक है। देव यहाँ इन्द्र है, जो ज्योतिर्लोक और अमृत के स्वामी हैं, दिव्य ज्ञान की शक्ति हैं और वे असत्य, तमस्, परिमितता और मृत्यु की संतानों के साथ युद्ध करने वाले सत्यान्वेषी मनुष्यों की सहायता के लिये नीचे उतरते हैं; युद्ध आत्मा के शत्रुओं के साथ है जो हमारी सत्ता के उच्च्तर लोक का रास्ता रोके हुए हैं; और गंतव्य स्थान है वह वृहत् लोक के जो परम सत्य के आलोक से आलोकित है और जो सिद्ध आत्मा के चिन्मय अमृत्व का धाम है, जहाँ के स्वामी इन्द्र हैं। मानव-आत्मा कुत्स है, वह अपने कुत्स नाम के अनुरूप सतत साक्षी चैतन्य के ज्ञान का साधक है, वह अर्जुन या अर्जुन का पुत्र है, शुक्ल है, शुक्ल माता श्वित्रा का शशु है, अर्थात् ऐसा सात्त्विक, विशुद्ध और प्रकाशमय अंतःकरण वाला जीव है जो दिव्य ज्ञान की अटूट गरिमा-महिमा की ओर सदा उन्मुख है। और, जब रथ अपने गंतव्य स्थान अर्थात् इन्द्र के अपने लोक में पहुँचता है तब मानव कुत्स उन्न्त होते-होते अपने देव सखा के साथ इतना सादृश्य लाभ करता है कि कौन इन्द्र है और कौन कुत्स, इसकी पहचान इन्द्र की अर्द्धांगिनी शची के कारण ही हो पाती है, क्योंकि शचीऋत-प्रज्ञाहैं।

वहकर्म कार्यक्या है, यह किसी व्यक्ति की अपनी पसंद से निश्चित नहीं होता; और कर्म में अधिकार और कर्मफल का त्याग ही गीता का महाकाव्य है, बल्कि यह एक प्राथमिक उपदेश है जो योग पर्वत पर चढ़ना आरंभ करने वाले शिष्य की प्राथमिकता अवस्था पर लागू होता है। आगे चलकर इससे बड़ा उपदेश प्राप् होता है। क्योंकि बाद में गीता बड़े जोर के साथ बतलाती है कि मनुष् कर्म का कर्ता नहीं है; कर्त्री प्रकृति है, त्रिगुणमयी शक्ति ही उसके द्वारा कर्म करती है और शिष्य को यह साफ-साफ देख लेना सीखना होगा कि कर्म का कर्ता वह नहीं है। इसलिये, कर्मण्येवाधिकारः की भावना तभी तक के लिये है जब तक हम इस भ्रम में हैं कि हम कर्ता हैं; ज्यों ही हमें अपनी चेतना के अंदर यह अनुभव होता है कि हम अपने कर्मों के कर्ता नहीं हैं, त्यों ही कर्मफलाधिकार के समान ही कर्माधिकार भी मन-बुद्धि से तिरोहित हो जाता है। तब कर्म-विषयक सारे अहंकार, फलाधिकार के संबंध में कहिये या कर्माधिकार के संबंध में, समाप्त हो जाते हैं।

परंतु प्रकृति का नियतिवाद भी गीता का अंतिम वचन नहीं हैं। मन, हृदय और बुद्धि के साथ भगवत्-चैतन्य में प्रवेश करने और उसमें रहने के लिये बुद्धि की समता और फल का त्याग, केवल साधन हैं और गीता ने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा है कि इनसे तब तक काम लेना होगा जब तक साधक इस योग्य नहीं हो जाता कि वह इस भगवच्चैतन्य में रह सके कम-से-कम अभ्यास के द्वारा इस उच्चतर अवस्था को अपने में क्रमशः विकसित कर ले। अच्छा तो यह भगवान् कौन है जिनके बारे में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह मैं ही हूं? ये पुरुषोत्तम हैं, जो अकर्ता पुरुष के परे हैं, जो कत्री प्रकृति के परे हैं, जो एक आधार हैं और दूसरे के स्वामी, ये वे प्रभु हैं जिनका यह सारा प्राकट्य है, जो हमारी वर्तमान मायाशवता की अवस्था में भी अपने जीवों के हृदय में विराज रहे हैं और प्रकृति के कर्मों के नियामक हैं, ये वे हैं जिनके द्वारा कुरुक्षेत्र की समरभूमि की सेनाएं जीवित होती हुई भी मारी जा चुकी हैं और जो अर्जुन को इस भीषण संहारकर्म का केवल यंत्र या निमित्त मात्र बनाये हुए हैं। प्रकृति केवल उनकी कार्यकारिणी शक्ति है। साधक को इस प्रकृति-शक्ति और इसके त्रिविध गुणों से ऊपर उठना होगा, उसको त्रिगुणातीत होना होगा। उसे अपने कर्म प्रकृति को नहीं समर्पित करने होंगे, जिन पर अब उसका कुछ भी दावा या अधिकार नहीं है, बल्कि उसे अपने कर्म उन परम पुरुष की सत्ता में समर्पित करने होंगे। अपना मन, अपनी बुद्धि, अपना हृदय, अपना संकल्प उन्हीं में रखकर, आत्म-ज्ञान के साथ, भगवद्-ज्ञान के साथ, जगत्-संबंधी ज्ञान के साथ, पूर्ण समता, अनन्य भक्ति और पूर्ण आत्म दान के साथ उसे अपने कर्म उन प्रभु के भेंट-स्वरूप करने होंगे जो सारे तपों और समस्त यज्ञों के स्वामी हैं।

यह बात भी ज्ञात है कि ईसा के जन्म होने से पहले की शताब्दियों में श्रीकृष्ण और अर्जुन पूजे जाते थे; और यह मान लेने का कुछ कारण है कि यह पूजा किसी ऐसी धार्मिक या दार्शनिक परंपरा के कारण ही होती होगी, जहाँ से गीता ने अपने बहुत-से तत्त्वों को, यहाँ तक कि ज्ञान, कर्म और भक्ति के समन्वय की भित्ति को भी लिया होगा, और शायद यह भी माना जा सकता है के ये मानव श्रीकृष्ण ही संप्रदाय के प्रवर्तक, पुनः संस्थापक या कम-से-कम कोई पूर्वाचार्य रहे होंगे। इसलिये गीता का बाह्य रूप चाहे कुछ भी बदला भी हो तो भी यह भारतीय विचारधारा के रूप में श्रीकृष्ण के ही उपदेश का फल है और इस उपदेश का ऐतिहासिक श्रीकृष्ण के साथ तथा अर्जुन और कुरुक्षेत्र के युद्ध के साथ संबंध केवल कवि की भी कल्पना ही नहीं है। महाभारत में श्रीकृष्ण एक ऐतिहासिक व्यक्ति हैं और अवतार भी; इनकी उपासना और अवतार होने की मान्यता देश में उस समय तक प्रस्थापित हो चुकी थी जब ईसा के पूर्व ( पांचवी और पहली शताब्दी के बीच में ) महाभारत की प्राचीन कहानी और कविता का महाकाव्य-परंपरा ने अपना वर्तमान रूप धारण किया। इस काव्य में अवतार की बाल-वृन्दावन-लीला की कथा या किंवदंती का भी संकेत है जिसे पुराणों ने इतने प्रबल और सतेज आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में वर्णित किया गया है कि उसका भारत के धार्मिक मन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा है।

यह रूपक स्पष् ही मनुष् के आंतरिक जीवन का है ;ज्ञान का प्रकाश जैसै-जैसे बढ़ता वैसे-वैसे मनुष्य सनातन भगवान् का सादृश्य लाभ करता है, यही बात इस रूपक के द्वारा दिखायी गयी है। परंतु गीता का उपक्रम कर्म से होता है और अर्जुन कर्मी है, ज्ञानी नहीं, योद्धा है, ऋषि मुनि या तत्त्व-जिज्ञासु नहीं। गीता मे आरंभ से ही शिष्य की यह विशिष्ट भूमि स्पष्ट करके बतला दी गयी है और अथ से इति तक इसका पूर्ण निर्वाह हुआ है। सबसे पहले उसकी यह विशिष्ट मनोभूमि प्रकट होती है उसके अपने कार्य के संबंध में, अर्थात् जिस महान् संहार-कार्य का वह प्रधान यंत्र बनने जा रहा है उसके संबधं में जिस ढंग से उसे होश आया है उसमें, इस होश के आते ही जो विचार उसके जी में उठते हैं उनमें और जिस दृष्टिकोण और प्रेरक भाव के कारण उसमें उस महाभयानक विपत्ति के पीछे हटने की इच्छा होती है उसमें ये विचार, यह दृष्टिकोण और ये प्रेरक-भाव किसी दार्शनिक या किसी गंभीर विचारशील व्यक्ति के अथवा इस प्रसंग के या ऐसे ही किसी अन्य प्रसंग के सम्मुख खड़े हुए किसी आध्यात्मिक वृत्ति वाले पुरुष के नहीं हो सकते। इनको हम व्यावहारिक या फलवादी मनुष्य में दिमाग की उपज कह सकते हैं, ऐसे मनुष्य की जो भावुक, राग-द्वेषयुक्त, नैतिक और चतुर है, जिसे किसी गंभीर और मौलिक भाव का पकड़ने की गहराई की थाह लेने का अभ्यास नहीं, ऐसे मनुष्य की जो भावुक, राग-द्वेषयुक्त, नैतिक और चतुर है, जिसे किसी गंभीर और मौलिक भाव को पकड़ने अथवा किसी गहराई को थाह लेने का अभ्यास नहीं, उसे ऊंचे पर बंधे-बंधाये विचारों को सोचने और वैसे ही कर्म को करने का तथा संकटों और कठिनाइयों को विश्वासपूर्वक पार करने का अभ्यास है, किंतु अब वह देखता है कि उसके सारे-के-सारे पैमाने उसके काम नहीं रहे तथा उसको अपने ऊपर और अपने जीवन पर जो विश्वास था वह एक ही लहर में बहा रहा है।

उनके संकल्प के साथ अपने संकल्प का तादात्म्य कर लेना होगा, उनकी चेतना से सचेतन होना होगा और उन्हीं को अपने कर्म का निर्णय और आंरभ करने देना होगा। भगवान् गुरु अपने शिष्य की शंकाओं का जो समाधान करते हैं वह यही है। गीता का परम वचन, गीता का महाकाव्य क्या है सो ढूंढ़कर नहीं निकालना है; गीता स्वयं ही अपने अंतिम श्लोकों में उस महान् संगीता का परम स्वर घोषित करती हैः-

 

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्ति स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।

 इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद् गुह्यतरं मया .....

सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।।......

 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि सत्यं प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।

 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

अपने हृद्देशस्थित भगवान् की, सर्वभाव से, शरण ले; उन्हीं के प्रसाद से तू पराशांति और शाश्वत पद को लाभ करेगा। मैंने तुझे गुह्य से ज्ञान बताया है। अब उस गुह्यतम ज्ञान को, उस परम वचन को सुन जो मैं अब बतलाता हूँ। मेरे मन वाला हो जा, मेरा भक्त बन, मेरे लिये यज्ञ कर, और मेरा नमन-पूजन कर; तू निश्चय ही मेरे पास आयेगा, क्योंकि तू मेरा प्रिय है। सब धर्मों का पत्यिाग करके मुझे एक ही शरण ले। मैं तुझे अपने पापों से मुक्त करूंगा; शोक मत कर।गीता का प्रतिपादन अपने-आपको तीन सोपानों में बांट लेता है, जिन पर चढ़कर कर्म मानव-स्तर से ऊपर उठकर दिव्य स्तर मैं पहुँच जाता है और वह उच्चतर धर्म की मुक्तावस्था के लिये नीचे के धर्म बंधनों को नीचे ही छोड़ जाता है। पहले सोपान में मनुष्य कामना का त्याग कर, पूर्ण समता के साथ अपने को कर्ता समझता हुआ यज्ञ-रूप से कर्म करेगा, यज्ञ यह वह उन भगवान् के लिये करेगा जो परम हैं और एकमात्र आत्मा हैं, यद्यपि अभी तक उसने इनको स्वयं अपनी सत्ता में अनुभव नहीं किया है। यह आरंभिक सोपान है। दूसरा सोपान है केवल फलेच्छा का त्याग नहीं, बल्कि कर्ता होने के भाव का भी त्याग और अनुभूति की आत्मा सम, अकर्ता, अक्षर तत्त्व है और सब कर्म विश्व शक्ति के, प्रकृति के हैं जो विषम, कर्त्री और क्षर शक्ति है। अंतिम सोपान है परम आत्मा को वह परम पुरुष जान लेना जो प्रकृति के नियामक हैं, प्रकृतिगत जीव उन्हीं की आंशिक अभिव्यक्ति है, वे ही अपनी पूर्ण परात्पर स्थिति में रहते हुए प्रकृति के द्वारा सारे कर्म कराते हैं।

अर्जुन जिस संकट में से गुजर रहा है वह इस तरह का है। गीता की भाषा में अर्जुन त्रिगुण के अधीन है और त्रिगुण के इसी क्षेत्र मे अब तक निश्चिंत होकर साधारण मनुष्यों की तरह चलता रहा है। उसका नाम अर्जुन इतने ही अर्थ में चरितार्थ होता है कि यहाँ तक शुद्ध और सात्त्विक है कि उसका जीवन ऊंचे और स्पष्ट सिद्धांतों और आवेगों सक परिचालित होता है और वह स्वभावतः अपनी निम्न प्रकृति को उस महत्तम धर्म के अधीन रखता है जिसे वह जानता है। वह उद्दंड आसुरी प्रवृत्ति वाला पुरुष नहीं है, अपने मनोविकारों का दास नहीं है, उसे शांति, संयम तथा कर्तव्य-निष्ठा की शिक्षा मिली है, वह देश-काल मान्य उत्कृष्ट मर्यादाओं का, जिनमें उसका जीवन बीता है, तथा जिस धर्म और सदाचार के अंदर पला है उनका पालन करने वाला है। पर अन्य मनुष्यों के समान उसमें भी अहंकार है, उसका अहंकार शुद्धतर और सात्त्विक अवश्य है जो मुख्यतः अपने ही स्वार्थों, वासनाओं और मनोविकारों के दासत्त्व में धंसा रहकर, धर्म, समाज, और दूसरों के हित का भी विचार रखता है।

प्रेम, भजन, पूजन और कर्मों का यजन सब उन्हीं को अर्पित करना होगा; अपनी सारी सत्ता उन्हीं को समर्पित करनी होगी और अपनी सारी चेतना को ऊपर उठाकर इस भागवत चैतन्य में निवास करना होगा जिसमें मानव-जीव भगवान् की प्रकृति और कर्मों से परे जो दिव्य परात्परता है उसमें भागी हो सके और पूर्ण आध्यात्मिक मुक्ति की अवस्था में रहते हुए कर्म कर सके। प्रथम सोपान है कर्मयोग, भगवत्प्रीति के लिये निष्काम कर्मों का यज्ञ; और यहाँ गीता का जोर कर्म पर है। द्वितीय सोपान है ज्ञानयोग, आत्म -उपलब्धि, आत्मा और जगत् के सत्स्वरूप का ज्ञान; यहाँ उसका ज्ञान पर जोर है, पर साथ-साथ निष्काम कर्म भी चलता रहता है, यहाँ कर्म मार्ग ज्ञान मार्ग के साथ एक हो जाता है पर उसमें घुल-मिलकर अपना अस्तित्व नहीं खोता। तृतीय सोपान है भक्तियोग, परमात्मा की भगवान् के रूप में उपासना और खोज; यहाँ भक्ति पर जोर है, पर ज्ञान भी गौण नहीं है, वह केवल उन्नत हो जाता है, उसमें एक जान जाती है और वह कृतार्थ हो जाता है, और फिर भी कर्मों का यज्ञ जारी रहता है; द्विविध मार्ग यहाँ ज्ञान, कर्म और भक्ति त्रिविध मार्ग हो जाता है। और, यज्ञ का फल, एक मात्र साधक फल जो साधक के सामने ध्येय-रूप से अभी तक रखा हुआ है, प्राप्त हो जाता है, अर्थात् भगवान् के साथ योग और परा भगवती प्रकृति के साथ एकत्व प्राप्त हो जाता है।

हरिवंश ने भी श्रीकृष्ण की लीला का वर्णन किया है, इसमें स्पष्ट ही प्रायः उपाख्यान भरे हैं शायद सब पौराणिक वर्णन हैं ही इन्हीं के आधार पर। इतिहास की दृष्टि से इन सबका काफी महत्त्व है, फिर भी हमारे प्रस्तुत विषय के लिये इनका कुछ भी उपयोग नहीं है। यहाँ केवल भगवान् गुरु के उस रूप से मतलब है जिसको गीता ने हमारे सामने रखा है और मानव-जीवन को आध्यात्मिक प्रकाश देने वाली उस शक्ति से मतलब है जिसको देने के लिये गुरु आये हैं। गीता-मानव रूप में भगवान् के अवतार लेने के सिद्धांत को मानती है; क्योंकि भगवान्ज्ञ गीता में मानव-रूप में बारंबार युग-युग में प्रकट होने की बात कहते हैं[1]यह प्राकट्य तब होता है जबकि ये शाश्वत अजन्मा अपनी माया के द्वारा, अपनी अनंत चित् शक्ति से सांत रूपों का जामा पहन कर संभूति की अवस्थाओं को-जिन्हें हम जन्म कहते हैं-धारण करते हैं। परंतु गीता में भगवाना् के इस रूप पर नहीं, बल्कि परात्पर, विराट् और आंतरिक रूप से जोर दिया गया है, वे जो समस्त वस्तुओं के उद्गम हैं, सबके स्वामी हैं और मनुष्य के हृदय में वास करते हैं। इन्हीं अंतःस्थित भगवान् से वहाँ मतलब है जहाँ जहाँ गीता में उग्र आसुर तप के करने वालों के विषय में यह कहा गया है कि ये, अन्तःशरीरस्थं माम् मुझ भगवान् को कष्ट देते हैं या जहाँ यह कहा गया है कि ये असुर, मानुषीं तनुमाश्रितं माम्, मनुष्य शरीर में रहने वाले मुझसे द्वेष करने पाप करते हैं और वहाँ भी जहाँ यह कहा गया है कि इनके अज्ञान-तम को, प्रज्ज्वलित ज्ञानदीप के द्वारा मैं नष्ट कर देता हूँ।

अब गीता के उपदेशक गुरु के इस विशाल सोपान-क्रम का अनुसरण करते हुए हम आगे बढ़ें और मनुष्य के इस त्रिविध मार्ग का उन्होंने जिस प्रकार अंकन किया है उसका निरीक्षण करें। यह वही मार्ग है जिस पर चलने वाले मनुष्य के मन में, हृदय और बुद्धि उन्नत होकर उन परम को प्राप्त होते और उनकी सत्ता में निवास करते हैं जो समस्त कर्म, भक्ति और ज्ञान के परम ध्येय हैं। परंतु इसके पूर्व फिर एक बार उस परिस्थिति का विचार करना होगा जिसके कारण गीता प्रादुर्भाव हुआ और इस बार इसे इसके अत्यंत व्यापक रूप में अर्थात् इसे मनुष्य जीवन का और समस्त संसार का भी प्रतीक मानकर होगा। यद्यपि अर्जुन केवल अपनी ही परिस्थिति से, अपने ही आंतरिक संघर्ष और कर्म-विधान से मतलब है, तथापि जैसा कि हम लोग देख चुके हैं, जो विशेष प्रश्न अर्जुन ने उठाया है और जिस ढंग से उसे उठाया है उससे वास्तव में मनुष्य जीवन और कर्म का सारा ही सवाल उपस्थित होता है यह संसार क्या है और क्यों है और यह जैसा है उसमें इस सांसारिक जीवन का आत्म जीवन के साथ कैसे मेल बैठे? इस गहरे, कठिन विषय को श्रीगुरु हल करना चाहते हैं, क्योंकि उसी की बुनियाद पर वे उस कर्म का आदेश देते हैं जिसे सत्ता की एक नवीन संतुलन अवस्था से मोक्षप्रद ज्ञान के प्रकाश में भरना होगा।

तब फिर कौन-सी चीज है जो उस मनुष्य के लिये कठिनाई उपस्थित करती है जिसे इस संसार को, जैसा यह है, स्वीकार करना है और इसमें कर्म करना है और साथ ही अपने अंदर सत्ता में, आध्यत्मिक जीवन में निवास करना है। संसार का वह कौन-सा पहलू है जो उसके जागृत मन को व्याकुल कर देता है और उसकी ऐसी अवस्था हो जाती है जिसके कारण गीता के प्रथम अध्याय का नाम सार्थक शब्दों मेंअर्जुन-विषाद योगदपड़ा- वह विषाद और निरुत्साह जो मानव जीवन को तब अनुभूत होता है जब यह संसार जैसा है ठीक वैसा ही, अपने असली रूप में उसके सामने आता है, और उसे उसका सामना करना पड़ता है, जब न्याय-नीति और नेकी के भ्रम का परदा उसकी आंखों के सामने से, और किसी बड़ी चीज के साथ मेल होने से पहले ही, फट जाता है? यह वही पहलू है जिसने बाह्यतः कुरुक्षेत्र के नर-संहार और रक्तपात के रूप में आकार ग्रहण किया है और अध्यात्मतः समस्त वस्तुओं के स्वामी के काल रूप-दर्शन में जो अपने सृष्ट प्राणियों को निगलने, चबा जाने और नष्ट करने के लिये प्रकट हुए हैं। यह दर्शन अखिल विश्व के उन प्रभु का दर्शन है जो विश्व के स्रष्टा हैं, पर साथ ही विश् के संहारकर्ता भी, जिनका वर्णन प्राचीन शास्त्रकारों ने बड़े ही कठोर रूपक में यूं किया है कि, “ऋषि-मुनि और रथी-महारथी इनके भोज्य हैं और मृत्यु इनके जेवनार का मसाला है।दोनों एक ही सत्य के रूप हैं, वही सत्य पहले जीवन के तथ्यों में अप्रत्यक्ष और स्पष्ट रूप से देखा गया जो अपने-आपको जीवन में व्यक्त किया करता है।

मनुष्य यदि हमारे अध्यात्म भाव में स्थित है तो इस बात का बहुत अधिक मूल्य नहीं दीखता कि मेरी के कोई पुत्र जोडिया मे शरीरतः थे या नहीं उन्होंने कष्ट झेले और अपने प्राणों को न्योछावर किया या नहीं। इसी प्रकार जिन श्रीकृष्ण का हमारे लिये महत्त्व है वे भगवान् के शाश्वत अवतार हैं, कोई ऐतिहासिक गुरु या मनुष्यों के नेता नहीं। इसलिये गीतोपदेश के सारतत्त्व को ग्रहण करने के लिये हमें महाभारत के उन मानव-रूप भगवान् श्रीकृष्ण के केवल आध्यात्मिक मर्म के साथ ही मतलब रखना चाहिये जो कुरुक्षेत्र की संग्राम भूमि में हमारे सामने अर्जुन के गुरु-रूप में अवस्थित हैं। ऐतिहासिक श्रीकृष्ण भी थे, इसमें कोई संदेह नहीं। छांदोग्य उपनिषद् में, पहले-पहल, यह नाम आता है और वहाँ इनके बारे में जो कुछ मालूम होता है वह इतना ही है कि आध्यात्मिक परंपरा में ब्रह्मवेत्ता के रूप में उनका नाम सुप्रसिद्ध था, उनका व्यक्त्वि और उनका इतिवृत्ति लोगों में इतना व्यापक था कि केवल देवकी-पुत्र श्रीकृष्ण कहने से ही लोग जान जाते थे कि किसकी चर्चा हो रही है। इसी उपनिषद् में विचित्रवीर्य के पुत्र राजा धृतराष्ट्र का भी नामोल्लेख है। और, चूंकि यह परंपरा इन दोनों नामों को महाभारत-काल में भी इतने निकट संपर्क में चलाये चली है, कारण ये दोनों-के-दोनों ही महाभारत के प्रमुख व्यक्ति हैं, इसलिये हम इस निर्णय पर भली प्रकार पहुँच सकते हैं कि ये दोनों वास्तव में समकालीन थे और यह कि इस महाकाव्य में अधिकतर ऐतिहासिक व्यक्तियों की ही चर्चा हुई है और कुरुक्षेत्र के संबंध मे किसी ऐसी घटना का ही उल्लेख है जिसकी छाप इस जाति के स्मृति-पट पर अच्छी तरह पड़ी हुई थी।

शास्त्रों के अनुसार ही वह रहा और चला है। उसके चित्त में जो सबसे प्रधान भाव या विचार है, भारतीय धारणा के अनुसार मानव -जाति का परिचालन करने वाला धार्मिक, सामाजिक और नैतिक नियम, विशेषकर स्वजाति-धर्म अर्थात् क्षात्र धर्म, क्योंकि वह क्षत्रिय है, धीर-वीर उदार राजपुत्र है, योद्धा है, आर्यों का नेता है, इसी क्षात्र-धर्म के अनुसार सदा पुण्य मार्ग चलता हुआ वह यहाँ तक आया है और अब यहाँ आकर अकस्मात् वह देखता है कि इसने उसको एक अति भीषण, अभूतपूर्व संहार-कर्म के सामने, उस कार्य के प्रमुख पात्ररूप में ला पटका है, ऐसे गृह युद्ध के सामने ला पटका है जिसमें सभी सुसंस्कृत आर्यराष्ट्र सम्मिलित हैं और जिसमें उनके समस्त मानव-मुकुटमणि नष्ट हो जायेंगे और भय है कि उनकी व्यवस्थित सभ्यता में विश्रृंखला जायेगी और वह विनाश को प्राप्त हो जायेगी। फलवादी मनुष्य की यह विशेषता वह अपने संवेदनों के द्वारा ही अपने कर्म के आशय के प्रति सचेत होता है। अर्जुन ने अपने सखा और सारथी से कहा, ’मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलिये, किसी गंभीर भावना से नहीं बल्कि दर्प के साथ उन करोड़ों मनुष्यों का मुंह एक निगाह में देख लेने के लिये जो अधर्म का पक्ष लेकर आये थे और जिनका अर्जुन को इस रण रंग में सामना करना है, जिन्हें धर्म की विजय के लिये जीतना और मरना है।

परंतु, उस दृश्य को देखने के साथ ही उसकी आंखे खुलती हैं और जिस गृह-कलह और पारस्परिक युद्ध का अर्थ उसकी समझ में आता है- यह वह युद्ध है जिसमें एक ही जाति, एक ही राष्ट्र, एक ही वंश के नहीं, बल्कि एक ही कुल के और एक ही घर के लोग एक-दूसरे के शत्रु बन आमने-सामने खड़े हैं। जिन लोगों को यह सामाजिक मनुष्य परम प्रिय और पूज्य मानता है उन्हीं लोगों का उसे शत्रु के नाते सामना करना वध करना होगा, पूज्यपाद गुरु और आचार्य, पुराने-संगी साथी, मित्र, सहयोद्धा, दादा, चाचा, और वे लोग जो रिश्ते में पिता के समान, पुत्र के समान, पौत्र के समान हैं, वे लोग जिनके साथ रक्त का संबंध है या जो साले-संबंधी हैं-ये सब सामाजिक संबंध यहाँ तलवार के घाट उतारने हैं। यह नहीं कह सकते कि इन बातों को अर्जुन पहले जानता था, पर उसको इनका जीवंत अनुभव नहीं हुआ था, क्योंकि उसको तो अपने दावों की, अपने ऊपर हुए अत्याचारों की याद थी। उसे धुन की सवार थी कि सिद्धांतों और न्याय के लिये लड़ना होगा, न्याय और धर्म की रक्षा करनी होगी तथा अधर्म और अत्याचार से युद्ध करके उनको मार भगाना होगा। इसलिये उसने इय युद्ध के पहलू के बारे में तो कभी गहराई के साथ सोचा अपने हृदय के अंदर और जीवन के मर्मस्थल में अनुभव ही किया। भगवान् सारथी यह बात अब उसकी अंतदृष्टि के सामने लाते है, उसकी आंखों के आगे सनसनीखेज तरीके से उपस्थित करते हैं और इससे उसकी संवेदनात्मक, प्राणमय और भावमय सत्ता के मर्म-स्थानों में एक गहरा धक्का-सा लगता है।

गीता में सचमुच तीन बातें ऐसी हैं जो आध्यात्मिक दृष्टि से बड़े महत्त्व की हैं, प्रायः प्रतीकात्मक हैं और उनसे आध्यात्मिक जीवन और अस्तित्व के मूल में जो बहुत गहरे संबंध और समस्याएं हैं वे प्रत्यक्ष होती हैं। वे तीन बातें हैं- श्रीगुरु का भागवत व्यक्तित्त्व, उनका अपने शिष्य के साथ विशिष्ट प्रकार का संबंध और उनके उपदेश का प्रसंग। श्रीगुरु स्वयं भगवान हैं जो मानव-जाति में अवतरित हुए हैं; शिष्य अपने काल का श्रेष्ठ व्यक्तित्व है, जिसे हम आधुनिक भाषा में मनुष्य-जाति का प्रतिनिधि कह सकते हैं, और जो इस अवतार का अंतरंग सखा चुना हुआ यंत्र है वह एक विशाल कार्य और संग्राम में प्रमुख पात्र है जिसका रहस्यमय उद्देश्य उस रंग भूमि के पात्रों को ज्ञात नहीं, ज्ञात है केवल उन मनुष्य-शरीर-धारी भगवान को जो अपने ज्ञानमय अथाह मानस के पीछे छिपे हुए यह सारा कार्य चला रहे हैं और, प्रसंग है इस कार्य और संग्राम में उपस्थित अति विकट भीषण परिस्थिति की वह घड़ी जिसमें इसकी बाह्य गति का आतंक और धर्म संकट तथा अंध प्रचंडता इस आदर्श व्यक्ति के मानस पर प्रत्यक्ष होकर इसे सिर से पैर तक हिला देती है और वह सोचने लगता है कि आखिर इसका अभिप्राय क्या है, जगदीश्वर का इस जगत से क्या आशय है, इसका लक्ष् क्या है, यह किधर जा रहा है और मानव-जीवन और कर्म का मतलब क्या है।

भगवान भी इस विश्व-जीवन के नानाविध रूपों में अपने-आपको ढालते हुए, सामान्यतः, इसकी शक्तियों के फलने-फूलने में, इसके ज्ञान, प्रेम, आनंद और विभूति की तेजस्विता और विपुलता में, अपनी दिव्यता की कलाओं और रूपों में आविर्भूत हुआ करते हैं। परंतु जब भागवत चेतना और शक्ति मनुष्य के रूप तथा कर्म की मानव-प्रणाली को अपना लेती है, और इस पर केवल शक्ति और विपुलता द्वारा अथवा अपनी कलाओं और बाह्य रूपों द्वारा ही नहीं, बल्कि अपने शाश्वत ज्ञान के साथ अधिकार करती है, जब वह अजन्मा अपने-आपको जानते हुए मानव मन-प्राण-शरीर धारण, कर मानव-जन्म का जामा पहनकर कर्म करता है तब वह देश-काल के अंदर भगवान के प्रकट होने की पराकाष्ठा हैः वही भगवान का पूर्ण और चिन्मय अवतरण है, उसी को अवतार कहते हैं। वेदांत के वैष्णव संप्रदाय में इस सिद्धांत की बड़ी मान्यता है और वहाँ मनुष्यों में रहने वाले भगवान और भगवान में रहने वाले मनुष्य का जो परस्पर संबंध है वह नर-नारायण के द्विविध रूप से परिदर्शित किया गया है; इतिहास की दृष्टि से नर-नारायण एक ऐसे धर्म-संप्रदाय मे प्रवर्तक माने जाते हैं जिसके सिद्धांत और उपदेश गीता के सिद्धांतों और उपदेशों से बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं। नर मानव-आत्मा है, भगवान का चिरंतन सखा है जो अपने स्वरूप को तभी प्राप्त होता है जब वह इस सखा-भाव में जागृत होता है, और वह उन भगवान में निवास करने लगता है। नारायण मानव-जाति में सदा वर्तमान भागवत आत्मा है, वह सर्वान्तर्यामी, मानव-जीव का सखा और सहायक है, यह वही है जिसके बारे में गीता में कहा है, ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशें तिष्ठति। हृदय के इस गूढ़शय के ऊपर से जब आवरण हटा लिया जाता है और ईश्वर का साक्षात दर्शन करके मनुष्य उनसे प्रत्यक्ष संभाषण करता है, उनके दिव्य शब्द सुनाता है, उनकी दिव्य ज्योति ग्रहण करता है और उनकी दिव्य शक्ति से युक्त होकर कर्म करता है तब इस मनुष्य-शरीरधारी सचेतन जीव का परमोद्धार होकर उस अज-अविनाशी शाश्वत स्वरूप को प्राप्त होना संभव होता है। तब वह भगवान में निवास और सर्वभाव से भगवान में आत्म-समर्पण करने योग्य होता है जिसे गीता में उत्तमं रहस्यम् माना है। जब यह शाश्वत दिव्य चेतना जो मानव-प्राणिमात्र में सदा विद्यमान है अर्थात नर में विराजने वाले ये नारायण भगवान जब इस मानव-चैतन्य को अंशतः[1] या पूर्णतः अधिकृत कर ले और दृश्यमान मानव-रूप में जगद्गुरु, आचार्य या जगन्नेता होकर प्रकट होते हैं तब यह उनका प्रत्यक्ष अवतार कहा जाता है। यह उन आचार्यों या नेताओं की बात नहीं है जो सब प्रकार से हैं तो मनुष्य ही पर कुछ ऐसा अनुभव करते हैं कि दिव्य प्रज्ञा का बल या प्रकाश या प्रेम उनका पोषण कर रहा है और उनके द्वारा सब कार्य करा रहा है, बल्कि यह उन मानव तनुधारी की बात है जो साक्षात उस दिव्य प्रज्ञा से, सीधे उस केंद्रीय शक्ति और पूर्णता में से आते हैं।

भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही बड़े दृढ़ विश्वास के साथ यह मान्यता चली आयी है कि भगवान वास्तव में अवतार लिया करते हैं, अरूप से रूप में अवतरित हुआ करते हैं, मनुष्य रूप में मनुष्यों के सामने प्रकट हुआ करते हैं। पश्चिमी देशों में यह विश्वास लोगों के मन पर कभी यथार्थ रूप से जमा ही नहीं, क्योंकि लौकिक ईसाई धर्म में इस भाव का एक ऐसे धार्मिक मत-विशेष के रूप में ही प्रतिपादन किया है जिसकी युक्ति, सर्वसाधारण चेतना और जीवन व्यवहार से मानो कोई मूलगत संबंध ही हो। परंतु भारतवर्ष में वेदांत की शिक्षा के स्वाभाविक परिणामस्वरूप यह विश्वास बराबर बढ़ता गया और जमता गया और इस देश के लोगों की चेतना में जड़ पकड़ गया है। यह सारा चराचर जगत भगवान की ही अभिव्यक्ति है, कारण एकमात्र भगवान ही सत हैं, बाकी सब उन्हीं एकमात्र सत का सत या असत रूप हैं। इसलिये प्रत्येक जीवन किसी--किसी अंश में, किसी--किसी विधि से उसी एक अनंत का संत दीखने वाले नाम रूपात्मक जगत में अवतरण मात्र है। परंतु यह मानो परदे के पीछे अभिव्यक्ति है; और भगवान का जो परभाव है तथा सांत रूप में जीव की यह जो पूर्णतः अथवा अंशतः अविद्या में छिपी चेतना है, इन दोनों के बीच में चेतना का चढ़ता उतरता हुआ क्रम लगा है। देह में रहने वाली चिन्मयी आत्मा, जिसे देही कहते हैं, भगवदग्नि की चिनगारी है और मनुष्य के अंदर रहने वाली यह आत्मा जैसे-जैसे अपने अज्ञान से बाहर निकलकर आत्म स्वरूप में विकसित होने लगती है वैस-वैसे वह स्वात्म ज्ञान में बढ़ने लगती है।

इसका पहला परिणाम यह होता है कि उसकी इन्द्रियां और उसका शरीर भयानक संकट में पड़ जाते हैं, जिससे उपस्थित कर्म उसकी इन्द्रियां उसके भौतिक फल से और फिर जीवन से ही उसका चित्त उचाट हो जाता है। अहंभावयुक्त मानव जाति के प्राण जिस सुख और भोग के पीछे पड़े रहते हैं उनसे अर्जुन अपना मुंह फेर लेता है और क्षत्रियों के प्राणों में विजय, राज्य, अधिकार और मनुष्यों पर शासन करने की जो प्रधान लालसा रहती है, अर्जुन उसका भी त्याग कर देता है। यह धर्म युद्ध आखिर किस लिये, इस बात को यदि व्यावहारिक अर्थ में विचारा जाये, तो इसका सिवाय इसके और क्या हेतु है कि हमारी, हमारे भाईयों और हमारे दल वालों की बन आवे, हम लोग अधिकार रूढ़ हों, नाना प्रकार के भोग भोगें और संसार में राज करें? पर इन चीजों के लिये यदि इतनी बड़ी कीमत देनी पड़ती हो, तो ये व्यर्थ हैं। इन चीजों का स्वयं अपना मूल्य कुछ भी नहीं है, ये तो सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन को सुसंपन्न बनाये रखने के साधान मात्र हैं औरमैं अपने परिवार और जाति के लोगों का संहार करके उद्देश्यों को ही नष्ट करने जा रहा हूँ।माया-ममता पुकार उठती है, अरे, जिन्हें तुम शत्रु मानकर मारना चाहते हो वे तो अपने ही लोग हैं जिनके लिये जीवन की और सुख की कामना की जाती है।

सारी पृथ्वी का, या तीनों लोकों का राज लेकर भी इन्हें भला कौन मारना चाहेगा? इन्हें मारकर फिर यह जीवन ही क्या रहेगा? इसमें क्या सुख और संतोष होगा! यह सब तो एक महापापमय कांड है! अब वह नैतिक बोध संवेदनों और माया-ममता के विद्रोह का समर्थन करने के लिये जाग उठता है, यह पाप है, आपस के लोगों के मार-काट में कहीं अन्याय है, धर्म, विशेषतः जबकि मारे जाने वाले स्वभावतः पूज्य और प्रेम-भाजन हैं, जिनके बिना भार होगा, इन पवित्र भावनाओं की हत्या करना कभी पुण्य नहीं हो सकता, यहीं नहीं, यह पाप है, आपस के लोगों की मार-काट में नहीं हो सकता, यहीं नहीं, यह पाप है, दारुण पाप है। माना कि अपराध उनका है, आक्रमण का आरंभ उनकी ओर से हुआ, पाप उनसे शुरू हुआ, लोभ और स्वार्थांधता के पातकी वे ही हैं जिनके कारण यह दशा उत्पन्न हुई; फिर भी जैसी परिस्थिति है उसमें अन्याय का जवाब हथियारों से देना खुद ही एक पाप होगा और यह पाप उनके पाप से भी बढ़कर होगा क्योंकि वे तो लोभ से अंधे हो रहे हैं और अपने पाप का उन्हें ज्ञान नहीं, पर हम लोग तो जानते हैं कि यह लड़ाई लड़ना पाप है। लड़ाई भी इसलिये? कुल-धर्म की रक्षा के लिये, जाति-धर्म की रक्षा के लिये, राष्ट्र धर्म की रक्षा के लिये? पर इन्हीं धर्मों का तो इस गृह-युद्ध से नाश होगा; कुल नष्टप्राय होगा, जाति का चरित्र कलुषित होगा और उसकी शुद्धता नष्ट होगी, सनातन जाति धर्म और कुल नष्ट होंगे।

हम जानते हैं कि गीता मे गुरु भगवान् हैं, और हम देखते हैं कि शिष्य मानव है; अब यह बाकी है कि हमें गीता की शिक्षा की स्पष् धारणा हो जाये। यह स्पष्ट धारणा ऐसी होनी चाहिये कि गीता की मुख्य शिक्षा, उसका सार मर्म हमारी समझ में जाये, क्योंकि गीता में बहुमूल्य और बहुमुखी विचार होने के कारण तथा इसमें आध्यात्मिक जीवन के नानाविध पहलुओं का समालिंगन होने और इसका प्रतिपादन वेग युक्त चक्राकार गति होने के कारण सहज ही ऐसा हो जाता है कि लोग इसकी शिक्षा का, अन्य सद्ग्रंथों की अपेक्षा भी अधिक मात्रा में, पक्षपातयुत बुद्धि से पैदा हुआ एक पक्षीय भ्रांत निरूपण करने लगते हैं। किसी तथ्य, शब्द या भावना को ग्रंथ के अभिप्रेत तात्पर्य से, जाने-बेजाने अलग करके उससे अपने किसी पूर्वगृहीत विचार या शिक्षा अथवा अपनी पसंद का कोई सिद्धांत स्थापित करना भारतीय नैयायिकों की दृष्टि में हेत्वाभास का एक बड़ा ही सुगम प्रवंचक प्रकार है; और शायद यह एक ऐसा प्रकार है कि अत्यंत सावधान रहने वाले दार्शनिक कि लिये भी इससे बड़ा कठिन होता है।

कारण इस विषय में मनुष्य की बुद्धि अपना दोष आप ही ढूंढ़ निकालने की सावधानी सदा रख सकने में असमर्थ होती है; उसका स्वभाव ही किसी एकतरफा सिद्धांत, विचार या तत्त्व ग्रहण कर उसी का मंडन करने और उसी को संपूर्ण सत्य के पाने की कुंजी बना लेना होता है और इस स्वभाव में अपने-आपको बढ़ाने की वृत्ति होती है जिसका कोई अंत नहीं है। अर्थात् मनुष्य बुद्धि में यह स्वरूपगत और पालित-पोषित दोष है, अपने कार्य में इस दोष को ढूंढ़ निकालने से इसकी दृष्टि फिरी रहती है। गीता के संबंध में इस प्रकार की गलती सहज रूप से होती है, क्योंकि इसके किसी भी एक पहलू को लेकर उसी पर खास जोर देकर अथवा इसकी किसी खास जोरदार श्लोक को लेकर उसी को आगे बढ़ाकर अठारहों अध्यायों को पीछे धकेलकर या उन्हें गौण और सहायक रूप करार देकर गीता को अपने ही मत या सिद्धांत का पोषक बना लेना आसान है। इस प्रकार कुछ लोगों का कहना है कि गीता में कर्म-योग का प्रतिपादन ही नहीं है, बल्कि वे इसकी शिक्षा को संसार और सब कर्मों के संन्यास के लिये तैयार करने वाली एक साधना मानते हैं; नियत कर्मों को अथवा जो कोई कर्म आमने सामने पड़े उसको उदासीन होकर करना ही साधन या साधना है; संसार और सब कर्मों का अंत में संन्यास ही एकमात्र साध्य है।

मेरे विचार में तो यह धारणा गलत है, क्योंकि इसके विपक्ष में बड़े प्रबल प्रमाण हैं और पक्ष में भीतरी बाहरी जो कुछ प्रमाण है वह बहुत पोचा और स्वल्प है। परंतु यदि पुष्ट और यथेष्ट प्रमाण हो भी तो यह स्पष्ट ही है कि ग्रंथकार ने अपने इस ग्रंथ को महाभारत की बुनावट में बुनकर इस तरह मिला दिया है कि इसके ताने-बाने महाभारत से अलग नहीं किये जा सकते, यही नहीं, बल्कि गीता में ग्रंथकार ने बार-बार उस प्रसंग की याद दिलायी है कि जिस प्रसंग से यह गीतोपदेश किया गया, केवल उपसंहार में ही नहीं, अत्यंत गंभीर तत्त्वनिरूपण के बीच-बीच में भी उसका स्मरण कराया है। ग्रंथकार का यह आग्रह मानना ही होगा और इस गुरु शिष्य दोनों का ही जिस प्रसंग की ओर बारंबार ध्यान खिंचता है उसे उसका पूर्ण महत्त्व प्रदान करना ही होगा। इसलिये गीता को सर्वसाधारण अध्यात्मशास्त्र या नीतिशास्त्र का एक ग्रंथ मान लेने से ही काम चलेगा, बल्कि नीतिशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र का मानव-जीवन में प्रत्यक्ष प्रयोग करते हुए ही व्यहार में जो कुछ संकट उपस्थित होता है उसे दृष्टि के सामने रखकर इस ग्रंथ का विचार करना होगा। वह संकट क्या है, कुरुक्षेत्र के युद्ध का आशय क्या है और अर्जुन की आंतरिक सत्ता पर उसका क्या असर होता है, इन बातों का हमें पहले से ही निश्चित कर लेना होगा, तब कहीं हम गीता के मतों और उपदेशों की केंद्रीय विचारधारा को पकड़ सकेंगे। यह बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि कोई गहन गंभीर उपदेश किसी ऐसे सामान्य से प्रसंग के आधार पर नहीं खड़ा हो सकता जिसके बाह्य रूप के पीछे कोई वैसी ही गहरी भावना और भयंकर धर्म-संकट हो और जिसका समाधान नित्य के सामान्य आचार-विचार के मानक से किया जा सकता हो।

इसलिये अर्जुन गांडीव धनुष और कभी ख़ाली होने वाला तरकस, जिनको देवताओं ने उसको इस विषम घड़ी के लिये दिया था, नीचे रखकर पुकार उठता है, ’मेरा कल्याण तो इसी में अधिक है कि धृतराष्ट्र के पुत्र मुझ शस्त्रहीन और विरोध ना करने वाले को मार डालें! मैं तो युद्ध नहीं करूंगा।अतएव, अर्जुन के ऊपर जो यह आंतरिक संकट आया उसका हरण किसी रहस्वादी जिज्ञासु के अंदर उठने वाला कोई प्रश्न नहीं है, यह इस कारण से ही पैदा? हुआ है कि अर्जुन के जीवन के दृश्यों से घबराकर अपनी दृष्टि को वस्तुओं के सत्य की, स्थिति के यथार्थ आशय की खोज में और इस जगत् की अंधेरी पहेली को सुलझाने या उससे बचने के लिये अंर्तमुखी करना चाहता हो, यह तो उस मनुष्य के इन्द्रिय, मन, प्राण, हृदय और धर्म-बुद्धि का विद्रोह है जो अब तक निश्चित भाव से कर्म और उसके प्रचालित मान दंड से संतुष्ट रहा है। पर इस मानदंड और कर्मों ने उसे एक ऐसे भीषण विप्लव में लाकर झोंक दिया है कि यहाँ वे कर्म और उनके वे मानदंड एक-दूसरे के और स्वयं अपने भी भयंकर विरोधी हो गये हैं आचार का कोई आधार नहीं रह गया जिस पर वह खड़ा हो सके, जिसके सहारे वह चल सके, अर्थात् कोई धर्म नहीं रह गया।[1] मनोमय कर्मी पुरुष के ऊपर आने वाली सबसे बड़ी आपत्ति यही है, यही उसकी सबसे बड़ी च्युति और अवनति है। इस विद्रोह का स्वरूप सहज और स्वाभाविक है; इन्द्रियों और मन का विद्रोह यों कि ये भय, अनुकंपा और जुगुप्सा से विवश हो गये हैं विवश हो गये हैं, प्राणों का विद्रोह यों कि कर्म के इष्ट और सुपरिचित उद्देश्यों में और जीवन कि ध्येय में कोई आकर्षण, कोई श्रद्धा नहीं रह गयी, हृदय का विद्रोह यों कि समाज के अंग भूत मनुष्य मात्र में हृदय में स्नेह, श्रद्धा, सबके लिये समान सुख और संतोष की इच्छा आदि जो भाव होते हैं, वे ही उस कठोर कर्तव्य के विरुद्ध खड़े हो गये, क्योंकि उस कर्तव्य से ये भाव कुचले जाने लगे; धर्म-बुद्धि का विद्रोह यों कि पाप और नरक की मौलिक भावनाएं उठ खड़ी हुईं और रूधिर-प्रदिग्ध भोग कहकर युद्ध से हटने का तकाजा करने लगीं; प्रकृति व्यवहार की दृष्टि से विद्रोह यों कि धर्माधर्म-विचार के इस मान दंड को मानने का फल यह दीख पड़ा है कि धर्म-कर्म का जो प्राकृत उद्देश्य है, वही इससे नष्ट हुआ जाता है। पर सबका परिणाम यह रहा कि अर्जुन के सर्वांतःकरण का दिवाला निकल गया और कार्पण्यदोषोपहत-स्वभाव कहकर अर्जुन अपनी इसी अवस्था को प्रकट करता है, केवल उसका विचार, बल्कि उसका हृदय, उसकी प्राणगत वासनाएं, उसकी संर्पूण चेतना ही उपहत हो गयी और धर्मसंमूढचेताः हो गया- धर्म का उसे कहीं पता नहीं चला, क्या करें और क्या करें इसको स्थिर करने का कोई पैमाना नहीं मिला। बस, इसीलिये वह शिष्य होकर श्रीकृष्ण की शरण में आता है और वह यथार्थ प्रार्थना करता है कि मुझे वह वस्तु दीजिये जिसको मैंने खो दिया है, एक सच्चा धर्म दीजिये, धर्म का एक स्पष्ट विधान बता दीजिये, एक मार्ग दिखा दीजिये जिसके सहारे मैं फिर दुबारा निश्चय के साथ चल सकूं।

वह इस जीवन या संसार के रहस्य और इस सबके उद्देश्य और हेतु को नहीं जानना चाहता, जानना चाहता है केवल धर्म। तथापि भगवान् उसे वही रहस्य बतलाना चाहते हैं जिसे जानने की अर्जुन ने कोई इच्छा नहीं की, कम-से-कम उसका उतना ज्ञान तो देना ही चाहते हैं जो उसे किसी उच्चतर जीवन की ओर ले जाने के लिये आवश्यक है; क्योंकि भगवान् चाहते हैं कि अर्जुन सब धर्मों का त्याग कर दे तथा उसका एक ही बृहत् और विशाल हो और वह हो भगवान् में सचेतन होकर निवास करना तथा उसी चेतना से युक्त होकर कर्म करना। इसलिये आचार के सामान्य मानकों के प्रति अर्जुन के अंतःकरण के विद्रोह की भली-भाँति जांच करके भगवान् उसे वह बतलाना आरंभ करते हैं, जिनका संबंध आत्मिक अवस्था से है, कर्म के किसी बाह्य विधान से बिल्कुल नहीं। अर्जुन को उपदेश दिया जाता है कि तुम आत्मा की समता निवास करो, कर्म के फलों की इच्छा त्याग दो, योगस्थ होकर अर्थात् भगवान् में ही सर्वथा स्थित होकर रहो और कर्म करो। अर्जुन को संतोष नहीं होता, वह जानना चाहता है कि यह स्थिति प्राप्त होने से मनुष्य के बाह्य कर्म पर क्या असर होगा, उसके भाषण पर, उसकी गति विधि पर, उसकी अवस्था पर इसका क्या परिणाम होगा, इसके कारण इस कर्मनिष्ठ सजीव मानव प्राणी में क्या अंतर होगा?

श्रीकृष्ण फिर भी, उन्हीं ज्ञान की बातों को विशद करते हैं जिन्हें वे यहाँ तक बता चुके हैं, कर्म के पीछे रहने वाली आत्मा की अपनी स्थिति का ही निर्देश करते हैं, स्वयं कर्म की कोई बात नहीं कहते। वह बतलाते हैं कि अपनी बुद्धि को कामना-वासना रहित समता की अवस्था में स्थिर रूप से रखो, बस इसी की जरूरत है। अर्जुन अधीर हो उठता है, क्योंकि जो आचार वह जानता था उसका कोई पता नहीं चलता, बल्कि यहाँ तो उसे संपूर्ण कर्म का अभाव ही दीख पड़ता है। अर्जुन बड़ी व्यग्रता से पूछता है, “यदि बुद्धि को आप कर्म से श्रेष्ठ बतलाते हैं, तो मुझे इस घोर कर्म में क्यों लगाते हैं? आपकी दुतरफा मिली हुई बात से मेरी बुद्धि घबरा जाती है, एक बात निश्चित रूप से बताइये, जिससे मैं श्रेय की प्राप्ति कर सकूं।फलवादी मनुष्य के लिये आध्यात्मिक विचार तथा आंतरिक जीवन का कोई मूल्य नहीं होता यदि धर्म की प्राप्ति होती हो जिसे वह खोजता है। उसकी खोज यही होती है कि वह सांसारिक जीवन को सुव्यवस्थित करने के लिये कोई विधान पा जाये, भले ही जरूरत होने पर यह विधान उसे संसार को छोड़ देने के लिये क्यों कहे, कारण यह भी है कि एक निश्चयात्मक बात भी होगी जिसको वह समझ सकेगा। परंतु संसार में रहकर कर्म करना और फिर उससे परे रहना, यह एक ऐसीव्यामिश्र ( मिली हुई ) और चक्कर में डालने वाली बात है जिसे ग्रहण करने के लिये उसमें धैर्य नहीं। अर्जुन के शेष सभी प्रश्न और कथन इसी स्वभाव और चारित्र्य से उत्पन्न हुए हैं।

जब उससे कहा जाता है कि आत्म स्थिति प्राप्त होने पर यह जरूरी नहीं है कि कर्म का बाह्म रूप भी बदल जाये, कर्म सदा स्वभाव के अनुसार ही करना होगा, चाहे वह कर्म दूसरे की तुलना में सदोष और त्रुटि पूर्ण क्यों प्रतीत हो, तब इस बात से उसका चित्त घबरा उठता है। स्वभाव के अनुसार कर्म करना होगा ! किंतु, अर्जुन का जो मुख्य विषय है अर्थात् इस कर्म को करने से पाप की ही जो आशंका होती है उसका क्या हुआ? क्या यह स्वभाव के कारण ही नहीं है कि मनुष्य मानो विवश होकर, अपनी मर्जी के ख़िलाफ़ भी पाप और अपराध करते हैं? इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण आगे चलकर कहते हैं कि मैंने ही पुराकाल में यह योग विवस्वान् को बतलाया था, जो काल पाकर नष्ट हुआ और वही आज मैं तुम्हें फिर बता रहा हूं, तब भी अर्जुन की व्यावहारिक बुद्धि चकरा गयी और उसने जब खुलासा पूछा तो श्रीकृष्ण ने अवतार-तत्त्व और उसके सांसारिक प्रयोजन के संबंध में वे प्रसिद्ध वचन कहे, जिनका जहाँ-तहाँ पुनः-पुनः स्मरण किया जाता है। अर्जुन फिर श्रीकृष्ण के शब्दों से घबराकर जाता है जब श्रीकृष्ण कर्म और कर्म-संन्यास दोनों का समन्वय करते हैं और वह फिर वही बात कहता है कि एक ही बात निश्चित रूप से बताइये, यहव्यामिश्रवाक्य नहीं।

अर्जुन से जिस योग को अपनाने को कहा जा रहा है उसका स्वरूप जब वह पूरे तौर पर समझ लेता है तो उसका फलवादी स्वभाव जो मन के संकल्प, पसंद और इच्छा से ही कर्म में प्रवृत्त होना जानता है, इस योग को बहुत कठिन जानकर शंकित हो उठता है। अर्जुन पूछता है कि उस पुरुष की क्या गति होती है जो इस योग की साधना करता तो है पर योग सिद्धि को नहीं प्राप्त होता, क्या वह मानव कर्म, विचार और भाव वाले इस जीवन को जिसे योग के लिये वह आगे बढ़ा था, दोनों को ही तो नहीं खो बैठता और इस प्रकार दोनों और से भ्रष्ट होकर छिन्न-भिन्न बादल की तरह नष्ट तो नहीं हो जाता? जब उसकी शंकाओं का समाधान हो गया और सब उलझनें सुलझ गयीं और उसने जाना कि भगवान् को ही उसे अपना धर्म-कर्म मानना होगा, तब भी वह बार-बार उसी सुस्पष्ट और सुनिश्चित ज्ञान के लिये आग्रह करता है, जो उसे इस मूल तक, इस भावी कर्म विधान तक हाथ पकड़कर पहुँचा दे। सत्ता जिन विधि अवस्थाओं में हम सामान्यतया रहते हैं, उनमें भगवान् को कैसे परखें? संसार में उनकी आत्म शक्ति की वे कौन-सी प्रधान अभिव्यक्तियां हैं जिनको वह ध्यान द्वारा पहचान सकता है और अनुभव कर सकता है? क्या अर्जुन इस क्षण में भी उनके भागवत विश्वरूप को नहीं देख सकता जो मानव मन, बुद्धि और शरीर की आड़ में रहकर उससे वास्तव में बात कर रहा है?

अर्जुन के अंतिम प्रश्न, कर्म-संन्यास और सूक्ष्मतर संन्यास ( जिसे करने को अर्जुन से कहा जा रहा है ) के बीच भेद को तथा पुरुष और प्रकृति, क्षेत्र और क्षेत्रज के बीच वास्तविक भेद को स्पष्टता से जानने के लिये हैं जो कि भागवत संकल्प से प्रेरित होकर निष्काम कर्म करने के अभ्यास के लिये अत्यंत आवश्यक है; और फिर अंत में अर्जुन प्रकृति के तीन गुणों के कर्म और उनके परिणाम सुस्पष्ट रूप से समझ लेना चाहता है, क्योंकि इन तीन गुणों को पार करने के लिये उससे कहा गया है। गीता में भगवान् गुरु अपने शिष्य को अपनी भागवत शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। अहंभाव के साथ कर्म करते-करते शिष्य अपने आंतर विकास की उस अवस्था को प्राप्त हुआ है जिसमें उसके अहंता-ममतायुक्त जीवन और सामाजिक आचार-विचार का कोई मानसिक, नैतिक और भाविक मूल्य नहीं रह गया है, हठात् उनका दीवाला निकल गया है, ठीक इसी संधिक्षण में गुरु अपने शिष्य को पकड़ते और वे उसे इस निम्न जीवन से उठाकर पर चैतन्य में ले जाना चाहते हैं, कर्म की इस अज्ञानमयी आसक्ति से छुड़ाकर उस सत्ता को प्राप्त करना चाहते हैं, जो कर्म के परे हैं, पर है कर्म का उत्पादन और व्यवस्थापन करने वाली।

 

वे उसे अहंकार से निकालकर आत्मा में ले जाना चाहते हैं, मन-बुद्धि, प्राण और शरीर के जीवन से निकलकर मन-बुद्धि के परे की उस प्रकृति में ले जाना चाहते हैं जो भागवत स्थिति है। इसके साथ ही भगवान् को उसे वह चीज भी देनी है जो वह मांग रहा है और जिसे मांगने और ढूंढने की प्रेरणा उसे अपनी अंतःस्थित सत्ता के निर्देश द्वारा मिल रही है, अर्थात् इस जीवन और कर्म के लिये एक नवीन धर्म देना है जो इस अपर्याप्त सामान्य मनुष्य-जीवन के परस्पर-विग्रह, विरोध, उलझन और भ्रामक निश्चयों से परिपूर्ण विधान से बहुत ऊपर की चीज है, वह परम धर्म जिससे जीव कर्म-बंध से मुक्त होता है और फिर भी अपने भागवत स्वरूप की विशाल मुक्त स्थिति में कर्म करने और विजय संपादन करने की शक्ति से युक् होता है। क्योंकि कर्म तो करना ही होगा, जगत् का अपने काल चक्र पूरे करने ही होंगे और मनुष्य की आत्मा को उस नियत कर्म की ओर से अज्ञानवश अपनी पीठ नहीं मोड़नी चाहिये जिसके लिये वह वहाँ आयी है। गीता की शिक्षा का संपूर्ण क्रम, उसकी व्यापक-से-व्यापक परिक्रमा में भी, इन्हीं तीन उद्देश्यों की पूर्ति के निमित्त है और उधर ही ले जाने वाला है।

--- चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता द्वारा सम्पादित और प्रकाशित