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शंखनाद

आज हमें यह सोचने में भी शायद कुछ अलग ही लगता होगा जब हम एक जानकारी पाते हैं कि युद्ध शुरू होने से पहले शंखनाद से कुरुक्षेत्र की धरती को पवित्र किया गया था; पितामह, गुरुदेव, सभी भ्राता, प्रमुख  योद्धा और स्वयं जगदीश्वर भी अपने अपने शंख साथ में लाये थे; उन सभी शंखनाद से सुर, असुर, राजा, सेनानायक, राठी, महारथी और स्वयं जगदीश भी युद्ध क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का भान कराते रहे। 

शंखनाद से ही सभी कर्मकांड शुरू करने की बात और उसी शंखनाद से कर्मकांड समाप्प्त करने की बात हमारी जानकारी में आयी जरूर; पर रण क्षेत्र   में  अगर वैसी परिस्थिति का निर्माण हो तब हमें फिर से उस कर्म काण्ड के बारे में विचार करना होगा जिसमे युद्ध को भी शंखनाद से शुरू करने के बारे में और सूर्यास्त के बाद इस रण को फिर से शंखनाद के जरिये समाप्त कर देने की बात कही जाती हो। आधुनिक युग का युद्ध है ही निराला; कहीं कहीं पर अंधकार का सहारा लेकर , छिपकर , शत्रु को कोई मौका न देते हुए आक्रमण कर दिए  जाते होंगे; तो कहीं सूचना जाल का सहारा लेकर मशीनें खराब कर दिए जाते होंगे; और फिर कहीं पूरी दुनिया को चार पांचबार विनष्ट कर देने की योजना बन रही होगी; योजना बनाने वालों को शायद ही इस बात की जानकारी रही होगी कि  संसार विनष्ट होने के बाद फिर किसी भी मनुष्य के लिए धरती पर स्थान नहीं बन पायेगा; संसार के रचना तंत्र के साथ खेलने का अर्थ हुआ विनाश लीला शुरू करने के लिए जगदीश्वर श्री हरि को शंखनाद करने के लिए मजबूर कर देना।

हमें जगदीश्वर के शंखनाद के विपरीत चलने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए; वैसी पात्रता भी किसी मनुष्य को नहीं मिली; सूर्य से ऊर्जा लेकर उसी के सहारे भोजन बनाकर अन्य सभी जीव का पोषण करने की जिम्मेदारी; प्रकृति में संतुलन बनाये रखने की जिम्मेदारी जिस भाँती जिस जीव को मिली होगी उसे वैसा ही करते रहना होगा; शंखनाद करके शिकारी कभी भी शिकार पर झपट्टा नहीं मार पायेगा; या फिर किसी अपराधी को पकड़ते समय किसी दरोगा को शायद ही हम शंखनाद करते हुए देख पाए!

कुरुक्षेत्र में शंखाबाद के जरिये मानसिक और बौद्धिक संघर्ष की सूचना हो जाने के बाद दोनों पक्षों  की सेना में व्यूह रचना की ओर नजर डालने का मौका मिला; आधुनिक युग में शंखनाद के जरिये युद्ध शुरू करने की बात को  बेमानी मान लेने को हम जल्दबाजी ही मानेंगे; शंखनाद के पैमाने और तरीके भले ही बदल गए होंगे पर अभी भी युद्ध के पहले   अखबार के जरिये, प्रचार नाध्याम के जरिये, पत्राचार, सभाएं और सेना स्थानान्तरित करने के जरिये युद्ध का शंखनाद ही होता है।  सेनानायकों के आपसी मेल मिलाप को भी हम शंखनाद ही मानेंगे।  इतिहास साक्षी है कि अपने देश में संघर्ष और नरसंहार रोकने के लिए शंखनाद किये गए थे; भले ही उस शंखनाद के बाद हमें शंखनाद करनेवाले सैनिक के जीवन पर संकट का बादल धूमायित होते हुए देखना पड़ा; और फिर उन्हें हमसे दूर कर देने का प्रयास भी किया गया; सभ्य जनजाति को सभ्यता की शिक्षा देने के क्रम में भी शंखनाद करनेवाले सेनानायकों की जानें संकट में आयी; उनके ऊपर हथियार का प्रयोग करनेवालों को शायद इस बात का अनुमान भी न रहा होगा कि शरीर छुड़ा लेने से किसी जननायक को जनता जनार्दन के ह्रदय से दूर नहीं किया जायेगा; ऐसा कर पाने के बारे में सोचनेवाले भी बुद्धि से कमजोर ही माने जाएंगे।

युद्ध को कभी हमने शुरू होते हुए जरूर देखा होगा; पर इसकी समाप्ति की ओर संसार को एकरूप होते हुए आज तक नहीं देख पाए।  युद्ध संस्कृति का जो भयानक परिणाम रहता होगा उसे देखकर इतिहास से सीख लेनेवालों की संख्या भी कई होंगे; पर वैसा लड्डू किस काम का जो हमेशा हमेशा के लिए एक डब्बे में ही रख  दिया जाय? हमें ऐसे अग्रज की तलाश हमेशा से रही जो जनता जनार्दन के ह्रदय सम्राट बन पाएंगे; अपने यहां भी ऐसे महात्मा आये जिन्हें ह्रदय सम्राट बनते हुए भी हमने देखा; और फिर उन्हें हम  सही प्रकार से समझ ही नहीं पाए।  शास्त्र में भी कुछ ऐसी ही मान्यता बन रही है कि जगदीश्वर श्री हरि के सही स्वरुप को हम शायद ही ठीक से समझ पाएं! आखिर सागर की गहराई के बारे में जानकारी पाने के उद्देश्य से निकलनेवाले नमक के पुतले को कभी न कभी पिघलना तो पड़ेगा; उसके बाद यह फिर कोई माने नहीं रखता कि जगदीश्वर के शंखनाद से सृजन का निर्देश मिला या विनाश की लीला रची गई!

हम उस अवसर की बंभीरता के बारे में सिर्फ कल्पना कर पाएंगे जब सभी रथी महारथी योद्धा के शंखनाद से कुरुक्षेत्र की भूमि को प्रकम्पित किया गया होगा; उसके बाद फिर श्रीहरि के पांचजन्य की भी बारी आयी होगी; पर श्रीहरि के शंखनाद के जरिये प्रसारित की जानेवाली विनाशलीला को शायद ही कोई पक्ष के महारथी ठीक से समझ पाए होंगे; अगर समझ पाते तो फिर श्रीमद्भागवद्गीता में एक ही अध्याय रहता और सव्यसाची के आसपास अन्य सेनानायकों की कतार लग जाती; क्यूंकि उस परिस्थिति में उन सभी को श्रीहरि के पास रचनाधर्मिता का और आध्यात्मिक चेतना का गुप्त मन्त्र जो लेना था ! पर ऐसी परिस्थिति बनते हुए हम नहीं देख पाए। परिणाम हम सबके सामने है; युद्ध शुरू हो जाने के बाद एक योद्धा के मन में युद्ध के भीषण परिणाम के बारे में सोच विचार पनपे, और फिर उसे अगर ऐसा लगने लगे कि युद्ध न करते हुए अरण्य जीवन स्वीकार कर लेना श्रेय होगा  तो फिर हमें खुश होना चाहिए! पर इस बात को जानकार श्रीहरि काफी नाराज हो गए और उस भावना को एक योद्धा के ह्रदय में पनपनेवाली कायरता, कमजोरी, अज्ञान और हीन भावना कह दिया।   वस्तुतः रण भूमि का बीच का क्षेत्र किसी भी योद्धा के लिए शांति, अहिंसा और संतोष की बात करने के लिए स्थान, काल  या फिर पात्रता  के मापदंड से उपयुक्त स्थल नहीं मान  पाएंगे ; जगदीश्वर भी ऐसा नहीं मान पाए; इस प्रयास को उन्होंने स्वधर्म के निमित्त से भी गलता बताया ।  इसी लिए श्री हरि उस योद्धा को युद्ध करने के लिए बताते रहे।

…… (विषाद योग शीर्षक पुस्तक से ; प्रस्तुति: चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता)

 

अगला पड़ाव

 


काफी अवधि के बाद फिर से उस पवित्र भूमि पर बैठकर पवित्र जीवन के बारे में संतों से सुनने का मौका मिला।  वह माहौल ही अनोखा  था जब मैं आचार्य विनोबा को उन संतों के बीच प्रत्यक्ष रूप से मूर्त होता हुआ देख रहा था और यह भी महसूस कर रहा था कि मुझे भी कुछ ठोस कदम उठाते हुए ज्ञान गंगा के पवित्र सरोवर में संतरण करने के कार्यक्रम को नित्य नैमित्यिक अनुक्रिया बना लेना चाहिए।  तत्व को आधार मानकर उसकी गहराई में उतर जाने के लिए कई दिव्य जनों को प्रयत्न करते हुए देखकर भी मन , बुद्धि और चित्त को एक समाधान मिलता है और हम शाश्वत मार्ग ार चल पड़ने के लिए कुछ साहस जूता पाते हैं। इसे एक प्रात्यक्षिक भी समझा जाना चाहिए जिसके जरिये हमें अपने सामुदायिक जीवन के अगले  पड़ाव के बारे में अपनी समझ बनाने की जरुरत महसूस हो रही है। 

यह तो स्वाभाविक ही है कि कुछ लोग पैसों के लिए काम करेंगे और अन्य कुछ लोग प्रतिष्ठा के लिए; उन दोनों समूहों से अलग हटकर कुछ ऐसे भी दिव्य जन  होंगे जन्हें न तो पैसों का प्यास रहेगा और न ही प्रतिष्ठा कि भूख।  उन्हें सार्विक समाधान के अनुसंधान के निमित्त से दिव्य पथ पर चलना होगा ; इसी में वो अपने जीवन का समाधान मानेंगे और तीसरी शक्ति का हिस्सा बन जाना पसंद करेंगे।  उस तीसरी शक्ति की बिरादरी भी बड़ी होनेवाली है। 

इस सफर को स्वार्थ से परमार्थ की ओर किया जानेवाला सफर समझा जाना चाहिए; इसे कुछ और स्पष्टता से समझने के लिए हम यह भी प्रत्यक्ष कर पाएंगे कि हमारा जीवन निसर्ग के अधीन है; उसकी कुछ सीमाएं भी निर्धारित कर दिए गए हैं, उस सीमा में ही हमें बने रहना होगा; उस सीमा से हटकर हम ग्रहों और नक्षत्रों तक का सफर नहीं कर पाएंगे; उसी प्रकार धरती कीसीमा सूर्य के परिमंडल तक; सूर्य की सीमा ब्रम्हांड के परिमंडल तक; ब्रम्हांड की सीमा ऊर्जा और अदारथ के बेच के समन्वय तक; ऊर्जा और पदार्थ के समन्वय सृष्टि और विनाश के चक्र तक सीमित कर दिया गया।  सिर्फ परम सत्ता को ही असीम रखा गया।  उस परम सत्ता को समझ पाने का लिए हमें अपने सीमित पगडंडी से बाहर तो आना होगा ही।  

क्या उस दिव्य जीवन की ओर दिव्य कर्म के जरिये चलने की तमन्ना सभी आम जनों को भी रखना चाहिए, या फिर इसे किसी ख़ास वर्ग तक ही सीमित समझा जाय? यह तो वैसा ही हुआ जैसे छोटी मछलियां सरोवर में ही रहे और सिर्फ बड़ी मछलियों को समुद्र में उतरकर गोते खाने का सपना देखना चाहिए; पर हकिअक्त में विस्तीर्ण जलराशि का साम्राज्य सबके लिए सामान रूप से सुगम बना दिया गया।  यह नैसर्गिक होने के साथ साथ शाश्वत मार्ग का द्योतक भी समझा जाएगा।  

अपराध और अपराधी

 

चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता

अपने   दैनिक   जीवन   में कुछ हादसे ऐसे भी होते हैं जो पूरी व्यवस्था और न्याय तंत्र पर ही एक सवालिया निशान छोड़ दिया करता है।  उन हादसों के बारे में अखबार और अन्य संचार माध्यम काफी कुछ लिख डालते हैं; अलग अलग सम्प्रदाय और राजनीति से जुड़े लोगों कुछ कर गुजरने के लिए मार्ग मिल जाना एक स्वाभाविक सी बात ही समझें।   सवाल कुछ बड़ा सा तब पैदा हो गया जब चिकित्सा विज्ञान से जुड़े किसी छात्र को हादसों का शिकार होना पड़ा।  यह तो सच ही है कि उन हादसों  को अनजाम देनेवालों पर क़ानून का शिकंजा कसने का उपक्रम एक जांच का विषय है।  उस हादसे को एक सामान्य घटना बोलकर शाशन पक्ष के नेताओं ने समग्र चिकित्सक सम्प्रदाय के साथ साथ सभी नागरिकों को भी शर्मिंदा कर दिया। 

विषय तब और ज्यादा बिगड़ जाती है जब हम पाते हैं कि हादसों से जुड़े सबूत को मिटा डालने कीप्रक्रिया चल पड़े और फिर उस प्रक्रिया में शाशन की कुछ लोगों के जुड़े होने कि खबर चलने लगे।  कुछ मतलबी, खुदगर्ज और हिंसा से ग्रसित लोग ही अक्सर हादसों को अंजाम दे दिया करते हैं; यह कोई नयी  बात नहीं; सुर - असुर का संग्राम काफी पुराना ही मानें।  हम कितना सभ्य और व्यवस्थित हो पाए होंगे इसका आकलन इसी बात से लगाया जा सकेगा जब हम उन आंकड़ों की  और ध्यान देंगे जहां स्त्रियों को समाज में सुरक्षित रहने की  बात कि जा सकेगी।  सिर्फ इतना ही नहीं किसी भी जीव के प्रति हिंसा का प्रमाण कितना पाया जा रहा है।  कई  माने  में अपने समाज में भी स्त्रियों को सुरक्षित रख पाना एक चुनौती मानी जा रही है।

सवाल यह भी पैदा हो रहा है जिसके अंतर्गत हम यह समझना चाहेंगे कि आखिर किस आकर्षण से विद्यार्थी चिकित्सा विज्ञान को सबसे पहली प्राथमिकता के रूप में मानने लग जाते हों और उस स्पर्धा के लिए तन, मन और धन लगा दिया करते हों; यहां तक कि जीवन का बड़ा हिस्सा उस पदवी को पाने के लिए लगा डालते होंगे जिसके पाने के बाद उन्हें यह भी लगता होगा कि उन्होंने जीवन एक बड़ा पड़ाव पार कर लिए हों ! असलियत यह है कि चिकित्सा विज्ञान को सबसे सुरक्षित रोजगार का माध्यम माना  जाने लगा।  ख़ास तौर पर एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण कर लिया गया जहां चिकित्सक को समाज में काफी सफल किरदार माना जाने लगा।  उन्हें भी ऐसा लगाने लगा वे कुछ  ख़ास ही हैं } और शायद अन्य लोगों का जीवन उनके बिना बिलकुल बेकार ही है।  एक और विडम्बना इस बात को लेकर बनती चली गई जब यह पाया  गया कि उन्हें ख़ास परीक्षा के जरिये ही चिकित्सा कर पाने कि पारंगति विषयक प्रमाणपत्र पाना होगा। 

पैसों का पैमाना

पैसा ही जहां रोजगार और प्रगति का पैमाना हो गया हो वहां किसी भी किरदार का घमंडी हो जाना एक स्वाभाविक सी बात ही समझें।  इसी पैमाने के अंतर्गत चिकित्सक वर्ग खुद को अक्सर समाज के सामान्य जनों से खुद को अलग कर लिया करते होंगे , और उसी भावना के जरिये अन्य सामान्य जनों को स्वीकार करते होंगे।  उन्हें कभी कभी जन रोष का भी सामना जरूर करना पड़ता होगा।  परिस्थिति अगर विपरीत हो जाए तो उन्हें भी रोष का सामना करना ही पड़ता होगा।  बीच बचाव करने के लिए सरकार बहादुर के सिपाही ही शायद उनका ही पक्ष लेकर मैदान में उतरते होंगे।  अब हम उन परिस्थितियों के बारे में सोच पाएं भी या नहीं, जिस परिस्थिति के अंतर्गत मानव अंगों कि तस्करी, यहां तक मुर्दा घर से मुर्दों के गायब हो जाने लायक गंभीर विषय हमारे दृष्टिगोचर कराये जाते हों।  उस परिस्थिति के बारे में सोचकर भी शायद आम जनों को डर लगता होगा।

कभी कभी ऐसा भी लगने लगता है जैसे औषधि  के बिना पूरा जीवन ही बेकार हो गया ; कुछ ऐसे भी मरीज पाए जाएंगे जिनके औषधि  का दैनिक खर्च भोजन के लिए होनेवाले खर्च से कहीं ज्यादा हो जाता है।  कुछ लोग इस बात को लेकर शान भी जताते होंगे जैसे ज्यादा औषधि  लेना शायद अमीरी की  एक पहचान बन गई हो।  आये दिन परिस्थितियां  बदतर होती चली जा रही है।  समग्र समाज दिन प्रतिदिन एक ऐसे दलदल में फंसती चली जा रही है जहां से निकल पाना कभी कभी असंभव सा ही लगाने ागता है।  आये दिन नयी दवा, नए रोग और नयी व्यवस्था से हमारा सामना हो जाता है; अभी अभी समग्र दुनिया को एक विकराल परिस्थिति से काफी प्रयत्न के बाद ही मुक्त करा पाना संभव हो सका।   

व्यक्ति के लिए व्यवस्था

एक और द्विविधा की बात कुछ ऐसी है जब हम यह पता करना चाहते हैं कि आखिर व्यक्ति के लिए व्यवस्था बनायी जाती होगी या फिर व्यवस्था में व्यक्ति को ढलते राणा होगा ? इस शंका का समाधान करने के लिए हमें पहले यह पता लगाना होगा कि क्या सभी नागरिक चिकित्सा सुविधा पाने कि पात्रता रख पाते हैं? क्या उन सभी नागरिकों को सामान रूप से उत्तम चिकित्सा सुविधा मिल पाती होगी; या फिर उनमें से कईयों  को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता होगा।  काफी दिन से यह भी शिकायत मिलती आई कि चिकित्सक अक्सर अस्पताल से बाहर रहकर मरीज देखकर अधिक पैसा कमाने में ज्यादा रूचि रखते आये हैं, न कि अस्पताल में दाखिल मरीजों उत्तम चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करते हुए पाए जाते हैं । व्यक्ति को किसी व्यवस्था के अधीन अगर छोड़ दिया जाए तो उस व्यवस्था को बिखरते हुए भी देखा जाएगा; कुछ लोग विकल्प व्यवस्था बनाने का भी प्रयास करते हुए पाए जाएंगे।  हमारे लिए चिकित्सा विज्ञान का विषय आज कोई नया नहीं; और न ही हम पूरी तरह औषधि विज्ञान की गुलामी करना पसंद करना चाहेंगे।  हमारी सनझ हमें ऐसा करने के लिए शायद ही अनुमति दे ! तकनीक और शल्य चिकित्सा कि अपनी ही कुछ मर्यादा रहती होगी।  हम उस विधान का भी सम्मान करना चाहेंगे जिसके अंतर्गत कई मरीजों को जीवन दान मिल जाता हो।  हम उस विधान को भी पनपते हुए देखना चाहेंगे जहां नयी विधि और नए प्रकल्पों को अनजाम दिया जाता होगा।  पर हर विधान के पीछे एक और मर्यादा कि लकीर संदर्भित हो जायेगी जहां हम विज्ञान और प्रकल्प कि गुलामी नहीं करना  चाहेंगे; बल्कि उन प्रकल्पन और विजान के अनुभवों पर एक कुशल नियंत्रण रखना होगा।

व्यक्ति को अगर किसी व्यवस्था के अधीन रहने के लिए बाध्य किया जाए तब उस स्थिति में हर व्यक्ति तक सुविधा पंहुचा  पाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं; ख़ास करके तब जब कोई भी कार्यकर्ता अपने विधायक कर्म के प्रति एक पैमाने तक समर्पित और कर्तव्यनिष्ठ न हों। व्यवस्था कुछ ऐसी बने जिसके अंतर्गत आम जरूरतों को स्थानिक तौर पर पूरी किया जा सके; छोटी से छोटी जरूरतों  के लिए व्यक्ति को इधर उधर भागना न पड़े।

उत्तम कोटि का विधान

किसी भी हिंसा का दमन करने के लिए और बड़ी हिंसा का सहारा लिया जाना -- यह कोई प्रगति का विज्ञान नहीं।  इसके  जरिये हम कुछ ख़ास हासिल भी नहीं कर पायेंगे और न ही जनता जनार्दन के लिए न्याय का दरवाजा खोल सकेंगे।  नियम कुछ ऐसे बनें जहां हर नागरिक को कुशलता पूर्वक न्याय प्रक्रिया के साथ जोड़ी जा सके और हर मुद्दे का राजनीतिकरण न हो।  किसी मुद्दे का राजनीतिकरण हो रहा है कि नहीं यह देखने के लिए बाहर से शायद कोई आये और हमें दिशा निर्देशित करे।  हमें अपने विवेक से काम लेते हुए अपराध, अपराध करनेवाले तत्व और उन उपद्रवी तत्वों को शरण देनेवालों से सुरक्षित दूरी बनाकर चलना होगा ; यह भी हमें ही तय करना होगा कि हर सस्थान में अपराध दमन विषयक मुद्दों से निपटने के लिए प्रजा संकुल का एक जत्था सक्रिय रहे। सिर्फ इतना ही नहीं उस प्रजा संकुल के जत्थे को सदैव ही राजनीति से दूर रखने का प्रयास होता रहे।  अपने देश में इस बात की  ही विड़म्बना संदर्भित हो रही है कि हर मुद्दे का अक्सर राजनीति करन हो ही जाता है।  मौजूदा परिस्थिति में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है; इन सबसे बचते हुए नागरिक संकुल को आगे बढकर अन्य सभी नागरिकों को भी विश्वास में लेना होगा।  हम यह भी नहीं  मान सकते कि सबके सब राज नेताओं का विवेक पूरी तरह शून्य हो  चूका है, या फिर उनके पास विवेक नाम कि चीज है ही नहीं।  उन्हें भी इस बात का ज्ञान हो ही जाता है कि आखिर नुकसान किसका हो रहा है।  उस नुकसान को कम करने के लिए और क्या करना चाहिए इसके लिए उनके पाने कुछ पैमाने जरूर बन जाते होंगे।  मोटे तौर पर अपराध, भ्रष्टाचार, फरेब , धोखा आदि से किसे लम्बी अवधि का नुकसान झेलना पड़े इसके बारे में भी उनकी अपनी कुछ साझेदारी जरूर बनती होगी।  इन सभी मुद्दों को ध्यान में रखकर भी अपने सभी नागरिक संकुल को और ज्यादा सक्रीय बनाना होगा।   

जनता का चिकित्सक

एक उम्र दराज माता की कथा है; उनके सुबह सुबह के नित्यक्रिया के समय अनायास ही एक मक्षी गन्दगी से उठाकर खुले मुख के जरिये सीधे खाद्य नाली के मुहाने तक जा पहुंचा और उदर  मंडल में जा पहुंचा।  फिर तो कहना ही क्या! जो भी खाये सीधे उलटी कर दे।  कुछ भी पचे ; और भी कई जटिलताओं का तांता लगा।  इस व्याधि ने और भी कई व्याधियों को साथ लाया और फिर कन्नम्मा को कई दवाख़ाना की सैर करा लाया।  सभी कीमती दवा पड़ा ही रहा।  कन्नम्मा को बड़े से बड़े डिग्रीधारी चिकित्सक भी ठीक नहीं कर पाए।  

आधुनिक शिक्षा का धनी उनका परिवार वर्ग किसी भी जादू टोना, झाड़ फूंक, टोटका आदि में भला क्यों भरोसा करने लगा ! आखिर पड़ोस के सबसे निकम्मे चिकित्सक के पास कन्नम्मा को लाया गया।  तबतक तन और धन से उस परिवार से काफी कुछ निचोड़ा जा चूका था।  सभी कागजों एक बण्डल ही बन चूका था। पहले पहल तो कमल डाक्टर के पास वे लोग आना मुनासिब नहीं समझ रहे थे; पर आखिर दम पर तो दांव खेलने जैसा ही समझना होगा जब परिवार वर्ग की गाड़ी कन्नम्मा को लेकर कमल डाक्टर के झोपड़े के पास आकर रुकी।  उस चिकित्सक का विशेष चिकित्सा कक्ष भी एक नीम के पेड़ के नीचे बना है ; वहीँ काफी संख्या में किसान, मजदूर आदि निदान पाने की आश लगाए बैठक लगाया करते हैं। कन्नम्मा की स्थिति  देखते ही कमल डाक्टर तत्पर हो उठे और परिवार वालों से अभय लेने के बाद कन्नम्मा का हाल पूछने पास बैठे।  पूरी बात समझने का प्रयास भी करने लगे।

"कुछ खाना पीना आदि किये हो?"

जबाब बहुत धीरे से आया, शायद ही कोई समझ सके, पर चेहरों पर बानी लकीरें बता रही थी कि कन्नम्मा कुछ खाना ही नहीं चाहती। उसे एक छोटी वाली उलटी कि दवा दी गई और आराम फरमाने के लिए बताकर फिर अन्य मरीजों को देखने के लिए कमल डाक्टर अन्य सब झोपड़ों में बारी बारी से जाने लगे।

आखिर कन्नम्मा को उलटी कराने के लिए बरामदे पर लाया गया ; वहां चिकित्सक महाशय भी आये और उसे बरामदे पर ही उलटी करने के लिए कहा गया।  कमल डाक्टर पहले से एक मक्षी को मारकर हाथ में दबाकर इंतज़ार करते रहे।  उलटी में पानी छोड़कर और निकालता ही क्या! उसके सेहत को निचोड़कर सभी चिकित्सक और पदवी धारी, डिग्रीधारी महानुभव वर्ग पहले ही सब खा पीकर बराबर कर चुके थे।  उसी उलटी को गौर से देखते  हुए कन्नम्मा के नज़रों से बचते हुए मक्षी रानी को उलटी के जगह पर डालकर मिला दिए और फिर धीरे से एक कांटे के सहारे उठाते हुए कन्नम्मा के पास लाकर पूछने लगे , "क्या यही वो मक्षी है?"

कन्नम्मा कुछ बोल पाने लायक दम भी नहीं भर पा रही थी, सिर्फ सर हिलाकर उनकी बातों को सत्यापित कर पाई ; बस और क्या कहना! एक घंटे बाद ही कन्नम्मा कुछ खाने के लिए माँगने लगी।  उसे एक नरम भोजन का कौर दिया गया।  खाना शुरू करके चार पांच घंटे में ही घर वापस जाने के लिए अनुमति माँगने लगी;  उसे भूख भी लगाने लगी। 

परिवार के लोग कमल डाक्टर के करामात को बड़ी बड़ी आँखों से देख रहे थे।  अब शायद डाक्टर एक मोटी रकम मांग बैठेगा; सबके चहरे भी उतर चुके थे।  पर कमल तो कमल और कोमल भी थे; कहे, "अस्सी रुपये जमा कर दो, वो भी काली माता के विग्रह के पास रखे डब्बी में ही डाल देना, घर जाकर कन्नम्मा को खिलाना पिलाना; थोड़ा जतन लेना, अब वो ठीक हो जायेगी। "

ऐसा आश्वासन लेते हुए और विग्रह को प्रणाम करते हुए परिवार वर्ग के लोग कन्नम्मा को कमल डाक्टर के चिकित्सा पड़ाव से घर की और बढ़ते चले

  

 

 

 

कालिंदी और नागदेवता

 

एक आश्रम संस्था के प्रमुख थे ; उनको लोग स्वामी बुद्धानन्द कहा करते थे।  उनकी गाड़ी झाड़खंड और ओडिशा की सीमा पर बसे एक जंगल के बीच से गुजर रहा था।  उसी जगह कुछ ऐसे जनजाति बसे थे जिनका कोई स्थायी ठिकाना ही नहीं था; ही हम उन्हें किसी जगह पर स्थायी रूप से बसते हुए देख ही पा रहे थे। ऐसे ही एक स्थानांतरण के मुहूर्त में उसी रास्ते से स्वामीजी और उनके कुछ साथी गुजर रहे थे, जबकि एक जनजाति महिला दर्द से कराह रही थी।  जैसे ही सन्यासी महाराज का काफिला रुका वैसे ही अन्य सभी जनजाति के लोग वो जगह चढ़कर और उस पीड़िता को भी छोड़कर चल दिए; आखिर उस पीड़िता का इलाज करने के लिए चिकित्सकों को उतारा गया; भोजन की व्यवस्था की गई; कुछ भोजन वहीँ छोड़कर वो लोग चले गए।  से पहुंचाने का यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा ताकि बिरहोड़ समुदाय के उस जनजाति का विशवास जीता जा सके।  स्वामी बुद्धानन्द और उनके साथी सम्प्रदाय को छोड़कर अन्य किसी सम्प्रदाय को उस जनजाति का विशवास जीतने में सफलता नहीं मिली। 

उसी जनजाति के नजदीक एक कालिंदी टोला भी था जहां नागदेवता को पकड़ने और बेचने के व्यवसाय से जुड़ा एक कालिंदी बूढ़ा भी रहता था।  एकदिन आश्रम के लोगों के साथ काम में हाथ लगाते हुए खंडहर से निकलनेवाले एक नागदेवता को पकड़ने के लिए उसी कालिंदी बूढ़ा को बुलावा भेजा गया।  उसने ख़ुशी ख़ुशी उस नागदेवता को अपने पास रखी टोकर में डाल दिया।

"इस नागदेवता का क्या करोगे?" स्वामीजी का सहज ही पूछना था ।

"पहले तो दांत निकालना होगा, स्वामीजी", कालिंदी "दांत" शब्द पर कुछ ज्यादा ही बल देकर अपने मन की बात कह रहा था ; और भी काफी कुछ कहा।

"ऐसा क्या किया जाय, जिसके करने पर इसे तुम गहन वन में जाकर छोड़ दोगे?"

यह तो उस कालिंदी के लिए काफी कठिन एक विषय बन गया। मन ही मन सोचा इस संत महात्मा से भी क्या कुछ लेना उचित होगा! पर उसे पैसा टी चाहिए, और फिर यह जो उसका व्यवसाय ठहरा!

ज्यादे देर तक कालिंदी को चुप्पी साढ़े देख महाराज समझ गए कि इसे कुछ बड़े रकम की उम्मीद रही होगी और उसके माँगने में भी कुंठा हो रही होगी।  वो स्वयं ही उनके पिछले महीने के संग्रह में से आधी जे ज्यादे की रकम निकालकर कालिंदी को देने के लिए कहे और यह बोलकर गए कि नागदेवता को कुछ गभीर वन में जाकर प्रकृति की गोद में छोड़ दिया जाय; नैसर्गिक रूप से उसे जो जहर की झोली और विषदंत जैसे मिला होगा उसे भी चढ़ दिया जाय।

पैसों में रखा ही क्या है! भक्तों के पास जाने से और अनुभव कथन कहने से फिर दान मिलाने की संभावना जरूर बनेगी।  सामने चलनेवाला वीर सन्यासी भला तूफ़ान से और जोखिमों से कभी घबराया है, ता फिर आगे कभी घबराएगा ! नागवता को सिर्फ इसलिए भी कैद में रखना उन्हें मंजूर नहीं था को वो जहरीलेल हैं, अनायास ही अन्य जीवों का नाश भी कर देते हैं; नैसर्गिक रूप से मिले विष से वो शिकार भी करते होंगे, भोज्य को भी मौत के घात उतारते होंगे और वैसे प्राणी की जनसंख्या को भी नियंत्रण में भी रखते होंगे; यह तत्व कालिंदी के समझ से परे रहा होगा, पर स्वामीजी भली भाँती समझ रहे थे; स्वामीजी प्राण संचार और संहार वृत्ति का विषय भी समझ रहे थे जिसमे अनाधिकार हस्ताक्षिओ कर दिन मनुष्य का धर्म नहीं माना जाता; अतः ऐसा अधर्म करने की वृत्ति से स्वामीजी ने उस कालिंदी को रोका।  .