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शंखनाद

आज हमें यह सोचने में भी शायद कुछ अलग ही लगता होगा जब हम एक जानकारी पाते हैं कि युद्ध शुरू होने से पहले शंखनाद से कुरुक्षेत्र की धरती को पवित्र किया गया था; पितामह, गुरुदेव, सभी भ्राता, प्रमुख  योद्धा और स्वयं जगदीश्वर भी अपने अपने शंख साथ में लाये थे; उन सभी शंखनाद से सुर, असुर, राजा, सेनानायक, राठी, महारथी और स्वयं जगदीश भी युद्ध क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का भान कराते रहे। 

शंखनाद से ही सभी कर्मकांड शुरू करने की बात और उसी शंखनाद से कर्मकांड समाप्प्त करने की बात हमारी जानकारी में आयी जरूर; पर रण क्षेत्र   में  अगर वैसी परिस्थिति का निर्माण हो तब हमें फिर से उस कर्म काण्ड के बारे में विचार करना होगा जिसमे युद्ध को भी शंखनाद से शुरू करने के बारे में और सूर्यास्त के बाद इस रण को फिर से शंखनाद के जरिये समाप्त कर देने की बात कही जाती हो। आधुनिक युग का युद्ध है ही निराला; कहीं कहीं पर अंधकार का सहारा लेकर , छिपकर , शत्रु को कोई मौका न देते हुए आक्रमण कर दिए  जाते होंगे; तो कहीं सूचना जाल का सहारा लेकर मशीनें खराब कर दिए जाते होंगे; और फिर कहीं पूरी दुनिया को चार पांचबार विनष्ट कर देने की योजना बन रही होगी; योजना बनाने वालों को शायद ही इस बात की जानकारी रही होगी कि  संसार विनष्ट होने के बाद फिर किसी भी मनुष्य के लिए धरती पर स्थान नहीं बन पायेगा; संसार के रचना तंत्र के साथ खेलने का अर्थ हुआ विनाश लीला शुरू करने के लिए जगदीश्वर श्री हरि को शंखनाद करने के लिए मजबूर कर देना।

हमें जगदीश्वर के शंखनाद के विपरीत चलने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए; वैसी पात्रता भी किसी मनुष्य को नहीं मिली; सूर्य से ऊर्जा लेकर उसी के सहारे भोजन बनाकर अन्य सभी जीव का पोषण करने की जिम्मेदारी; प्रकृति में संतुलन बनाये रखने की जिम्मेदारी जिस भाँती जिस जीव को मिली होगी उसे वैसा ही करते रहना होगा; शंखनाद करके शिकारी कभी भी शिकार पर झपट्टा नहीं मार पायेगा; या फिर किसी अपराधी को पकड़ते समय किसी दरोगा को शायद ही हम शंखनाद करते हुए देख पाए!

कुरुक्षेत्र में शंखाबाद के जरिये मानसिक और बौद्धिक संघर्ष की सूचना हो जाने के बाद दोनों पक्षों  की सेना में व्यूह रचना की ओर नजर डालने का मौका मिला; आधुनिक युग में शंखनाद के जरिये युद्ध शुरू करने की बात को  बेमानी मान लेने को हम जल्दबाजी ही मानेंगे; शंखनाद के पैमाने और तरीके भले ही बदल गए होंगे पर अभी भी युद्ध के पहले   अखबार के जरिये, प्रचार नाध्याम के जरिये, पत्राचार, सभाएं और सेना स्थानान्तरित करने के जरिये युद्ध का शंखनाद ही होता है।  सेनानायकों के आपसी मेल मिलाप को भी हम शंखनाद ही मानेंगे।  इतिहास साक्षी है कि अपने देश में संघर्ष और नरसंहार रोकने के लिए शंखनाद किये गए थे; भले ही उस शंखनाद के बाद हमें शंखनाद करनेवाले सैनिक के जीवन पर संकट का बादल धूमायित होते हुए देखना पड़ा; और फिर उन्हें हमसे दूर कर देने का प्रयास भी किया गया; सभ्य जनजाति को सभ्यता की शिक्षा देने के क्रम में भी शंखनाद करनेवाले सेनानायकों की जानें संकट में आयी; उनके ऊपर हथियार का प्रयोग करनेवालों को शायद इस बात का अनुमान भी न रहा होगा कि शरीर छुड़ा लेने से किसी जननायक को जनता जनार्दन के ह्रदय से दूर नहीं किया जायेगा; ऐसा कर पाने के बारे में सोचनेवाले भी बुद्धि से कमजोर ही माने जाएंगे।

युद्ध को कभी हमने शुरू होते हुए जरूर देखा होगा; पर इसकी समाप्ति की ओर संसार को एकरूप होते हुए आज तक नहीं देख पाए।  युद्ध संस्कृति का जो भयानक परिणाम रहता होगा उसे देखकर इतिहास से सीख लेनेवालों की संख्या भी कई होंगे; पर वैसा लड्डू किस काम का जो हमेशा हमेशा के लिए एक डब्बे में ही रख  दिया जाय? हमें ऐसे अग्रज की तलाश हमेशा से रही जो जनता जनार्दन के ह्रदय सम्राट बन पाएंगे; अपने यहां भी ऐसे महात्मा आये जिन्हें ह्रदय सम्राट बनते हुए भी हमने देखा; और फिर उन्हें हम  सही प्रकार से समझ ही नहीं पाए।  शास्त्र में भी कुछ ऐसी ही मान्यता बन रही है कि जगदीश्वर श्री हरि के सही स्वरुप को हम शायद ही ठीक से समझ पाएं! आखिर सागर की गहराई के बारे में जानकारी पाने के उद्देश्य से निकलनेवाले नमक के पुतले को कभी न कभी पिघलना तो पड़ेगा; उसके बाद यह फिर कोई माने नहीं रखता कि जगदीश्वर के शंखनाद से सृजन का निर्देश मिला या विनाश की लीला रची गई!

हम उस अवसर की बंभीरता के बारे में सिर्फ कल्पना कर पाएंगे जब सभी रथी महारथी योद्धा के शंखनाद से कुरुक्षेत्र की भूमि को प्रकम्पित किया गया होगा; उसके बाद फिर श्रीहरि के पांचजन्य की भी बारी आयी होगी; पर श्रीहरि के शंखनाद के जरिये प्रसारित की जानेवाली विनाशलीला को शायद ही कोई पक्ष के महारथी ठीक से समझ पाए होंगे; अगर समझ पाते तो फिर श्रीमद्भागवद्गीता में एक ही अध्याय रहता और सव्यसाची के आसपास अन्य सेनानायकों की कतार लग जाती; क्यूंकि उस परिस्थिति में उन सभी को श्रीहरि के पास रचनाधर्मिता का और आध्यात्मिक चेतना का गुप्त मन्त्र जो लेना था ! पर ऐसी परिस्थिति बनते हुए हम नहीं देख पाए। परिणाम हम सबके सामने है; युद्ध शुरू हो जाने के बाद एक योद्धा के मन में युद्ध के भीषण परिणाम के बारे में सोच विचार पनपे, और फिर उसे अगर ऐसा लगने लगे कि युद्ध न करते हुए अरण्य जीवन स्वीकार कर लेना श्रेय होगा  तो फिर हमें खुश होना चाहिए! पर इस बात को जानकार श्रीहरि काफी नाराज हो गए और उस भावना को एक योद्धा के ह्रदय में पनपनेवाली कायरता, कमजोरी, अज्ञान और हीन भावना कह दिया।   वस्तुतः रण भूमि का बीच का क्षेत्र किसी भी योद्धा के लिए शांति, अहिंसा और संतोष की बात करने के लिए स्थान, काल  या फिर पात्रता  के मापदंड से उपयुक्त स्थल नहीं मान  पाएंगे ; जगदीश्वर भी ऐसा नहीं मान पाए; इस प्रयास को उन्होंने स्वधर्म के निमित्त से भी गलता बताया ।  इसी लिए श्री हरि उस योद्धा को युद्ध करने के लिए बताते रहे।

…… (विषाद योग शीर्षक पुस्तक से ; प्रस्तुति: चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता)

 

सेवा का भाव

 

अपने देश में सेवा भाव से काम करनेवाली संस्थाओं की कमी नहीं है | उस संस्थाओं को देश विदेश से सेवा कार्य और ग़रीब कल्याण के नाम से पैसे भी मिल जाते हैं | इस प्रकार से सेवा करने के लिए बनी संस्थाओं की गतिविधि चलती चली रही है | उसी संस्था के आस पास समान विचारधारा वाले और समरूप तत्वज्ञान से प्रबुद्ध होकर कार्य करनेवालों का जमावड़ा भी होता रहा है | जब कोई व्यक्ति किसी दरिद्र व्यक्ति तक आसानी सा पहुँचना चाहे तो भी इन सेवा भावी संस्थानों के ज़रिए पहुँचने का प्रयास किया जाता है ताकि दान को महिमा मंडित किया जा सके और उस सेवा भाव का मूल मकसद सध सके |

आचार्य छाणक्य कहा करते थे कि सत्य अगर कड़वा हो और अप्रिय हो तो कहा जाय | पर सत्य को अगर हम इश्वर मान लें तो असत्य कहना या सत्य को छिपाने के लिए गोल मटोल बातें करना भी कहाँ तक मानी हो सकेगा !

ध्येय से भटकाव

संस्थाओं के बनने की प्रक्रिया में कई ध्येय को सामने रखा जाता है और उस ध्येय को पाने के लिए संस्था की गतिविधियाँ बनाई जाती है | अगर ध्येय की प्राप्ति हो गई या फिर गतिविधियों को चलाने के लिए कोई माध्यम बचा हो तो संस्था का निष्क्रिय होना स्वाभाविक है | उस परिस्थितीई में संस्था को कुछ ऐसे तट का चुनाव करना होता है जहाँ से विकास कार्य में लगे लोगों की उदार पूर्ति का काम चलता रहे | यह विषय सभी संस्थाओं के लिए सत्य नहीं भी हो सकता; जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसा विषय निरंतर ही चलनेवाला है ; किसी ख़ास तत्व को ध्यान में रखकर नागरिकों का प्रबोधन, भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोलना और धर्माचरण से नागरिकों को जोड़ना आदि विषय नित्य जीवन का अंग है | अतः ऐसे विषयों से जुड़ी संस्थाओं की अहमियत भी सदा के लिए रहने ही वाली है | प्रश्न उन संस्थाओं के बारे में निर्माण होता है जिन्हें ग़रीबी उन्मूलन का बीड़ा उठाते हुए जनता जनार्दन तक पहुँचना है और ग़रीब कल्याण योजनाओं के ज़रिए राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका अदा करना है |

ग़रीबी उन्मूलन अगर किसी संस्था का ध्येय हो सकता तो सरकार बहादुर का भी यही ध्येय है और उनका प्रयास भी यही है कि ग़रीब नागरिक के ग़रीबी से ग्रसित होना का सही कारण पता करते हुए उसे उस ग़रीबी के जाता जाल से छुड़ा सके |

संवेदनशीलता

पुराण और वेदों में ऐसे काफ़ी उदाहरण मिलते हैं जिसके ज़रिए हम एक सम्राट और एक नागरिक के संवेदनशीलता को समझ सकें | एकबार भक्त सुदामा के परिवार वर्ग ने सुझाया कि उनके मित्र श्री कृष्ण कन्हैया सम्राट बन चुके , अब तो सुदामा को इस अवसर का भरपूर लाभ उठाते हुए अपनी ग़रीबी दूर कर लेनी चाहिए ! पर सुदामा के मन में कुछ संकोच था; जिस मित्र को एक मुट्ठी चावल की भुजिया नहीं दे पाए थे उसी मित्र से कुछ कैसे माँगा जाय ! और फिर मित्र भला किसी मित्र से कहाँ कुछ माँगता है ! मित्र से सिर्फ़ मैत्री का ही संबंध रहता है | उस मैत्री के संबंध में स्वार्थ का आना उचित नहीं है और ऐसा करना भी नहीं चाहिए |

काफ़ी अनुनय विनय करने के बाद सुदामा मान तो गये पर उनके मन में किसी और कारण से आनंद और हर्ष का बाढ़ आया ; काफ़ी लंबी अवधि के बाद उन्हें अपने मित्र से मिलने का मौका मिलेगा और इस मौके को सुअवसर में बदलते हुए सुदामा वही भेंट लेकर निकल पड़े आश्रम प्रवास के समय जो कृष्ण के माँगने पर भी नहीं दे पाए थे | उस कारण से बने आत्म ग्लानि को धो डालने का समय आया है यह जानकार भी सुदामा हर्षित हो रहे थे |

गिरिधारी का मित्र वह भी ऐसी दशा में ! विश्वास भला किसे हो पाता , अतः सैनिकों का भ्रमित होना भी जायज़ था | सुदामा को कृष्ण के सिंह द्वार पर ही रोका गया | अंदर जानकारी भेजी गई, और फिर क्या;  गिरिधारी अपने उस मित्र को गले लगाने के लिए दौर पड़े और अपने परिषदों को अचंभे में डाल दिया | उस मित्र को अपने ही आसन पर बिठाया और दोनों का प्रेम संवाद फिर देखते ही बन रहा था |

त्रिवेणी

आ मदालसा बुआ और पूज्य भाया के मिमित्त से मेरा वर्धा प्रवास और साथी संस्थाओं से संपर्क सं १९९५ से जारी है।  उत्तर बुनियादी के अभ्यास , शिक्षा शोध और जल, जंगल जमीन विषयक अध्ययन के निमित्त से भी संस्थाओं और कुछ सरकारी संघों के साथ रिश्ते बने।  वर्धा प्रवास उन सभी संबंधों का केंद्रीय पक्ष है। 

पूज्य भाया और मदालसा बुआ के साथ जुड़े रहने का एक बड़ा सन्दर्भ उस त्रिवेणी से है जो पूज्य जमनालालजी, पूज्य बापू और आचार्य विनोबा के कारण बना।  श्री जमनालालजी पर यह जिम्मेदारी दी गई थी की क्रांतिकारी परिवारों को मदद पहुंचाएं और उनके बहु बेटियों को संरक्षण दें; जो कि उनहोंने बखूबी निभाया।  उसी निमित्त से वो कई बंगाली परिवार में भी आते रहे और प्रत्यक्ष रूप से मदद भी पहुंचाया।  बचपन से हमें यही सिखाया गया कि पूज्य भाया और मदालसा बुआ अपने हैं; उनसे हमारा गहरा रिश्ता है। गिने चुने साथी संस्था को तकनीकी मदद पहुंचाने के क्रम में अन्य कई संस्था से भी सम्बन्ध जुड़ गया।  वह सिलसिला आज भी जारी है।  मेरी और से किसी भी संस्था से समर्थन या सहयोग पहुंचाने का क्रम बंद नहीं किया गया।  जहां दिशा और पैमाने बदल जाते हैं वहाँ कुछ हद तक दूरियां बन जातीं हैं।  

सहज रूप से मैं आचार्य विनोबा को आधुनिक संत मानता हूँ और यह भी महसूस करता हूँ कि उनके बताये लोक नीति और लोक व्यवस्था के अद्घार पर किसी भी संस्था संघ को सक्षम बनाया जा सकता; वह फिर अपना देश भारत या फिर विश्व जगत ही क्यों न हो।  अगर सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि जनता जनार्दन का सबसे बड़ा हिस्सा ऐसा ही जी जय श्री राम या जय रावण खुलकर नहीं बोलता; वो सिर्फ जय ही, जय हो बोलते हैं और जिस तरफ पल्ला झुका उस तरफ झुक जाते हैं।  कभी सिकंदर विश्व जय करने निकले थे और भारत में जब उनका अभियान चल रहा था तब कुछ ऐसे संत मिले जो अपने लिए दिध गज की जमीन नाप रहे थे।  उनसे इसका कारण पूछ गया तो उनहोंने कहा कि सिर्फ उसी जमीन से उनका वास्ता होनेवाला है; वो भी कुछ पल के लिए , उसके बाद वो भी मिट जाएगा।  उनमे से एक संत ने सिकंदर को कहा, "राज्य जय करके तुम्हारा सिंहासन पर बैठना संभव ही नहीं ही पायेगा, उसके पहले तुम्हने तुम्हारा शरीर त्यागना होगा और तुम्हारा भी उस डेढ़ गज जमीन से ही वास्ता होनेवाला है। "

सिकंदर ने फिर अपने साथियों से कहा, "इस प्रकार के संतों क न तो प्रतिष्ठा कि लालसा है और न ही धन और भूमि का प्रयोजन, उन्हें सिर्फ लोक हितार्थ काम करते रहना है।  अगर कोई इन महात्माओं का विश्वास जीत लिया तो वह भारत भूमि पर राज करेगा। "

भारत के इतिहास में शायद ही ऐसा कोई पल आया हो जब्ब उसके शाशकों ने किसी पर हमले किये हों, या फिर किसी देश को लूटा हो ; ार अत्याचार सहने और मुसीबतें झेलने की परमार सी चली आ रही है।  गुलामी के क्रम में एक बड़ा मोड़ तब आ गया जब बम्बई के एक अंग्रेज अफसर एल्फिंस्टन ने अपने सम्राट से पत्राचार करते हुए भारत को हमेशा के लिए गुलाम बनाने का मसौदा लिख डाला, "संस्कृति किसी भी सम्प्रदाय की रीढ़ की हड्डी होती है।  अगर हम उस सम्प्रदाय को गुलाम बनाना चाहते हों टी हमें उस हड्डी में विकार लाना हगा।  अंग्रेजी सीखा देने से भारत के सम्प्रदाय में विकार आ जाएगा और ये गुलामी करने के आदि हो जाएंगे।  इसके लिए उन्हें मयबोध से अलग हटाकर सिर्फ भाषा, गणित और कुछ वयवहार सिखाना होगा।  वो अपनी संस्कृति से काट जाएंगे और अंग्रेजी संस्कृति से जुड़ जाएंगे।  फिर यह माने नहीं रखता कि हम भारत में हैं या नहीं; भारत के लॉग सदियों के लिए अंग्रेजियत कि गुलामी करते रहेंगे । "

 इस बात का संकेत भारत के मनीषियों को मिल चूका था।  इसे रोकने के लिए सबसे ठोस कदम उस त्रिवेणी ने उठाया जिसका जिक्र पहले किया जा चूका है।  नै तालीम को अमली जामा पहनाने का काम और रचना कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर लग जाने कार्यक्रम उसी दिशा में किया जानेवाला पहल था।  स्वतंत्र भारत में फिर संस्था संघ के पैमाने और दिशा बदलते गए और उस त्रिवेणी से निकले स्वराज और स्वावलम्बन कि धरा को कहीं खो जाते हुए देखा गया।  लोक सेवक और उन सेवकों के संघ कि बात तो अछूती रही; कुछ और ही सेवक संघ बनाते रहे और जनता जनार्दन के अरमाँण को बारी बारी से कुचला जाने लगा।

आचार्य विनोबा यह भी समझ चुके थे कि जान, जार और जमीन क लेकर संघर्ष की स्थिति बन सकती है।  इसलिए उनहोंने सभी कार्यकर्ताओं को भूदान यजन में लगाया और खुद भी कूद पड़े।  आज भी हमें इतना तो विश्वास है ही कि किसी भी प्रकार की उन्मत्तता से जनता जनार्दन क मुक्त करने का काम उस त्रिवेणी के kund से ही किया जा सकेगा।  इतना जरूर है कि सूचना तंत्र के युग में उस तत्व कि गहराई में उतरकर हमें संघबद्ध होकर काम करना होगा।  संघबद्ध होने का पहला सिद्धांत यही है कि हम सभी भेद बुद्ध से ऊपर उठकर लामबंद ह सकें और समस्याओं से उभरने का प्रयास करें।

कई बार ऐसा लगता था कि मदालसा बुआ और भाया के गुजर जाने के साथ साथ मेरा शायद वर्धा प्रवास छूटेगा; पर प्रेम सम्बन्ध इतना गहरा  था कि उस प्रेम सम्बन्ध को शायद इस jeevan में खंडित नहीं किया जा सकेगा।  विश्वास और विश्वसनीयता के यही पैमाने हैं जिसके आधार पर हम संघबद्ध होने का प्रयास करते हैं; फिर भौतिक दूरी बेमानी हो जाती है।  बाबा विनोबा में एक हुनर तो था कि वो हर व्यक्ति से काम ले लेते थे; उनहोंने डाकुओं से भी हथियार डलवाया और उन्हें समाज कि मुख्य धरा में मिवाया; श्री जमनालालजी उस सरस्वती धरा कि भाँति बिना  थके कार्य करते रहे। 

क्रान्ति वीरों के परिवार के साथ एक और परेशानी ऐसी थी कि उनके बच्चों को स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाटा था।  उन बच्चों को उठाकर आना, बुनियादी शिक्षा से शिक्षित करना होनहार बनाना, यह भी उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी रही।  इन यादों को ताजा होते हुए तब महसूस करता हूँ जब ब्रह्म विद्या मंदिर में दाखिल हो जाता हूँ और वाहन बेस वरिष्ठ जनों से बातचीत करने लग जाता हूँ।  मेरे लिए यह गर्व का ही विषय है कि उस तत्व सममान के वातावरण में मैं पला बढ़ा और वही संस्कृति मुझे विरासत में मिल गई। देश में उन्मत्तता और माहौल का बिगड़ाव देखने से पीड़ा होती है और अपने शोधार्थी स्वभाव के कारण विविध प्रकार से समाधान सूत्र निकालने के लिए मन बेचैन हो उठता है।  कुछ संस्था संघ से मुझे कुछ उम्मीदें तो हैं; पर उनकी मर्यादा और सीमा को समझते हुए मैं इसे जाहिर नहीं कर सकता।  कहते हैं अर्थ ही अनर्थ का मूल है , इस बात को सत्यापित करते हुए संस्था संघों में भी भटकाव देखा जा रहा है; उनके कई इकाइयों के पैमाने और दिशा बदल भी रही है।  इन सबको जोड़ने का विज्ञान भी तत्व कि गहराई में ही निहित है।  गीता में भी श्री कृष्ण आखिर में अर्जुन से कहते हैं, "यजन, दान और तप त्यागने योग्य नहीं हैं; इसका अनुपालन तो सबको करना चाहिए ।"

मानव का जीवन मात्र ही किसी न किसी उद्देश्य को पूरा करने के निमित्त हुए हम महसूस कर सकेंगे; किसी भी रोजगार (या जिसे हम जीविका उपपार्जन के लिए किया जानेवाला वृत्ति कहते होंगे) व्यक्ति का लगे रहना एक नैसर्गिक विधान ही मन लेना होगा।

"मैं कर्म नहीं करता, मैं ज्ञान मार्ग का उपासक हूँ, मैं व्यक्ति जीवन से संन्यास ले चूका; मेरे लिए कोई कर्म शेष ही नहीं रहता; मैं कर्म के बंधन से मुक्त होकर दिव्य जीवन का पथिक बन चूका हूँ; आदि कहनेवाले किसी भ्रम में रहकर कर्म विमुखता का प्रदर्शन करते होंगे।  महर्षि वेदव्यास स्थान स्थान पर कई बार श्री भगवान के जरिये इसी बात का स्पष्टीकरण करते हुए बार बार  कर्मी, ज्ञानी और भक्त को जीवन पर्यन्त कर्म में जुड़े रहने की शिक्षा देते आये।  उस तत्व पर लम्बी लम्बी व्याख्यान लिहनेवाले संत महात्मा भी "उस यज्ञार्थ कर्म"; "ज्ञानाग्नि दग्ध कर्म"; विधायक कर्म; नित्य कर्म ; आदि विषयों पर अपने अभिमत देते हुए; और ऐसा भी कहते आये कि साधक, भक्त, ज्ञानी, प्रजा पालक आदि सभी जीव के लिए नित्य और विधायक कर्म में लगे रहना ही होगा।

इस विषय को अधिक स्पष्ट करते हुए हम दैनिक जीवन से कुछ उदाहरण जरूर ले सकेंगे।

गुजरात के किसी गांव में जाकर एक युवा सन्यासी दिनभर व्याख्यान देते रहे; उनके पास शंकाएं और व्यक्तिगत समस्या लेकर आनेवालों की कतार लगी रही।  ऐसा करते करते दिन बीता।  संध्या के समय जहां उनके लिए रात्रि वास की व्यवस्थ की गई वहाँ भी कुछ श्रीमंत लोग आते रहे, चर्चाएं चलती रही; ज्ञान की गंगा भी बही।  अंततः देखा गया एक महाशय चुप्पी साधे कमरे के एक कोने में काफी देर बैठे रहे।   

महाराज जी को लगा उस आगंतुक को भी कोई समस्या रही होगी; सबके सामने शायद नहीं कह पा रहे हैं ; फिर पूछे, "सब तो चले गए! तुम्हें कोई तकलीफ है तो कह सकोगे। "

"तकलीफ?"

"यहां तो सभी आगंतुक तकलीफें और शंकाएं लेकर ही आते रहे!"

"हाँ, वैसे मुझे भी एक तकलीफ तो है। सब तो गए, अब आपके भोजन की क्या व्यवस्था होगी? मैं तो ठहरा हरिजन, आपको पका हुआ भोजन लाकर दे भी नहीं सकता; और आपको इस तरह भूखा छोड़कर जा भी नहीं सकत। "

युवा सन्यासी इस भूमिका में किसी अनपढ़ ग्रामीण को देख पाने के लिए मानसिक रूप से तैयार न थे; इसलिए उन्हें कुछ अजीब ही लगा।  वो शास्त्र के जानकार थे, संन्यास के मार्ग पर नए थे; गीता का ज्ञान उन्हें भी था; पर भूमियकायें बांधकर खुद को श्रेष्ठ मानने लगे थे।  अतः किसी ग्रामीण, और ऊपर से हरिजन में, इस प्रकार की परिपक्वता उनके अहंकार के तिनकों को हटा दिया; आँखे आंसू से भरा; यह सोचने लगे इस हरिजन ने उनके पिता का काम कर दिया ; सभी ज्ञानी, तत्व वेत्ता पंडितों को लज्जित भी कर दिया।

"हरिजन हुए तो क्या हुआ तुम ही पकाकर ला दो !"

"लोग क्या कहेंगे! मेरे हाथ से खाने से आपको भी लोग कोसेंगे; आपकी जात भी चली जायेगी; ऊपर से ठहरे महंत ! "

"अब तो तुम्हारे हाथ से ही भोजन लेना होगा; नहीं तो एक्डिन में क्या होगा, भूखा ही सो जाऊंगा। "

अंततः उस हरिजन के जरिये ही भोजन की व्यवस्था की गई , वही खाकर युवा सन्यासी सो गए। यहाँ आगंतुक हरिजन अपने वैयक्तिक गुणधर्म के आधार पर युवा सन्यासी के लिए भोजन का इंतजाम किया किसी स्वार्थ की भावना से ग्रसित न होकर यज्ञार्थ कर्म के नियमों के अधीन ही युवा सन्यासी की सेवा में बैठा रहा, अपनी भूमिका आने तक धीरज के साथ बैठा रहा।

गीता  à त्यागी

कभी एक देवस्थान में पुजारीजी के दरबार में कुछ साधक, महात्मा, तत्ववेत्ता धर्म दर्शन विषय पर चर्चा करने बैठे; चर्चा भी लम्बी चली; सब अपने अपने अध्ययन  और हुनर के बारे में लम्बी व्याख्यान देने लगे।  आखिर पुजारी जी की बारी आयी।  उनसे पुछा गया कि गीता पढ़ना क्या सबके लिए जरूरी है?  उनहोंने (पुजारीजी ने) उस प्रश्न पूछने वाले माशय से कहा, "जरा जल्दी जल्दी गीता, गीता……….  कहकर बताओ!"

जिज्ञासु महाशय जल्दी जल्दी कहने लगे, "गीता, गीता, गीतागीतागी ……. त्यागी, त्यागी…………. "

"अब तो तुम त्यागी, त्यागी, त्याग………..  ऐसा कहने लगे! बस, अगर तुम त्यागी का सही मतलब समझ गए तब तो गीता पढ़ना जरूरी नहीं ! "

पुजारी जी का यह भी कहना था, "जब शरीर ही हमारा नहीं तब घमंड कैसा, और मेरा मेरा; मैं करूँ , मैं करूँ इस बात को लेकर झगड़े क्यों?"

गीता और अन्य सभी शास्त्रों में इसी बात को बारी बारी से, कथा और कहानी के जरिये भी वही एक बात को ही बार बार कहा गया ; जो समझ जाते होंगे, उनके लिए ज्यादा पढ़ना फिर जरूरी नहीं रह जाता। भक्त का विश्वास, ज्ञानी का ज्ञान और साधक कि साधना  ; ये सब ईश्वर द्वारा निर्देशित कर्म को करने के लिए ही होना होगा।  असली सुख तो खुद के खो जाने में ही है। ज्ञान कि अपनी एक सीमा भले ही होता हो, पर असल में तो वह असीम ही है, जिसे पूरी तरह कभी आत्मसात नहीं किया जा सकेगा; जो ऐसा मानते होंगे उनके प्रति हम सबके मन में करुणा ही रहेगी।

नमक का पुतला

कभी बड़े  बड़े  विद्वान्  मंदिर के महंत जी का हुनर विषयक जानकारी लेने के निमित्त से मंदिर परिसर में आ गए।  उन सबकी एक ही शिकायत थी कि पुजारी जी विधिपूर्वक पूजा का अनुष्ठान नहीं करते; यहां तक कि भगवान को जूठा भी खिला दिया करते हैं।  सबको भगवान का दर्शन कराने की बात भी करते  होंगे।  अतः शास्त्र, वेद, कर्मकाण्ड विषयक उनके हुनर की परीक्षा लेना जरूरी समझा जाय।  अनुमति भी मिली, परीक्षा, सवाल-जबाब का दिन भी तय हुआ और सबके सब महानुभाव उस कक्ष की और चल दिए जहां पुजारी जी रहते थे।  उनके साथ कुछ और भक्तों का रहना-खाना चलता था; सबके सब घबराये, सिर्फ पुजारीजी के चेहरों पर चिंता की एक भी लकीर न थी; पहले की भाँती बिलकुल "साद प्रसन्न"। 

परीक्षक वर्ग अपना- अपना परिचय देते रहे; उसी में काफी समय बीता; प्रश्न पूछने का सिलसिला कहलाने ही वाला था, इतने में पुजारीजी सबको रोककर अपनी एक छोटी सी बात कहने लगे, "देखो भाइयों, एकबार नमक का एक पुतला सागर नापने निकला , उसकी घर वापसी न हो सकी ! अब मुझे कुछ और न कहना; आप सब सवाल पूछ सकेंगे। "

आनेवालों में कानाफूसी होने लगी,"यह वेदांत सार है! इसका अर्थ यही लगाया जा सकेगा, किपुजारीजी को भागवत, पुराण, वेद, उपनिषद्, गीता का सम्यक ज्ञान रह भी सकता है ; शायद वो ईश्वर के साथ एकरूप हो गए होंगे, इसी लिए उनके लिए कर्मकांड आदि बेमानी लगते होंगे। "

काफी देर तक चुप्पी लगी रही; सबको अपने अपने आधे अधूरे ज्ञान के बारे में चिंता होने लगी; पोल खुल जाने कि पीड़ा भी सताने लगी; प्रश्न पूछने के लिए “पहले आप, पहले आप…..” का सिलसिला चल पड़ा।  आगे आये भी तो कौन! कोई छोटा पुतला तो कोई कुछ बड़ा; समुद्र नापने के निमित्त से पीड़ा सबको ही होनेवाली; सबको बिखरना भी होगा, मिटाना भी होगा और एकरूप भी होना होगा।  अंततः मजबूरी में ही समझें, प्रश्न पूछने का सिलसिला शुरू ही नहीं हो पाया; यहां तक कि उनमें से कुछ साधक भक्त बनकर पिघल जाने कि पीड़ा से छुटकारा लेने का प्रयास करते हुए अपनी राह चल दिए।

भोजन छोड़ देना; अग्नि को न चूना; सिर्फ व्याख्यान करते रहना; आदि संन्यास की उत्तम दशा  नहीं हो सकती; ईश्वर से एकरूपता की स्थिति में सभी मोह माया आदि अपने आप ही मिट जाय करेंगे; अगर मेरा " मैं पन "  नष्ट न हो पाते हों तो कभी कभी "मैं सेवक, तुम सेवक का भान " लेकर ईश्वर के साथ एकरूप होने का सिलसिए चल सकेगा।  फिर धीरे धीरे मेरा "मैं" उस चिरंतन सनातन सत्ता के साथ एकरूप हो पायेगा; आखिर पिघलना ही जीवन की नियति हो सकेगी; कोई पहले ही पिघले, और फिर कोई कुछ दिनों के बाद!

कर्म विषयक शंकाओं का निरसन करते समय भगवान कहते हैं:

न तो कोई केवल कर्म से विमुख रहकर कमर्फल से मुक्ति पा सकने की पात्रता रख सकता और न ही केवल शारीरिक संन्यास लेकर ज्ञान का अन्वेषण करते करते सिद्धावस्था पाने की पात्रता रख सकता। यह भी मान्यता बानी कि क्षण भर के लिए भी कोई कर्म का अनुष्ठान किये बिना नहीं रह सकता; कर्म का अनुष्ठान तो प्रकृति के गुणों के अधीन अपने आप ही होते रहेंगे । सावधानता इस बात की भी रहे कि इन्द्रिय संयम के साथ साथ अंतर मन पर भी नियंत्रण  बने।  सिर्फ बाहरी इन्द्रिय संकुल का नियंत्रण रहे और अंतर मन में उद्वेग, भोग - लालसा आदि बनी रहे तो उन्हें हम पाखंडी  ही कहेंगे, न कि तत्व वेत्ता साधक या कर्मयोगी।  (गीता III - ४- ६)

श्रेष्ठ वही माने जाएंगे जो इन्द्रिय संयम रखने के साथ साथ किसी आशा अभिलाषा के बिना ही नियत कर्म में लगे रहते हैं।  कर्म विमुखता से शरीर का भरण पोषण भी संभव नहीं हो पायेगा; इसलिए नियत कर्म में लगे रहना कहीं श्रेष्ठ मानें। भगवान के सुख के लिए और फल की आसक्ति के बिना अपने नियत कर्म में हमें लगे रहना होगा; इसे यज्ञ के निमित्त से किया जानेवाला कर्म ही समझें; जठर की अग्नि में भोजन की आहुति; ज्ञान रुपी अग्नि में कर्म की आहुति; अहम् रुपी प्रखर तेज में मन के संकल्पों का हवन; दान रुपी यज्ञ में समपदाओं का हवन ; और इसी प्रकार से और कई रूप में यज्ञ संस्कृति का परिचायक कर्म का अनुष्ठान साधक का कर्तव्य ही समझें।  उसी संस्कृति का बखान करने के लिए योगेश्वर समय समय पर, स्थान स्थान पर यज्ञार्थ कर्म की बात करते आये। ईश्वर के प्रति सर्पण के भाव से किया जानेवाला कर्म (यज्ञार्थ कर्म) सदैव मंगलदायक ही होगा; इसके अनुष्ठान से दिवाता और मानव के बीच समन्वय की भी स्थापना हो पाएगी; साधक खुद का सन्निधि में भी ईश्वर के अधिष्ठान रूई शाश्वत सत्य का उदघाटन कर सकेंगे। (गीता III – ७-१२  )[1] 

 

दूसरे क्या करें क्या न करें यह देखना भी अनुचित हगा, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे मन  में जो तत्व और विचार अनपटाए हों उसके विरोध में कोई कार्य करके हम कमसे काम अपने से चल न करें। इस वक्त इतना तो जरूर कहा जा सकेगा कि उस त्रिवेणी के कुंड में मैं बसेरा बना चूका हूँ; आगे क्या पड़ाव आनेवाला है इसका भी मुझे ज्ञान नहीं।  अपनी अनुसन्धित्सा बनी रहे यही अभिलाषा है।



[1] दान को यज्ञ रूप से करने की संस्कृति अपने समुदाय में कोई नया विषय नहीं है; इसे हम काफी प्राचीन समय से; वैदिक संस्कृति के काल से ही सुनते आये हैं।

"सच्चे कर्मयोगी अपनी गृहस्थी के कार्यों को पूरा करते हुए अपने सभी कार्यों को ईश्वर के प्रति सरन के भाव से  यज्ञ के रूप में करते हैं और केवल इष्ट को ही  सभी कर्मों का भोक्ता मानते हैं।" ….. श्रीमद्भागवतम्-4.30.19

कालिंदी और नागदेवता

 

एक आश्रम संस्था के प्रमुख थे ; उनको लोग स्वामी बुद्धानन्द कहा करते थे।  उनकी गाड़ी झाड़खंड और ओडिशा की सीमा पर बसे एक जंगल के बीच से गुजर रहा था।  उसी जगह कुछ ऐसे जनजाति बसे थे जिनका कोई स्थायी ठिकाना ही नहीं था; ही हम उन्हें किसी जगह पर स्थायी रूप से बसते हुए देख ही पा रहे थे। ऐसे ही एक स्थानांतरण के मुहूर्त में उसी रास्ते से स्वामीजी और उनके कुछ साथी गुजर रहे थे, जबकि एक जनजाति महिला दर्द से कराह रही थी।  जैसे ही सन्यासी महाराज का काफिला रुका वैसे ही अन्य सभी जनजाति के लोग वो जगह चढ़कर और उस पीड़िता को भी छोड़कर चल दिए; आखिर उस पीड़िता का इलाज करने के लिए चिकित्सकों को उतारा गया; भोजन की व्यवस्था की गई; कुछ भोजन वहीँ छोड़कर वो लोग चले गए।  से पहुंचाने का यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा ताकि बिरहोड़ समुदाय के उस जनजाति का विशवास जीता जा सके।  स्वामी बुद्धानन्द और उनके साथी सम्प्रदाय को छोड़कर अन्य किसी सम्प्रदाय को उस जनजाति का विशवास जीतने में सफलता नहीं मिली। 

उसी जनजाति के नजदीक एक कालिंदी टोला भी था जहां नागदेवता को पकड़ने और बेचने के व्यवसाय से जुड़ा एक कालिंदी बूढ़ा भी रहता था।  एकदिन आश्रम के लोगों के साथ काम में हाथ लगाते हुए खंडहर से निकलनेवाले एक नागदेवता को पकड़ने के लिए उसी कालिंदी बूढ़ा को बुलावा भेजा गया।  उसने ख़ुशी ख़ुशी उस नागदेवता को अपने पास रखी टोकर में डाल दिया।

"इस नागदेवता का क्या करोगे?" स्वामीजी का सहज ही पूछना था ।

"पहले तो दांत निकालना होगा, स्वामीजी", कालिंदी "दांत" शब्द पर कुछ ज्यादा ही बल देकर अपने मन की बात कह रहा था ; और भी काफी कुछ कहा।

"ऐसा क्या किया जाय, जिसके करने पर इसे तुम गहन वन में जाकर छोड़ दोगे?"

यह तो उस कालिंदी के लिए काफी कठिन एक विषय बन गया। मन ही मन सोचा इस संत महात्मा से भी क्या कुछ लेना उचित होगा! पर उसे पैसा टी चाहिए, और फिर यह जो उसका व्यवसाय ठहरा!

ज्यादे देर तक कालिंदी को चुप्पी साढ़े देख महाराज समझ गए कि इसे कुछ बड़े रकम की उम्मीद रही होगी और उसके माँगने में भी कुंठा हो रही होगी।  वो स्वयं ही उनके पिछले महीने के संग्रह में से आधी जे ज्यादे की रकम निकालकर कालिंदी को देने के लिए कहे और यह बोलकर गए कि नागदेवता को कुछ गभीर वन में जाकर प्रकृति की गोद में छोड़ दिया जाय; नैसर्गिक रूप से उसे जो जहर की झोली और विषदंत जैसे मिला होगा उसे भी चढ़ दिया जाय।

पैसों में रखा ही क्या है! भक्तों के पास जाने से और अनुभव कथन कहने से फिर दान मिलाने की संभावना जरूर बनेगी।  सामने चलनेवाला वीर सन्यासी भला तूफ़ान से और जोखिमों से कभी घबराया है, ता फिर आगे कभी घबराएगा ! नागवता को सिर्फ इसलिए भी कैद में रखना उन्हें मंजूर नहीं था को वो जहरीलेल हैं, अनायास ही अन्य जीवों का नाश भी कर देते हैं; नैसर्गिक रूप से मिले विष से वो शिकार भी करते होंगे, भोज्य को भी मौत के घात उतारते होंगे और वैसे प्राणी की जनसंख्या को भी नियंत्रण में भी रखते होंगे; यह तत्व कालिंदी के समझ से परे रहा होगा, पर स्वामीजी भली भाँती समझ रहे थे; स्वामीजी प्राण संचार और संहार वृत्ति का विषय भी समझ रहे थे जिसमे अनाधिकार हस्ताक्षिओ कर दिन मनुष्य का धर्म नहीं माना जाता; अतः ऐसा अधर्म करने की वृत्ति से स्वामीजी ने उस कालिंदी को रोका।  .