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भक्त अथवा केवली – और मुक्त

सिर्फ शुद्ध भक्ति के आधार पर ही भक्त और भगवान का मिलान संभव हो पायेगा।  ऐसे भक्त भी हुए जिन्हें ईश्वर का दर्शन होता रहा और वे संतृप्त होते रहे।  गोस्वामी तुलसीदासजी को उसी प्रकार से मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी और उनके पूरे दरबार का दर्शन हो सका।  उनके उसी दिव्य दर्शन को सत्यापित करने के लिए आज अपने बीज श्री रामचरितमानस रूपक कृति हमारे बीच संदर्भित  हो पाया।.

-        चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता

1. सर्व-भूतेषु यः पश्येत् भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः।।
 
2. ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम मैत्री कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः।।
 
3. अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः।।
 
4. गृहीत्वाऽपींद्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति। विष्णोर् मायां इदं पश्यन् स वै भागवतोत्तमः।।

5. देहेंद्रिय प्राण मनो धियां यो जन्माप्यय-क्षुद्-भय-तर्ष-कृच्छैः।
संसारधर्मैर् अविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर् भागवतप्रधानः।।
 
6. न काम-कर्म-वीजानां यस्य चेतसि संभवः। वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः।।
 
7. न यस्य जन्म-कर्मभ्यां न वर्णाश्रम-जातिभिः। सज्जतेऽस्मिन् अहंभावो देहे वै स हरेः प्रियः।।
 
8. न यस्य स्वः पर इति वित्तेषवात्मनि वा भिदा। सर्वभूतसमः शांतः स वै भागवतोत्तमः।।

9. त्रिभुवन-विभव-हेतवेऽप्यकुंठ स्मृतिरजितात्म-सुरादिभिर् विमृग्यात्।
न चलति भगवत्पदारविंदात् लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्यः।।
 
10. भगवत उरु-विक्रमांघ्रिशाखा नख-मणि-चंद्रिकया निरस्त-तापे।
हृदि कथमुपसीदतां पुनः स प्रभवति चंद्र इवोदितेऽर्कतापः।।
 
11. विसृजति हृदयं न यस्य साक्षात् हरिरवशाभिहितोऽप्यधौध-नाशः।
प्रणय-रशनया घृतांध्रि-पद्यः स भवति भागवतप्रधान उक्तः।।[1]

अर्थ :

1.      सब भूतों में परमेश्वर स्वरूप अपनी ही आत्मा को और परमेश्वर स्वरूप अपनी आत्मा में सब भूतों को जो देखता है, वह ‘भागवतोत्तम’ ( उत्तम कोटि का भगवद्भक्त ) है।

 

2.      जो भक्त ईश्वर में प्रेम, उनके भक्तों से मित्रता, मूढ़जनों पर कृपा और शत्रु की उपेक्षा करता है, वह मध्यम कोटि का भक्त है।

 

3.      जो श्रद्धा से केवल भगवान् के विग्रह को पूजना चाहता है, लेकिन उनके भक्तों और दूसरे लोगों को जो श्रद्धा से पूजना नहीं चाहता, वह प्राकृत यानी कनिष्ठ भक्त हैं।

 

4.      यह समस्त विश्व सर्वव्यापी ईश्वर की माया है, यह ज्ञान होने के कारण, इंद्रियों से विषयों का ग्रहण करते हुए भी जिसे हर्ष या विषाद नहीं होता, वह उत्तम भक्त है।

 

5.      देह इंद्रिय प्राण मन और बुद्धि के, जन्म मृत्यु क्षुधा भय तृषा के कारण दुःखदायी जो संसार-धर्म उनसे, हरि-स्मरण के कारण जो मोहग्रस्त नहीं होता, वह भागवतों में श्रेष्ठ है।

 

6.      जिसके चित्त में काम, कर्म और इन दोनों का बीज अविद्या उत्पन्न नहीं होती और वासुदेव ही जिसके एकमात्र घर हैं, आश्रय है, वह उत्तम भागवत है।

 

7.      जिसे जन्म-कर्म या वर्णाश्रम और जाति के कारण इस देह में अहंभाव नहीं चिपकता, सचमुच वही हरि का भक्त है।

 

8.      जो धन-संपत्ति या शरीरादि में ‘यह अपना है, यह पराया’ ऐसा भेद नहीं करता, जो सब प्राणियों के साथ समभाव से व्यवहार करता और सर्वदा शांत रहता है, वह उत्तम भागवत है।

 

9.      त्रिभुवन के वैभव के लिए भी जिसके हरि स्मरण में व्यवधान नहीं पड़ता और भगवन्मय बने देवादिकों को भी शोध्य उन भगवान् के चरण-कमलों से जो आधा पल भी दूर नहीं होता, वह वैष्णवों में अग्रगण्य है।

10.  जैसे चंद्रोदय होने पर सूर्य का ताप नष्ट हो जाता है, वैसे ही भगवान् के महापराक्रमी चरणों की उँगलियों के नखरूपी रत्नों की चंद्रिका से भक्तों के हृदय का ताप मिट जाता है। फिर वह पुनः उत्पन्न कैसे होगा?

11.  अवश होकर नाम लेने पर भी पाप-प्रवाह का नाशक करने वाले साक्षात् हरि, प्रेम की डोरी से चरण-कमल बँध जाने के कारण, जिस भक्त के हृदय को नहीं छोड़ते, वह भागवतों में प्रमुख हैं, ऐसा कहते हैं।

भक्त के गुणों का परिचय भागवत में कई स्कंधों में जगह जगह पर विविध रूप में और रूपक कथा के ज़रिए दिया गया है | एक प्रहलाद जैसे भक्त ही हैं जिनके भक्ति सुधा से संतुष्ट होकर भक्त की लाज रखने के लिए स्वयं श्री हरि प्रकट हो जाते हैं | दूसरी ओर पत्थर की शिला से भक्त को प्रकट करने के लिए राम रूपी श्री हरि ही अहिल्या का उद्धार करने के लिए आगे बढ़ते हैं | सन्देहातीत होकर ईश्वर चरण में अनुराग रखते हुए खुद को समर्पित कर देने का आग्रह रखता हो वही श्रेष्ठ भक्त माना गया | श्री मदभागवत और गीता में भी भक्तों के कई लक्षण बताए गये हैं (गीता द्वादश अध्याय)|

 



[1] विसृजतित्याग देता है; हृदयम्हृदय को; कभी नहीं; यस्यजिसका; साक्षात्स्वयं; हरि:—भगवान् हरि; अवशसहसा; अभिहित:—कहलाने वाला; अपियद्यपि; अघपापों के; ओघसमूह; नाश:—नाश करने वाला; प्रणयप्रेम की; रसनयारस्सियों द्वारा; धृतपकड़े; अङ्घ्रि-पद्म:—उनके चरणकमल; :—वह; भवतिहै; भागवत प्रधान:—सर्वश्रेष्ठ भक्त; उक्त:—कहा गया .

 

 

 

 

विधाता का विधान

 

["चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता विरचित हे राम शीर्षक पुस्तक से "]

 

विधाता हमें कर्म में लगाकर सृष्टि में निरंतरता लाने का प्रयास करते रहते हैं और एक क्रम से हमें भी उन्नति के मार्ग पर बने रहने के लिए प्रेरित करते हैं।  प्रकृति के गुणों के अधीन ही जीव कर्म के लिए प्रवृत्त होते हैं और विधायक कर्म में लिप्त होते रहते हैं। [i]  वस्तुतः एक क्षण के लिए भी व्यक्ति पूर्ण निष्क्रियता से नहीं रह सकता; यदि सिर्फ बैठे हों तब भी कुछ न कुछ तरंगों से मन अशांत हुआ रहता होगा; गहन निद्रा में भी हम स्वप्नलोक में सक्रिय रहते होंगे।  निद्रा में भी श्वास और संवहन की क्रिया के साथ साथ स्वयःक्रिय स्नायु की क्रिया भी चला करेगी। अतः यह भी कहा जा सकेगा कि पूर्ण समाधि जैसी स्थिति में भी हम सक्रिय रहते होंगे और विश्व चराचर के इस पार्थिव जगत में चेतना सहित वापस आने के लिए प्रयत्न कर लिया करेंगे ; अगर सफलता मिली तो सक्रिय हुए और विफलता मिली तो शरीर छूटा! बीच के अंर्तवर्ती पर्याय में ही चेतना का आवागमन होता रहेगा।  

श्रेष्ठ वही कहलायेंगे जो ज्ञानेन्द्रिय को वश में करके कर्मेन्द्रियों को आसक्ति रहित होकर  विधायक कर्म में लगा सकेंगे। [ii]  प्रजा पालन और प्रजा रक्षण के बारे में कहा जाता है: ब्रह्मा प्रजापालक हैं और प्रजा के कल्याण के लिए भी तत्पर रहते हैं। [iii] पूर्ण कर्मयोगी तो सभी कर्म यज्ञ  के रूप में ही किया करेंगे; [iv] भोजन करते समय भी जठराग्नि रुपी कुंड में भोजन रुपी द्रव्य कि आहूति देंगे। संग्रह वृत्ति से बचते हुए कर्मयोगी को विधायक कर्म में लगाना चाहिए। [v]

 



[i]  न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: ।। श्रीमद्भागवद्गीता  अध्याय ३ श्लोक ५ ।।

 न – नहीं ; नमस्ते - अवश्य ; कश्चित् – कोई भी ; क्षणम् – एक क्षण ; अपि – सम ; जातु – सदैव ; तिष्ठति – रह सकता है ; अकर्म-कृत - कर्म के बिना ; कार्यते – किये जाते हैं ; नमस्ते - अवश्य ; अवशः – असहाय ; कर्म - कार्य ; सर्वः – सभी ; प्रकृति-जैः – भौतिक प्रकृति से उत्पन्न ; गुणैः – गुणों से

 

[ii] यस् त्विन्द्रियानि मनसा नियम्यारभते 'अर्जुन

कर्मेन्द्रियैः कर्म-योगम् असक्तः स विशिष्यते।। श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय ३ श्लोक ७।।

यः – कौन ; तू - परंतु ; इन्द्रियाणि – इन्द्रियाँ ; मनसा – मन से ; नियम्य – नियंत्रण ; अरभते - प्रारंभ होता है ; अर्जुन – अर्जुन ; कर्म-इन्द्रियैः – कर्मेन्द्रियों द्वारा ; कर्म-योगम् - कर्मयोग ; असक्तः – आसक्ति रहित ; सः – वे ; विशिष्यते - श्रेष्ठ हैं;

[iii] सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्वष्टकामधुक् ।।

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।  परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।।

……………… श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय ३ श्लोक १०, ११ ।।

 

“प्रजापति ब्रह्माजी ने सृष्टि के आदिकाल में कर्तव्य-कर्मों के विधान सहित प्रजा की रचना करके उनसे कहा कि तुम लोग इस कर्तव्य के द्वारा सब की वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुम लोगों को कर्तव्य पालन की आवश्यकता सामग्री प्रदान करने वाला हो। अपने कर्तव्य कर्म के द्वारा तुम लोग देवताओं को उन्नत करो और वे देवता लोग अपने कर्तव्य के द्वारा तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे।“

[iv] गृहेश्व अविशतम् चापि पुंसाम कुशल-कर्मणाम् मद-वर्त-यत-यमानं न बंधाय गृह मतः (भागवत ४-३०-१९  (६)

“पूर्ण कर्मयोगी , अपने नित्य क्रिया और कर्तव्यों को पूरा करते हुए भी, ईष्ट को सभी गतिविधियों का भोक्ता जानकर, ईष्ट के  लिए अपने सभी कार्य यज्ञ के रूप में करते हैं।

[v] स विश्वजितं अजहरे यज्ञं सर्वस्व दक्षिणम् अदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचम इव (रघुवंश ४ - ८६ )[ श्लोक ५]

"रघु ने विश्वजीत यज्ञ इस सोच के साथ किया था कि जैसे बादल पृथ्वी से पानी इकट्ठा करते हैं, अपने आनंद के लिए नहीं, बल्कि उसे वापस पृथ्वी पर बरसाने के लिए, उसी तरह, एक राजा के रूप में उनके पास जो कुछ भी था, वह जनता से कर के रूप में एकत्र किया गया था, अपनी ख़ुशी के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर की ख़ुशी के लिए। अतः उन सभी संग्रहों को प्रजा हितार्थ खर्च करके फिर से भिक्षा पात्र लेकर योगक्षेम का इंतजाम करने के लिए निकल पड़े ।“

फकीरी

 


कभी अपने ही देश के राष्ट्रपति महोदय को कुछ ऐसी पीड़ा होने लगी कि वो ठीक से सो भी नहीं पा रहे थे; अगर सो भी जाते हों तो नींद ही नहीं आ रही थी।  वहाँ से कुछ दूरी पर बसे एक नगर में रहनेवाले एक फ़कीर बाबा के बारे में उन्हें पता चला ।  कभी कभी पढ़े लिखे लोग भी फकीरी पर भरोसा करने लग जाते हैं; और ख़ास करके तब जब अन्य सभी औषधि काम ही न आते हों।  औषधि के भी अपने कुछ नियम, कुछ सीमाएं और कुछ कमियाँ रह ही जाती होगी।  यह एक नैसर्गिक विषय ही समझें जो हर सृजन में कुछ न कुछ कमी छोड़ दिया करते हैं ; और उस कमी से चल पड़ने के लिए हम मजबूर भी हो जाते हैं।

आखिर महोदय को लेकर उनका ख़ास काफिला फ़कीर बाबा के शहर में आ पहुंचा ; उनके पास पहले सन्देश वाहक भेजा गया।  कोई आम व्यक्ति का आना जाना रहता तो अलग बात थी; पर उनके जाने के लिए व्यवस्था कुछ ख़ास ही बन जाती होगी ! आला अधिकारी के साथ कुछ एक हुए सिपाही वर्ग का काफिला पहले जा पहुंचा और फ़कीर बाबा को ही आदेश देने लग गए, "बाबा चलो, तुमसे हमारे राष्ट्रपति महोदय मिलाना चाहते हैं। "  

फ़कीर बाबा थोड़ी देर चुप्पी साधे रहे, और कुछ गड़बड़ी में भी थे , उन्हें मरीजों को देखने के लिए निकलना भी था; बाबा वहां जरूर जाते थे जो उनके पास नहीं आ पाता था ; सिपाही और अधिकारी के हरकतों को देखकर उन्हें ऐसा नहीं लगा कि उनके मालिक चलने फिरने की ताकत खो दिए हैं , वो बोले, "उनके दरबार में एक फ़कीर का क्या काम ! उन्हें जाकर कह दो मैं नहीं आऊंगा। "

संवाद पाकर राष्ट्रपति महोदय समझ गए कि जरूर अधिकारी लोगों ने फ़कीर बाबा के साथ अखर कर बात किया होगा।  अधिकारी हो जाने के बाद लोगों को अंग्रेजियत की हवा लग ही जाती है, और फिर उसी प्रकार सी उड़ान भरने लग जाते हैं; कभी कभी यह भी भूल  जाते हैं कि अपने यहाँ धरती नाम की कोई वस्तु है; और जहां हमें भी अपना शरीर छोड़कर जाना होगा।

मुसीबत का पैमाना कभी कभी लोगों को घुटनों पर लाकर छोड़ देता है; देश की जिम्मेदारी उठानेवाले महाशय के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।  फिर उन सन्देश वाहकों को भेजा गया; उन्हें घर पर ही रहने के लिए कहा जाय, राष्ट्रपति महोदय ही उनसे मिलने के लिए आएंगे।  जब तक सन्देश वाहक पहुँच पाते तबतक बाबा निकल चुके थे; दो तीन लोगों को वहीँ रहने के लिए कहा गया।  देर रात बाबा को सन्देश  मिला, पर दूसरा दिन क्या होगा वो दूसरे दिन सबेरे ही तय कर लेंगे।

दूसरे दिन भी बाबा देर से ही वापस आये; आकर देखते हैं कि पूरा काफिला ही उनके मचान के पास डेरा डाल चूका है; पड़ोस के घर से कुर्सियाँ  और मेज लाकर महोदय को बैठने भी दिया गया।  बाबा को देखकर और कोई खड़ा हो या न हो, राष्ट्रपति महोदय जगह छोड़कर खड़े हो गए; और उनको देखकर अन्य सभी लोग भी ताल में ताल मिलाने लगे; कुछ लोगों को मजबूरन ही खड़ा होना पड़ा।  जिस आदमी का रहने खाने, नहाने आदि का कोई ठिकाना ही न रहा होगा, उसके लिए राष्ट्रपति जी जगह छोड़कर खड़ा हो जाएंगे !

इस घटना के लिए कोई भी मानसिक रूप से प्रस्तुत नहीं थे, कुछ देर तक सन्नाटा रहा।  फ़कीर बाबा अपने चबूतरे पर आसीन हो गए और जिन मरीजों दूर बिठाकर रखा गया था, उन्हें एक के बाद एक बुलाने लग गए।  राष्ट्रपति जी को लगा उनका नंबर ही शायद पहले आ जाएगा, ताकि वो जल्दी से जल्दी  जगह छोड़कर अपने डेरे पर जा सकें; पर यह तो बाबा का दरबार था ! फिर उन्हें सबकी पीड़ा समझना है। 

जिनकी तकलीफें ज्यादा थी उन्हें पहले बुलाया जा रहा था।  आखिर महोदय  का नंबर आया, " कहिये, क्या तकलीफ है?"

"तहलीफ!"

"यहाँ हर कोई तकलीफें लेकर ही आता है !"

"हाँ, वैसे मुझे भी तकलीफ तो है।  रात को नींद नहीं आती; काफी दवा बदल बदल के लिया, पर कोई असर नहीं हो रहा है। "

"इंसान को नींद आती है, सुलतान को नहीं।  समझ में आया; या फिर और कुछ बताना होगा ?"

"कोई ताबीज , कोई दवा!"

"पढ़े लिखों को ताबीज आदि देना ही बेवकूफी है ! तुमने इंसान और सुलतान को मिलाकर रख दिया ; तो नींद कैसे आएगी ! रात को जब बिस्तर पर जाते हो तो यह भूल जाया  करो कि तुम इस देश के सुलतान हो, तो फिर नींद आ ही जायेगी। "

हप्ते भर में राष्ट्रपति जी को फ़कीर बाबा के बताये नियम से चलने का फल मिल गया; नींद भी आ गई, सफलता भी मिलने लगी।  दिमाग पर से मानो किसी ने एक परदे को ही खींचकर अलग कर  दिया ।  फकीरी पर पहले से ही उन्हें कुछ विश्वास था, वो और बढ़ता चला गया।  उस शहर में आते ही महोदय बाबा के दरबार में जाते थे।

बरगद का पेड़


एकबार ठाकुर रामकृष्ण को निर्विकल्प समाधि लेते हुए नरेन छिपकर देख रहे थे | बाद में नरेन काफ़ी आग्रह करने लगे कि उन्हें भी ठाकुर से निर्विकल्प समाधि सीखना है | यह सुनकर नरेन को लगा कि गुरु होने के नाते ठाकुर ऐसा सुनकर प्रसन्न होंगे और उसे निर्विकल्प समाधि लेने की शिक्षा ज़रूर देंगे | पर ऐसा हुआ नहीं; ठाकुर मायूस हो गये और वहाँ से उठकर चले गये | मायूसी का कारण पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "मेरी तमन्ना थी कि नरेन बरगद का पेड़ बनेगा और काईओं को आसरा भी देगा , पर उसे तो ताड़ का ही पेड़ बनना है | "

ठाकुर नरेन को जनता जनार्दन के लिए सेवव्रती होकर काम करने की प्रेरणा दे रहे थे और नरेन को व्यक्तिगत प्रगति की धुन लगी थी | निर्विकल्प समाधि का मंत्र तो है ही उत्तम कोटि का; पर ठाकुर रामकृष्ण को लग रहा था कि सभी भक्त वत्सल अगर समाधि लेने लग जाएँ तो फिर समाज का क्या होगा !

अतः कुछ भक्तों को वैयक्तिक प्रगती की लालसा से ऊपर उठकर शिव सेवा ज्ञान से जीव सेवा में लगना है | तभी समाज को प्रगती की राह पर लाया जा सकेगा | आचार्य विनोबा का मंत्र ही सर्वोदय का था ; प्रार्थना भी सामूहिक ही हो; उसमें भी सबके भावनाओं को भली भाँति पिरोए जाएँ |

" ॐ देहे प्राणे मने सवित्याचे , तेज देवाचे घ्याउन या...... हे प्रभो नेई मज असतान तून सत्याकड़े  " यह बाबा विरचित सर्वधर्म प्रार्थना का धुन मन को पूर्ण कर देता है | उस मंगल प्रभात को हृदय में बाँधकर ही हम आज भी लोक हितार्थ सेवा भाव से बाहर निकलते हैं |

कहते हैं किसी बरगद के पेड़ की एक जड़ काटने का प्रयास अगर हो तो वहाँ कई और जड़ों का संचार विविध दिशाओं में होने लग जाता है | नाशवान विचारक के लिए यह बहुत बड़ी सीख है |  विचार का प्राबल्य इतना हो कि वो तूफान में भी अडिग बना रहे | उसे हिला पाने की मंद बुद्धि किसी के मन में भी न आ सके | बाबा कहते थे प्रशाशित होने से कहीं बेहतर विचार है अगर कोई स्वशाशित और अनुशाशित होने का प्रयास करे | प्रकृति के पास सबके लिए व्यवस्था है ; हम उसे प्राप्त करने का कौशल हासिल करें न कि अपनी माँग रख दें | 

एक बार एक भिक्षु राज पथ पर यह सोचकर खड़ा रहा कि इस पथ से गुजरनेवाला राजाधिराज झोली भर  देता है; और फिर जीवन भर कुछ माँगने की नौबत ही नहीं आती | दिव्य पथ को धूल धुसरित करते हुए राजाधिराज आ तो गये; पर भिक्षु के सामने हाथ पसारकर खड़े हो गये | अब भिक्षु मायूस हो गया और उसी मायूसी में कुछ दाने उस सर्व शक्तिमान की हथेली पर रख दिया ; मायूस होकर घर वापस आया | दिन ढल जाने के बाद उन दानों को छाँटने लगा | उसमें कुछ चमकने वाले कीमती मोतियों का संग्रह भी मिला |

अब उसे अपने किए पर रोना आया | वो तो सबकुछ देने का मन बनाकर फिर उसी राज पथ पर जाकर खड़ा हो गया | राजाधिराज आए और उसी स्थान को धूल धुसरित करते हुए आगे बढ़ गये | उनके मन में इस बात की कल्पना बनी कि यह भिक्षु जो दे सकता था वह तो दे चुका | अब भला इससे मिलकर कौनसा समाधान आनेवाला ! अतः उस सर्व शक्तिमान का रथ उसी दिव्य पथ से होते हुए आगे निकल गया | कभी कभी हम भी भ्रमित हो जाते हैं कि अगर सर्व शक्तिमान हमसे कुछ माँग रहा है तो वो कौनसी वस्तु हो सकती ! उसे भला किस चीज़ की कमी हो गई ! असल में सर्व शक्तिमान को हमारा हार्दिक समर्पण चाहिए, ता कि उसे हमें निखारने का मौका मिले |

भक्ति योग

 


भक्ति की धारा में सभी साधक किसी न किसी रू में जगदीश्वर की ही उपासना   करते हैं; श्री हरी भी उन्हें उनके श्रद्धा के मुताबिक़ वैसी अवस्था में भक्ति और आस्था को और अधिक दृढ रू से प्रतिष्ठित कर देते हैं। ".

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भक्ति योग का अभ्यासी अपने ईष्ट को ही सर्वोयरी सत्य मानते हुए उनकी शरणागति पाने का प्रयास करेगा; यही अपेक्षित भी है, और समीचीन भी; उसके ऊपर अगर मन में भक्ति की धारा का प्रवाह उत्पन्न हो तो फिर बात ही कुछ और ठहरी।[i]

भक्ति मार्ग काफी सरल भी है और काफी जटिल भी; यह निर्भर करता होग्गा उस भक्त के स्वरुप के ऊपर जिसे अपने रूचि के अनुसार कर्म, भक्ति या ज्ञान की धारा का अवलम्बन लेते हुए जगदीश्वर के सन्निकट खुद के अस्तित्व का अनुसंधान करना है; खुद की भूमिका बांधना है, और दिव्य जन्म को सार्थक करते हुए दिव्य कर्म के लिए प्रवृत्त होना है। [ii]  'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ताः उपासते' -- मन वहीं लगता है, जहाँ प्रेम होता है। जिसमें प्रेम होता है, उसका चिन्तन स्वतः होता है; "नित्ययुक्ताः " का टाटरी हुआ सदा सर्वदा हर परिस्थिति में आत्मा के समीप जगत के नियंता परम तत्व के रूप में जगदीश्वर के अधिष्ठान का अनुभव करते हुए नित्य क्रिया (यज्ञ, दानं और तप ) में लगे रहना; क्रमशः उस गहराई तक खुद को ले जाना जहां आत्मा और परमात्मा का भेद समाप्त हो जाता होगा; जहां से सिर्फ पूर्णता पाने का मार्ग शेष रहता होगा; जहां के बाद हम जगदीश्वर के पास शरणागति पाकर अभय रूप धन के धनी बन जाते होंगे; जिसके बाद कुछ भी पाने लायक शेष नहीं रह जाता; जिसके बाद सिर्फ और सिर्फ जगदीश्वर के अधिष्ठान विषययक सत्य की ही अनुभूति शेष रहती होगी। हर परिस्थिति में यह कहना भी समीचीन न होगा कि मन की वृत्तियाँ आराम से साधक के नियंत्रण में आ जाए और उसे भक्तिमार्ग का पथिक बना दे, अनन्य भक्ति की धारा में लगा दे और वैसा अभ्यास करने के लिए सुगमता से लगा दे जिसके बाद जगदीश्वर को साधक अपने ही सन्निकट अधिष्ठान होता हुआ महसूस करने लग जाए। इस दृष्टि से भी साधना में “निरंतरता” का महत्व माना गया; भक्त को प्रयत्न करते ही रहना होगा; भक्ति की धारा में भक्त को क्रमशः आगे ही चलना होगा ; किसी भी पड़ाव की चिंता छोड़कर क्रमिक उन्नति और क्रमिक परिपक्वता की ओर। निर्गुण उपासना की हमारा ध्यान केंद्रित करने के लिए इन्द्रिय संयम का अभ्यास करते हुए अक्षर ब्रह्म को अपना उपास्य बनाने की बात कही गई;[iii]

परमात्मा और जीवात्मा के बीच में निहित समानता की बात भी जगह जगह पर शाश्त्र, पुराण, वेद, उपनिषद् में बारी बारी से किये गए हैं।[iv] यह कुछ वैसे ही तुल्य हुआ जैसे समुद्र के जल में जल का कण और नदी के जल में लिप्त जल का कण; अपने विविध जलाधार में रहते हुए भी जल के शुद्ध गुणों का न विघटन होना; शुद्ध स्वारूप और अस्तित्व को बनाये रखना । “सर्वमिदं ततम् पदोंसे” और नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें 'मया ततमिदं सर्वम्' पदोंसे परमात्माको सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त बताया गया है। इसी प्रकार दूसरे अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें 'येन सर्वमिदं ततम्' पदोंसे जीवात्माको भी सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त बताया गया है।  

            "सर्वभूत हिते रता। " -- इस कथन से ईश्वर के सर्व व्याई वृहत स्वरू को दर्शाया गया।  'सर्वत्र समबुद्धयः'-- इस पदका भाव यह है कि निर्गुण-निराकार ब्रह्मके उपासकोंकी दृष्टि सम्पूर्ण प्राणी जगत में रहते हुए भी उस परमात्म तत्व पर आकर टिक जायेगी जिसके आधार पर उन सभी अवयवों में पूर्ण ब्रह्म के अधिष्ठान विषयक सत्य का उदघाटन हो सके।  और फिर परमात्मा को सैम भी कहा गया (श्रीमद्भागवद्गीता, अध्याय ५ श्लोक १९ ) ।   'समबुद्धयः' पदकी सार्थकता विशेषरूपसे व्यवहारकालमें  ही प्रतिफलित हो पाएगी; इसका तात्विक आधार रहने के साथ साथ एक व्यावहारिक आधार भी माना गया।  

            'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' -- निर्गुणके उपासक कहीं यह समझ लें कि निर्गुण तत्त्व कोई दूसरा है और सगुण से भिन्न कोई सत्ता स्वरुप   भी हो सकता ; इस भ्रम को विक्सित न होने देने के लिए महर्षि वेदवतास यह प्रतिपादित कर दिए कि निर्गुण ब्रम्ह जगदीश्वर से और कुछ हैं ही नहीं; (सन्दर्भ: श्रीमद्भागवद्गीता, अध्याय ५ श्लोक ४; अध्याय १४, श्लोक २७ )।  अतः सगुन और निर्गुण दोनों ईश्वर के ही स्वरुप होंगे।  परिपक्वता न पाने की स्थिति में भक्त के समीप किसी प्रतीक के जरिये प्रकट होंगे, और ज्ञानी जनों के सम्मुख अपने शुद्ध बुद्ध स्वरुप में प्रकट हो जाएंगे।  जैसे हम सूर्य की किरणों के होने और न होने का निर्णय वास्तु के दृष्टिगोचर होने और न होने से कर लेते हैं; हवा के हने और न होने का निर्णय पत्तों के हिलने और न हिलने से कर लेते हैं ; वस्तु के जरिये तत्व का विश्लेषण उसी सगुन उपासना का अभिक्रम माना जाएगा। निर्गुण तत्व को विशेषित करने के लिए kul मिलाकर आठ विशेषण को उपयोग में लाया गया; जिस निर्गुणतत्त्वके लिये 'अक्षरम्' और 'अव्यक्तम्' दो विशेषण को उपयोग में लाया गया था उसीका  वर्णन करनेके लिये छः और विशेषण अर्थात् कुल आठ विशेषण को उपयोग में लाया गया  जिनमें पाँच निषेधात्मक (अक्षरम्, अनिर्देश्यम्, अव्यक्तम्, अचिन्त्यम् और अचलम्) तथा तीन विध्यात्मक '(सर्वत्रगम्, कूटस्थम्' और 'ध्रुवम्)' विशेषण का सम्मलेन हुआ।

            कभी हिमालय की गोद में बसे एक कसबे में अपनी दुकान  लगानेवाले एक भक्त को उसीके ईष्ट  देवता ने सपने में यह कहा कि वो भक्त की दुकान  पर आएँगे।  उस भक्त को अपने ईष्ट के प्रति भक्ति तो थी; पर प्रत्यक्ष रूप से इस बात पर उसे यह विश्वास नहीं आ रहा था कि उपास्य देवता प्रत्यक्ष रूप से उसकी दुकान  पर भला कैसे आएंगे! विश्वास में कुछ कमी रहने पर भी उसने प्रस्तुति जारी रखा; और अपने उपास्य देवता के स्वागत के लिए बी तैयारी करने लगा; कुछ मीठा भी विशेष रूप से पकाया गया; लड्डू, पकवान आदि भी रखे गए; पर व्यापार बंद रखने का फैसला किया गया।

सबेरा होते ही एक वृद्धा दुकान  पर आई; अन्य दिनों की भाँति  उसे चाय पीना था , कुछ नाश्ता भी करना था; उसे दुकानदार महाशय ने कुछ मीठा और पकवान देकर विदा किया।  "पैसे! नहीं नहीं, आज मेरा व्यापार बंद है ; कोई मेहमान आनेवाले हैं। " दुकानदार को बड़ा ही आनंद मिल रहा था; पर सच बताने से कहीं लोग हंसाने न लगें, इस दृष्टि से उसने हकीकत को छिपा लेना ही मुनासिब समझा। 

इतने में एक बालक हाथ में सेव लेते हुए दौड़कर दुकान  में घुसा! उसके पीछे ही वागवान लाठी लेकर दौड़ रहे थे।  दुकानदार समझ गया; बालक का चेहरा भी बहुत कुछ बता ही रहा था।  उस बालक को भी मीठे मीठे लड्डू मिले; वेगवान का सेव बाहर फेक दिया गया। 

दोपहर का समय बीत रहा था; बाहर बर्फ गिरना भी कुछ काम हो चला था।  अपने भेद बकरियों को किनारे में रखकर चरवाहा भी नाश्ता पानी पाने के आग्रह से दुकान में दाखिल हुआ; पकवान और मीठा लेकर ही उसे संतोष करना पड़ा।  उसने भी पुछा, "आज कुछ विशेष बात है क्या?"

"हाँ, आज मेरे प्रभु, मतलब कि मेरे एक ख़ास मेहमान आनेवाले हैं। "

फिर बात आगे नहीं बढ़ी; मुस्कुराते हुए चरवाहा चल पड़ा।  संध्या वेला का प्रकाश ढलान पर था; अँधेरा बस छाने ही वाला था; दुकान के कपाट अधखुले ही रह गए; रोशनी की लकीरें बर्फ पर एक निशान  बना रही थी; दूर दराज से आनेवाले लोग बड़ी ही सुगमता के साथ उस लकीर की भाँति निशान  को देख पाते होंगे! इतने में एक बंजारे का भी आगमन हुआ; एक कारीगर, एक सिपाही, कपड़ा बेचनेवाला और चर्मकार महाशय भी आकर गए।  बस कुछ ही लड्डू और दो तीन पकवान बचे होंगे।

इतने में दुकानदार को नींद भी आने लगी; अधखुला कपाट छोड़कर ही वो सो गया।  उसके बाद फिर क्या! भोर बेला में जब नींद खुली तब तक चूहे बाकी बचे सब चट कर गए थे ! दुकानदार को सपना भी आया, " तुमने इतना सुन्दर मीठा बनाया था कि मैं बार बार आया, बार बार खाया; पर मेरा भक्त शायद मुझे पहचान ही न पाया!"

            भक्ति अगर विशुद्ध हो, अनन्य हो, एक ईष्ट के प्रति समर्पण की भावना से अगर हो तो जगदीश्वर प्रकट हो जाते हैं; फिर भक्त को संतोषी बनाते हुए अभय देते है।  यही भक्ति मार्ग में चरम उत्कर्ष की अवस्था है।  सबकी यही अभिलाषा रहती होगी उस  चरम अवस्था का आनंद उठाया जाय और जीवन को साथक बनाया जाय; "पर कैसे!" -- इसका अनुसंधान कर लेना अति आवश्यक है।   



[i] श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्  ।।

(पातंजल योग दर्शन-१ .४९ )

 "भक्ति योग के अभ्यास द्वारा आत्मज्ञान (जिसे कभी कभी आत्मसाक्षात्कार भी कहते होंगे; जो कि दिव्य ज्ञान का भी सूचक बनता होगा) पा लेना धार्मिक ग्रंथों के सैद्धान्तिक ज्ञान से कहीं श्रेष्ठ है।"

 

[ii] "एक नौका के द्वारा किसी सड़क मार्ग  की यात्रा नहीं की जा सकती ; न हवाई जहाज के द्वारा समुद्र यात्रा;  न ही साइकिल से साठ मील प्रति घंटे की गति से दूरी  तय किया जा सकता; प्रत्येक वाहन की अपनी सीमाएं, विशेषताएं और उपयोगिताएं  हैं। परन्तु किसी भी साधन का बुद्धिमत्ता तथा कौशल का सावधानीपूर्वक उपयोग करने से गन्तव्य तक पहुँचा जा सकता है; सही प्रकार के वाहन को उपयोग में भी लाया जा सकता है।  आत्मविकास के लिए, खुद को जगदीश्वर के समीप उपलब्ध पाने के लिए [ जो कि एक चिरंतन सत्य, सर्व जान विदित भवितव्य और न टालनेयोग्य सम्मलेन स्वरुप माना गया; जिसे साधक कुछ प्रयत्न मात्र से ही अनुभव करने लग जाते होंगे; जिसे एक प्राप्त की ही प्राप्ति मानी गई; जिसे पाने अर्थ हुआ नदी की धारा का समुद्र के विस्तीर्ण जालजलराशि में जाकर विलीन हो जाना; जिसे पूर्णता पाने के क्रम में बढ़ाया जानेवाला वलिष्ठ कदम भी माना जाएगा ]; प्रत्येक साधक उपलब्ध शरीर, मन और बुद्धि की उपाधियों में से किसी एक की प्रधानता से कर्मयोग, भक्तियोग या ज्ञानयोग के मार्ग का चुनाव करता होगा ; जैसे त्रिवेणी की धारा में से तीनों धारा को अलग से छांट पाना कठिन हो जाता होगा वैसे ही योग के तीन प्रमुख धारा में से तीनों का सूक्षमता पूर्वक अनुसरण कर पाना भी कठिन हो जाता है; वस्तुतः इन धाराओं को अलग कर भी नहीं पाएंगे; किसी एक धारा की प्रधानता जरूर रहती होगी; इसी दृष्टि से हम ज्ञान योगी, उत्तम भक्त या ज्ञानी साधक को विशेषित कर पाते होंगे। प्रकृतिसे जीव का माना  हुआ सम्बन्ध विषयक भ्रम दूर होते  ही जगदीश्वर से  अपना वास्तविक और नित्यसिद्ध सम्बन्ध प्रकट होने लग जाता है ; उसकी स्मृति से अपना स्मृति पटल भी आप्लुत होने लग जाएगा  -- 'नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा' (गीता अध्याय १८ । ७३ )। 'ते मे युक्ततमा मताः (अध्याय १२ श्लोक २)' बहुवचनान्त पदसे जिस विषय का प्रतिआदान हुआ , यही बात  'स मे युक्ततमो मतः (अध्याय ६, श्लोक ४७ )' एकवचनान्त पदसे पहले कही जा चुकी। “

[श्रीमद्भागवद्गीता, अध्याय १२, श्लोक २- ५ का आधार ]

---- आदि गुरु शंकराचार्य, योगी रामसुखदास, स्वामी गम्भीरानन्द जी, स्वामी तेजोमयानन्दजी, स्वामी रामभद्राचार्य जी आदि भाष्यकारों और टीकाकारों के सम्मिलित विवेचना के आधार पर।।

 

[iii]वह आकाशके समान सर्वव्यापक है और अव्यक्त होनेसे "अचिन्त्य है"; जो वस्तु इन्द्रियादि करणोंसे जाननेमें आती है उसीका मनसे भी चिन्तन किया किया जाना संभव हो पाता होगा; "अक्षर ब्रह्म" उससे विपरीत होनेके कारण "अचिन्त्य और कूटस्थ" है। जो वस्तु ऊपरसे गुणयुक्त प्रतीत होती हो और भीतर कुछ अन्य गुणों और अवगुणों से" भरी हो उसका नाम "कूट" है। अपने दृश्य जगत में भी  कूटरूप कूटसाक्ष्य इत्यादि प्रयोगोंमें कूट शब्द का व्यवहार  प्रसिद्ध है। जो  अविद्यादि अनेक संसारोंकी बीजभूत अन्तर्दोषोंसे युक्त "प्रकृति ", "निसर्ग" , "माया", "अव्याकृत"  आदि शब्दोंद्वारा कही जाती है ( प्रकृतिको तो माया और महेश्वरको मायापति समझने की अपनी एक पपरम्परा ही बनी) मेरी माया दुस्तर है इत्यादि श्रुति - स्मृतिके वचनोंमें जो माया नामसे प्रसिद्ध है; वह भी  "कूट" ही हुआ; उसमें जो उसका अधिष्ठातारूपसे स्थित हो रहा हो उसका नाम "कूटस्थ" है; वही अचल और ध्रुव भी; ध्रुव सत्य का भी वाचक होने के कारण सत्य का प्रकाशक तत्व भी हुआ; राशि -- ढेरकी भाँति जो कुछ भी विशेष क्रिया न करता हुआ स्थित हो पाया हो उसे भी  कूटस्थ ,  अचल और  ध्रुव (अर्थात् नित्य ) कहेंगे ; गुनी भक्त उसी कूटस्थ की उपासना करते हैं; उसीपर ध्यान भी केंद्रित करते हैं और अपने अंतर आत्मा में उसीका अनुसंधान करते हैं।“ ……   

[iv] श्री मद्भागवद्गीता के दूसरे अध्यायके चौबीसवेंपचीसवें श्लोकोंमें "सर्वगतः, अचलः, अव्यक्तः, अचिन्त्यः" आदि और पन्द्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें 'कूटस्थः' एवं 'अक्षरः' विशेषण जीवात्माके लिये निर्देशित हुए ; सातवें अध्यायके श्लोक २५ में  'अव्ययम्' विशेषण परमात्माके विशेषताओं को दर्शाने के लिए  और चौदहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें 'अव्ययम्' विशेषण जीवात्माके लिये संदर्भित किया गया ।

 

शंखनाद

आज हमें यह सोचने में भी शायद कुछ अलग ही लगता होगा जब हम एक जानकारी पाते हैं कि युद्ध शुरू होने से पहले शंखनाद से कुरुक्षेत्र की धरती को पवित्र किया गया था; पितामह, गुरुदेव, सभी भ्राता, प्रमुख  योद्धा और स्वयं जगदीश्वर भी अपने अपने शंख साथ में लाये थे; उन सभी शंखनाद से सुर, असुर, राजा, सेनानायक, राठी, महारथी और स्वयं जगदीश भी युद्ध क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का भान कराते रहे। 

शंखनाद से ही सभी कर्मकांड शुरू करने की बात और उसी शंखनाद से कर्मकांड समाप्प्त करने की बात हमारी जानकारी में आयी जरूर; पर रण क्षेत्र   में  अगर वैसी परिस्थिति का निर्माण हो तब हमें फिर से उस कर्म काण्ड के बारे में विचार करना होगा जिसमे युद्ध को भी शंखनाद से शुरू करने के बारे में और सूर्यास्त के बाद इस रण को फिर से शंखनाद के जरिये समाप्त कर देने की बात कही जाती हो। आधुनिक युग का युद्ध है ही निराला; कहीं कहीं पर अंधकार का सहारा लेकर , छिपकर , शत्रु को कोई मौका न देते हुए आक्रमण कर दिए  जाते होंगे; तो कहीं सूचना जाल का सहारा लेकर मशीनें खराब कर दिए जाते होंगे; और फिर कहीं पूरी दुनिया को चार पांचबार विनष्ट कर देने की योजना बन रही होगी; योजना बनाने वालों को शायद ही इस बात की जानकारी रही होगी कि  संसार विनष्ट होने के बाद फिर किसी भी मनुष्य के लिए धरती पर स्थान नहीं बन पायेगा; संसार के रचना तंत्र के साथ खेलने का अर्थ हुआ विनाश लीला शुरू करने के लिए जगदीश्वर श्री हरि को शंखनाद करने के लिए मजबूर कर देना।

हमें जगदीश्वर के शंखनाद के विपरीत चलने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए; वैसी पात्रता भी किसी मनुष्य को नहीं मिली; सूर्य से ऊर्जा लेकर उसी के सहारे भोजन बनाकर अन्य सभी जीव का पोषण करने की जिम्मेदारी; प्रकृति में संतुलन बनाये रखने की जिम्मेदारी जिस भाँती जिस जीव को मिली होगी उसे वैसा ही करते रहना होगा; शंखनाद करके शिकारी कभी भी शिकार पर झपट्टा नहीं मार पायेगा; या फिर किसी अपराधी को पकड़ते समय किसी दरोगा को शायद ही हम शंखनाद करते हुए देख पाए!

कुरुक्षेत्र में शंखाबाद के जरिये मानसिक और बौद्धिक संघर्ष की सूचना हो जाने के बाद दोनों पक्षों  की सेना में व्यूह रचना की ओर नजर डालने का मौका मिला; आधुनिक युग में शंखनाद के जरिये युद्ध शुरू करने की बात को  बेमानी मान लेने को हम जल्दबाजी ही मानेंगे; शंखनाद के पैमाने और तरीके भले ही बदल गए होंगे पर अभी भी युद्ध के पहले   अखबार के जरिये, प्रचार नाध्याम के जरिये, पत्राचार, सभाएं और सेना स्थानान्तरित करने के जरिये युद्ध का शंखनाद ही होता है।  सेनानायकों के आपसी मेल मिलाप को भी हम शंखनाद ही मानेंगे।  इतिहास साक्षी है कि अपने देश में संघर्ष और नरसंहार रोकने के लिए शंखनाद किये गए थे; भले ही उस शंखनाद के बाद हमें शंखनाद करनेवाले सैनिक के जीवन पर संकट का बादल धूमायित होते हुए देखना पड़ा; और फिर उन्हें हमसे दूर कर देने का प्रयास भी किया गया; सभ्य जनजाति को सभ्यता की शिक्षा देने के क्रम में भी शंखनाद करनेवाले सेनानायकों की जानें संकट में आयी; उनके ऊपर हथियार का प्रयोग करनेवालों को शायद इस बात का अनुमान भी न रहा होगा कि शरीर छुड़ा लेने से किसी जननायक को जनता जनार्दन के ह्रदय से दूर नहीं किया जायेगा; ऐसा कर पाने के बारे में सोचनेवाले भी बुद्धि से कमजोर ही माने जाएंगे।

युद्ध को कभी हमने शुरू होते हुए जरूर देखा होगा; पर इसकी समाप्ति की ओर संसार को एकरूप होते हुए आज तक नहीं देख पाए।  युद्ध संस्कृति का जो भयानक परिणाम रहता होगा उसे देखकर इतिहास से सीख लेनेवालों की संख्या भी कई होंगे; पर वैसा लड्डू किस काम का जो हमेशा हमेशा के लिए एक डब्बे में ही रख  दिया जाय? हमें ऐसे अग्रज की तलाश हमेशा से रही जो जनता जनार्दन के ह्रदय सम्राट बन पाएंगे; अपने यहां भी ऐसे महात्मा आये जिन्हें ह्रदय सम्राट बनते हुए भी हमने देखा; और फिर उन्हें हम  सही प्रकार से समझ ही नहीं पाए।  शास्त्र में भी कुछ ऐसी ही मान्यता बन रही है कि जगदीश्वर श्री हरि के सही स्वरुप को हम शायद ही ठीक से समझ पाएं! आखिर सागर की गहराई के बारे में जानकारी पाने के उद्देश्य से निकलनेवाले नमक के पुतले को कभी न कभी पिघलना तो पड़ेगा; उसके बाद यह फिर कोई माने नहीं रखता कि जगदीश्वर के शंखनाद से सृजन का निर्देश मिला या विनाश की लीला रची गई!

हम उस अवसर की बंभीरता के बारे में सिर्फ कल्पना कर पाएंगे जब सभी रथी महारथी योद्धा के शंखनाद से कुरुक्षेत्र की भूमि को प्रकम्पित किया गया होगा; उसके बाद फिर श्रीहरि के पांचजन्य की भी बारी आयी होगी; पर श्रीहरि के शंखनाद के जरिये प्रसारित की जानेवाली विनाशलीला को शायद ही कोई पक्ष के महारथी ठीक से समझ पाए होंगे; अगर समझ पाते तो फिर श्रीमद्भागवद्गीता में एक ही अध्याय रहता और सव्यसाची के आसपास अन्य सेनानायकों की कतार लग जाती; क्यूंकि उस परिस्थिति में उन सभी को श्रीहरि के पास रचनाधर्मिता का और आध्यात्मिक चेतना का गुप्त मन्त्र जो लेना था ! पर ऐसी परिस्थिति बनते हुए हम नहीं देख पाए। परिणाम हम सबके सामने है; युद्ध शुरू हो जाने के बाद एक योद्धा के मन में युद्ध के भीषण परिणाम के बारे में सोच विचार पनपे, और फिर उसे अगर ऐसा लगने लगे कि युद्ध न करते हुए अरण्य जीवन स्वीकार कर लेना श्रेय होगा  तो फिर हमें खुश होना चाहिए! पर इस बात को जानकार श्रीहरि काफी नाराज हो गए और उस भावना को एक योद्धा के ह्रदय में पनपनेवाली कायरता, कमजोरी, अज्ञान और हीन भावना कह दिया।   वस्तुतः रण भूमि का बीच का क्षेत्र किसी भी योद्धा के लिए शांति, अहिंसा और संतोष की बात करने के लिए स्थान, काल  या फिर पात्रता  के मापदंड से उपयुक्त स्थल नहीं मान  पाएंगे ; जगदीश्वर भी ऐसा नहीं मान पाए; इस प्रयास को उन्होंने स्वधर्म के निमित्त से भी गलता बताया ।  इसी लिए श्री हरि उस योद्धा को युद्ध करने के लिए बताते रहे।

…… (विषाद योग शीर्षक पुस्तक से ; प्रस्तुति: चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता)

 

कालिंदी और नागदेवता

 

एक आश्रम संस्था के प्रमुख थे ; उनको लोग स्वामी बुद्धानन्द कहा करते थे।  उनकी गाड़ी झाड़खंड और ओडिशा की सीमा पर बसे एक जंगल के बीच से गुजर रहा था।  उसी जगह कुछ ऐसे जनजाति बसे थे जिनका कोई स्थायी ठिकाना ही नहीं था; ही हम उन्हें किसी जगह पर स्थायी रूप से बसते हुए देख ही पा रहे थे। ऐसे ही एक स्थानांतरण के मुहूर्त में उसी रास्ते से स्वामीजी और उनके कुछ साथी गुजर रहे थे, जबकि एक जनजाति महिला दर्द से कराह रही थी।  जैसे ही सन्यासी महाराज का काफिला रुका वैसे ही अन्य सभी जनजाति के लोग वो जगह चढ़कर और उस पीड़िता को भी छोड़कर चल दिए; आखिर उस पीड़िता का इलाज करने के लिए चिकित्सकों को उतारा गया; भोजन की व्यवस्था की गई; कुछ भोजन वहीँ छोड़कर वो लोग चले गए।  से पहुंचाने का यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा ताकि बिरहोड़ समुदाय के उस जनजाति का विशवास जीता जा सके।  स्वामी बुद्धानन्द और उनके साथी सम्प्रदाय को छोड़कर अन्य किसी सम्प्रदाय को उस जनजाति का विशवास जीतने में सफलता नहीं मिली। 

उसी जनजाति के नजदीक एक कालिंदी टोला भी था जहां नागदेवता को पकड़ने और बेचने के व्यवसाय से जुड़ा एक कालिंदी बूढ़ा भी रहता था।  एकदिन आश्रम के लोगों के साथ काम में हाथ लगाते हुए खंडहर से निकलनेवाले एक नागदेवता को पकड़ने के लिए उसी कालिंदी बूढ़ा को बुलावा भेजा गया।  उसने ख़ुशी ख़ुशी उस नागदेवता को अपने पास रखी टोकर में डाल दिया।

"इस नागदेवता का क्या करोगे?" स्वामीजी का सहज ही पूछना था ।

"पहले तो दांत निकालना होगा, स्वामीजी", कालिंदी "दांत" शब्द पर कुछ ज्यादा ही बल देकर अपने मन की बात कह रहा था ; और भी काफी कुछ कहा।

"ऐसा क्या किया जाय, जिसके करने पर इसे तुम गहन वन में जाकर छोड़ दोगे?"

यह तो उस कालिंदी के लिए काफी कठिन एक विषय बन गया। मन ही मन सोचा इस संत महात्मा से भी क्या कुछ लेना उचित होगा! पर उसे पैसा टी चाहिए, और फिर यह जो उसका व्यवसाय ठहरा!

ज्यादे देर तक कालिंदी को चुप्पी साढ़े देख महाराज समझ गए कि इसे कुछ बड़े रकम की उम्मीद रही होगी और उसके माँगने में भी कुंठा हो रही होगी।  वो स्वयं ही उनके पिछले महीने के संग्रह में से आधी जे ज्यादे की रकम निकालकर कालिंदी को देने के लिए कहे और यह बोलकर गए कि नागदेवता को कुछ गभीर वन में जाकर प्रकृति की गोद में छोड़ दिया जाय; नैसर्गिक रूप से उसे जो जहर की झोली और विषदंत जैसे मिला होगा उसे भी चढ़ दिया जाय।

पैसों में रखा ही क्या है! भक्तों के पास जाने से और अनुभव कथन कहने से फिर दान मिलाने की संभावना जरूर बनेगी।  सामने चलनेवाला वीर सन्यासी भला तूफ़ान से और जोखिमों से कभी घबराया है, ता फिर आगे कभी घबराएगा ! नागवता को सिर्फ इसलिए भी कैद में रखना उन्हें मंजूर नहीं था को वो जहरीलेल हैं, अनायास ही अन्य जीवों का नाश भी कर देते हैं; नैसर्गिक रूप से मिले विष से वो शिकार भी करते होंगे, भोज्य को भी मौत के घात उतारते होंगे और वैसे प्राणी की जनसंख्या को भी नियंत्रण में भी रखते होंगे; यह तत्व कालिंदी के समझ से परे रहा होगा, पर स्वामीजी भली भाँती समझ रहे थे; स्वामीजी प्राण संचार और संहार वृत्ति का विषय भी समझ रहे थे जिसमे अनाधिकार हस्ताक्षिओ कर दिन मनुष्य का धर्म नहीं माना जाता; अतः ऐसा अधर्म करने की वृत्ति से स्वामीजी ने उस कालिंदी को रोका।  .