युद्ध
विराम को मुश्किल से बारह घंटे हुए होंगे, इतने में अमेरिका और इस्रायल के बीच व्यवधान
सामने आने लगा; सुबह लेबनान के कई ठिकानों
पर हमले भी किये जाने लगे। होर्मुज का रास्ता खोलने के लिए भी कई तरह की शर्तें रखी जाने लगी। अब यह भी संकेत मिलने लगा कि उसे ईरान के नियंत्रण
में ही रहना होगा, जहाज़ों से पैसे भी लिए जाएंगे;
बाकी देशों को वो पैसा देनेके बाद ही विश्व को सुविधा मिल सकेगी। इस्रायल का सीधा दावा यह रहा कि जब तक उसके ऊपर आक्रमण होने की आशंका पूरी तरह न मिट जाती है तबतक उसे सभी
आतंकी संगठन से लड़ना ही होगा; उसकी लड़ाई और अमेरिका की लड़ाई बिलकुल अलग है। दोनों के सामरिक लक्ष्य भी अलग ही रहे ।
अमेरिका
की प्रतिष्ठा पर बहुत आंच आई; काफी कीमती संयंत्र को यद्ध भूमि में जलाते और गिरते
हुए भी देखा गया, पप्रमाणु बम बनाने की धुन
में ईरान को काफी कुछ खोना पड़ा तो सही, पर
उनकी प्रतिष्ठा बनी रही, पर अमेरिका के अध्यक्ष ने अपने ही देश के नागरिकों को शर्मिंदा
करते रहे।
जो
भी सामरिक उद्देश्य को सामने लेकर अमेरिका जंग के मैदान में उतर गया उसके कारण मैरिका
को ही ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा, काफी तोप, बारूद और संयंत्र गंवाना पड़ा; उनके सभी सामरिक
ठिकानों पर हमले होते रहे ; अब ईरान को उसी अमेरिका के साथ बराबरी के स्तर पर बातचीत
करना पड़ेगा। ऊपर से यह भी कही जा रही है कि
अगर कोई हवाई जहाज ईरान में घुसता है तो उसे युद्ध विराम का उल्लंघन समझा जाएगा; हिजबुल्ला
के साथ इस्रायल का जंग काफी दिनों से चल रहा है।
अपनी स्थिति स्पष्ट कराते हुए इस्रायल कायम रहेगा; नौ अप्रैल सबेरे ही इस्राएल
की तरफ से लेबनान पर कई बार हवाई हमले किये
गए ; दक्षिण लेबनान से करीब दस लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा।
कुछ
लोग; विशेष रूप से मुस्लिम देशों में अमेरिका के द्वारा जाहिर किये गए युद्ध विराम
क अमेरिका की हार मान रहे हिन्। अमेरिका अपने
देश में युद्ध को एक जीत बता रहे हैं। यह तो
सत्य ही है कि ईरान के लोग अपने हौसले बुलंद रखते हुए, पीड़ाओं को झेलते हुए युद्ध के
पलों को बिताया; उन्हें इस बात की भी चिंता बिलकुल महीन सत्ता रही थी कि उन्हें मिटा
दिया जाएगा। जानकारी यह भी मिलाने लगी कि होर्मुज
का रास्ता खुलने के पहले ही बंद होते हुए नजर आने लगा ; शंका इस बात को लेकर भी जताने
लगी कि जहाज़ों के आवागमन में अभी भी सामान्य स्थिति नहीं बन पा रही थी। काफी एक महीने से भी अधिक समय से जहाज पारस की खाड़ी
और ओमान की खाड़ी में इंतज़ार कर रहे हैं। प्रत्यक्ष
रूप से जन सम्प्रदाय के लोगों को एक दूसरे से शिकायत थी वो अपने अपने हथियार और गोला बारूद लेकर मैदान में डटे हुए हैं, किसी
भी तरफ से कोई नरमी बरते जा की कि कोई बात है ही नहीं ।
दीर्घ
चालीस दिन से चलनेवाले टकराव से एक और बात स्पष्ट रूप से सिद्ध हो रहे थे कि ईरान पिछले
चालीस वर्ष से धीरे धीरे युद्ध के लिए तैयारी कर रहा था, और आगे भी ऐसा करते रहने के
लिए अपने जिद पर अड़ा रहा; उसकी सेना में भी
एक धार्मिक कट्टरता का संक्रमण होता रहा, अब उसे वैसे धार्मिक कट्टरता से बाहर निकालना
शायद ही संभव हो सके; सिर्फ इतना ही नहीं, पश्चिम एशिया में एक नए समीकरण के साथ चलनेवाली
सतरंज बिछेगी; अमेरिका को उस क्षेत्र से बाहर निकालने की योजना पर धीरे धीरे काम होने
लग गयी। जिस सामरिक संस्था को अमेरिका की देखरेख
में बनाया गया, उसमें भी दरार आ चुकी, अगर दरार पहले से रही भी होगी तो अब वो सामने
आने लग गयी।
एक
यह बात भी चल पड़ी कि हिजबुल्ला पर भी आक्रमण रुक जाने चाहिए, ईरान को अमेरिका की बातों
पर भरोसा भी कम रही ; इस अविश्वास के वातावरण में होर्मुज गलियारे पर ईरान अपना नियंत्रण
खोना भी नहीं चाहता; आने और जानेवाले सभी जहाज़ों पर अपना नियंत्रण कायम रखना चाहेगा;
सेना अपनी भूमिका पर कायम रहना चाहेग। सुनने
में यह भी बात आने लगी कि अमेरिका भी अपनी भूमिका पर कायम रहते हुए होर्मुज गलियारे
से गुजरने के लिए पैसे देने की बात पर विचार करना चाहेगा ; इस बात को लेकर भी संदेह
का बादल जमा हो रहा है कि अमेरिका के साथ ईरान भी तेल व्यापार से भारी रकम कमाना चाहते
हैं।
लेबनान
पर आक्रमण जारी रखने के पीछे इस्रायल का यह तर्क रहा कि वहाँ जमे आतंकी संगठन एक दूसरे
से वार्ता कर रहे थे, उनके जगहों पर ही निशाना किया गया। दोहरे मापदंड लेकर चलनेवाले देशों के लिए अपनी कमाई
का रास्ता सुरक्षित रखना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं ; जब पडोसी देशों से ईरान पर हमले
होने लग गए तब लोगों को उस तफावत का ज्ञान हो गया, जिसकी चर्चा शुरू के दिनों से होती
रही। अब तो हालत ऐसी भी आ गयी कि गुप्त रूप
से अपनी पहचान पर परदे डालकर भी हमले किये जाएंगे। अगर कोई आतंकी संगठन अपना जिद नहीं छोड़ना चाहेगा,
तो उन हमलों को झेलनेवाले देशों के सामने दूसरे सभी विकल्प खुले रखेंगे ; अमेरिका बातचीत
के मेज पर रहेगा, साथ ही साथ उनके अधिकारी जंग के मैदान पर तैनात भी रहेंगे।
दुनिया
की नजर उस जगह पर आकर टिक गयी जहां से तीसरे विश्व की अर्थनीति का एक बड़ा हिस्सा प्रभावित
हो सकता है ; यहां से युर के लिए भी एक चिंता का विषय बन रहा है। यह भी कहा जाने लगा कि अगर पश्चिम एशिया में शान्ति
लाने का यह प्रयास असफल रहा तो दुनिया एक मंडी से गुजरना होगा ; इस मैदान में तीन खिलाड़ी
(अमेरिका, रूस और चीन ) के लिए बह इसमान रूप से चिंता का विषय मना जाना चाहिए। पुरे सूचना तंत्र का केंद्र अब उन जगहों से हटाकर
भारत कि और आते हुए देखा जा रहा है, इस दृष्टि से भी एक भो राजनीति विषयक किसी बड़े
परिवर्तन से हम इनकार भी नहीं करते।
अतः
यह मान लेने में काफी जल्दबाजी होगी कि पूरी तरह से शान्ति वार्ता की और दुनिया बढ़
रही है ; यह भी नहीं मान सकते कि किसी आतंकी संगठन के पालन पोषण करनेवालों से किनारा
करते हुए हमें रास्ते निकालने के लिए काम करने में सफलता मिल पाएगी। हनेशा से ही दुनिया का यह दस्तूर ही रहा कि सुर
- असुर व्वृत्ति रखनेवाले लोग अपने चारों तरफ पनपते रहे , समय समय पर उनका संहार भी
होता रहा ; उस संहार वृत्ति के बाद कभी भी असुर सम्पदा से दुनिया को पूरी तरह मुक्त
कर पाना आज भी संभव नहीं हो पाया। इसका अर्थ
यह भी नहीं निकाल लेना चाहिए कि हर प्रकार से आतंकवाद को दमन करने के लिए सभी प्रयास
बंद कर दिए जाएँ।

