भक्त अथवा केवली – और मुक्त

सिर्फ शुद्ध भक्ति के आधार पर ही भक्त और भगवान का मिलान संभव हो पायेगा।  ऐसे भक्त भी हुए जिन्हें ईश्वर का दर्शन होता रहा और वे संतृप्त होते रहे।  गोस्वामी तुलसीदासजी को उसी प्रकार से मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी और उनके पूरे दरबार का दर्शन हो सका।  उनके उसी दिव्य दर्शन को सत्यापित करने के लिए आज अपने बीज श्री रामचरितमानस रूपक कृति हमारे बीच संदर्भित  हो पाया।.

-        चन्दन सुकुमार सेनगुप्ता

1. सर्व-भूतेषु यः पश्येत् भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः।।
 
2. ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम मैत्री कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः।।
 
3. अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः।।
 
4. गृहीत्वाऽपींद्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति। विष्णोर् मायां इदं पश्यन् स वै भागवतोत्तमः।।

5. देहेंद्रिय प्राण मनो धियां यो जन्माप्यय-क्षुद्-भय-तर्ष-कृच्छैः।
संसारधर्मैर् अविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर् भागवतप्रधानः।।
 
6. न काम-कर्म-वीजानां यस्य चेतसि संभवः। वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः।।
 
7. न यस्य जन्म-कर्मभ्यां न वर्णाश्रम-जातिभिः। सज्जतेऽस्मिन् अहंभावो देहे वै स हरेः प्रियः।।
 
8. न यस्य स्वः पर इति वित्तेषवात्मनि वा भिदा। सर्वभूतसमः शांतः स वै भागवतोत्तमः।।

9. त्रिभुवन-विभव-हेतवेऽप्यकुंठ स्मृतिरजितात्म-सुरादिभिर् विमृग्यात्।
न चलति भगवत्पदारविंदात् लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्यः।।
 
10. भगवत उरु-विक्रमांघ्रिशाखा नख-मणि-चंद्रिकया निरस्त-तापे।
हृदि कथमुपसीदतां पुनः स प्रभवति चंद्र इवोदितेऽर्कतापः।।
 
11. विसृजति हृदयं न यस्य साक्षात् हरिरवशाभिहितोऽप्यधौध-नाशः।
प्रणय-रशनया घृतांध्रि-पद्यः स भवति भागवतप्रधान उक्तः।।[1]

अर्थ :

1.      सब भूतों में परमेश्वर स्वरूप अपनी ही आत्मा को और परमेश्वर स्वरूप अपनी आत्मा में सब भूतों को जो देखता है, वह ‘भागवतोत्तम’ ( उत्तम कोटि का भगवद्भक्त ) है।

 

2.      जो भक्त ईश्वर में प्रेम, उनके भक्तों से मित्रता, मूढ़जनों पर कृपा और शत्रु की उपेक्षा करता है, वह मध्यम कोटि का भक्त है।

 

3.      जो श्रद्धा से केवल भगवान् के विग्रह को पूजना चाहता है, लेकिन उनके भक्तों और दूसरे लोगों को जो श्रद्धा से पूजना नहीं चाहता, वह प्राकृत यानी कनिष्ठ भक्त हैं।

 

4.      यह समस्त विश्व सर्वव्यापी ईश्वर की माया है, यह ज्ञान होने के कारण, इंद्रियों से विषयों का ग्रहण करते हुए भी जिसे हर्ष या विषाद नहीं होता, वह उत्तम भक्त है।

 

5.      देह इंद्रिय प्राण मन और बुद्धि के, जन्म मृत्यु क्षुधा भय तृषा के कारण दुःखदायी जो संसार-धर्म उनसे, हरि-स्मरण के कारण जो मोहग्रस्त नहीं होता, वह भागवतों में श्रेष्ठ है।

 

6.      जिसके चित्त में काम, कर्म और इन दोनों का बीज अविद्या उत्पन्न नहीं होती और वासुदेव ही जिसके एकमात्र घर हैं, आश्रय है, वह उत्तम भागवत है।

 

7.      जिसे जन्म-कर्म या वर्णाश्रम और जाति के कारण इस देह में अहंभाव नहीं चिपकता, सचमुच वही हरि का भक्त है।

 

8.      जो धन-संपत्ति या शरीरादि में ‘यह अपना है, यह पराया’ ऐसा भेद नहीं करता, जो सब प्राणियों के साथ समभाव से व्यवहार करता और सर्वदा शांत रहता है, वह उत्तम भागवत है।

 

9.      त्रिभुवन के वैभव के लिए भी जिसके हरि स्मरण में व्यवधान नहीं पड़ता और भगवन्मय बने देवादिकों को भी शोध्य उन भगवान् के चरण-कमलों से जो आधा पल भी दूर नहीं होता, वह वैष्णवों में अग्रगण्य है।

10.  जैसे चंद्रोदय होने पर सूर्य का ताप नष्ट हो जाता है, वैसे ही भगवान् के महापराक्रमी चरणों की उँगलियों के नखरूपी रत्नों की चंद्रिका से भक्तों के हृदय का ताप मिट जाता है। फिर वह पुनः उत्पन्न कैसे होगा?

11.  अवश होकर नाम लेने पर भी पाप-प्रवाह का नाशक करने वाले साक्षात् हरि, प्रेम की डोरी से चरण-कमल बँध जाने के कारण, जिस भक्त के हृदय को नहीं छोड़ते, वह भागवतों में प्रमुख हैं, ऐसा कहते हैं।

भक्त के गुणों का परिचय भागवत में कई स्कंधों में जगह जगह पर विविध रूप में और रूपक कथा के ज़रिए दिया गया है | एक प्रहलाद जैसे भक्त ही हैं जिनके भक्ति सुधा से संतुष्ट होकर भक्त की लाज रखने के लिए स्वयं श्री हरि प्रकट हो जाते हैं | दूसरी ओर पत्थर की शिला से भक्त को प्रकट करने के लिए राम रूपी श्री हरि ही अहिल्या का उद्धार करने के लिए आगे बढ़ते हैं | सन्देहातीत होकर ईश्वर चरण में अनुराग रखते हुए खुद को समर्पित कर देने का आग्रह रखता हो वही श्रेष्ठ भक्त माना गया | श्री मदभागवत और गीता में भी भक्तों के कई लक्षण बताए गये हैं (गीता द्वादश अध्याय)|

 



[1] विसृजतित्याग देता है; हृदयम्हृदय को; कभी नहीं; यस्यजिसका; साक्षात्स्वयं; हरि:—भगवान् हरि; अवशसहसा; अभिहित:—कहलाने वाला; अपियद्यपि; अघपापों के; ओघसमूह; नाश:—नाश करने वाला; प्रणयप्रेम की; रसनयारस्सियों द्वारा; धृतपकड़े; अङ्घ्रि-पद्म:—उनके चरणकमल; :—वह; भवतिहै; भागवत प्रधान:—सर्वश्रेष्ठ भक्त; उक्त:—कहा गया .